“विदा होती बेटियाँ” : समकालीन हिंदी कविता का संवेदनात्मक दस्तावेज

सोनभद्र ।”विदा होती बेटियाँ” डॉ ओम प्रकाश, उप महाप्रबंधक (मानव संसाधन राजभाषा) द्वारा रचित काव्य संग्रह शरद चंद्रिकोत्सव कार्यक्रम में पधारे अतिथियों एवं कलाकारों को सप्रेम भेंट किया गया। इस अवसर पर काव्य संग्रह “विदा होती बेटियाँ” की सराहना करते हुए  आशुतोष द्विवेदी, निदेशक (तकनीकी), एनसीएल ने कहा कि “विदा होती बेटियाँ” जीवन, प्रेम, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा गहन आख्यान है जिसमें परिवार और समाज के बदलते स्वरूप को अत्यंत मार्मिकता से दर्ज किया गया है। इस संग्रह में कवि ने माँ–पिता के संघर्ष, बेटियों के विदा होते आँसुओं, पिता के सपनों और माँ के अकेलेपन को बड़ी आत्मीयता से चित्रित किया है।” 

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कार्यक्रम में पधारे  आनंद कुमार सिंह, परियोजना प्रमुख, एमईआईएल ने कहा कि “कविताएँ सहज भाषा और गहरे भावों के सहारे पाठकों को अपने ही जीवन और रिश्तों से जोड़ देती हैं। यह संग्रह केवल कवि की निजी अनुभूतियों का बयान नहीं, बल्कि हर उस परिवार की कहानी है जहाँ रिश्ते समय और परिस्थितियों की आँच से गुज़रते हैं।”

संदीप नायक, कार्यकारी निदेशक, एनटीपीसी सिंगरौली ने संग्रह के बारे में कहा कि—“आज का समय रिश्तों की डोर को कमजोर करता जा रहा है। ऐसे में डॉ. ओम प्रकाश का यह संग्रह कविता की सार्थकता और साहित्य की संवेदना को पुनर्जीवित  करता है। यह संग्रह बताता है कि साहित्य केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन की गहरी समझ है।”

हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राचार्या प्रो. रमा ने संग्रह की भूमिका में “पिता के सपने” कविता का उल्लेख करते हुए कहा है कि कवि ने पिता की उपस्थिति और अनुपस्थिति को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है—

“पिता की छाँव में, बेफ़िक्र ज़िंदगी बिताते हुए

सोचा कहाँ था कि, सिर पर साया न हो तो

असमय पतझड़ में झुलस जाते हैं ख़्वाब,

मुरझा जाते हैं रिश्तों के पेड़।”

प्रो. रमा के अनुसार इन कविताओं में पीड़ा भी है, संघर्ष भी, पर उससे बड़ा है रिश्तों का गहन मूल्य। उन्होंने “माँ का अकेलापन” कविता को आज की पीढ़ी के लिए चेतावनी कहा—

> “भीड़ भरे शहर में, अकेली हूँ मैं

चीखती हूँ भयावह सन्नाटे में

और लौट आती है मेरी आवाज़, तुम तक नहीं पहुँचती।” 

प्रो. रमा के शब्दों में—

“डॉ. ओम प्रकाश जी का यह संग्रह रिश्तों का महाकाव्य है। इसमें मानवीय संवेदना का चरम रूप मिलता है। यह संग्रह हिंदी साहित्य की यात्रा में मील का पत्थर साबित होगा और आने वाली पीढ़ियों को रिश्तों और संवेदनाओं का महत्व समझने की प्रेरणा देगा।”

प्रख्यात आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने “विदा होती बेटियाँ” को समकालीन हिंदी कविता में बहुजन भावबोध की सशक्त अभिव्यक्ति बताया है। उनके अनुसार “डॉ. ओम प्रकाश की कविताएँ रूढ़ियों को परंपरा से अलगाते हुए प्रासंगिक पक्षों को आलोकित करती हैं। वे समाज की अवरोधक प्रवृत्तियों पर सटीक प्रहार करते हैं, किंतु उनकी भाषा उग्र नहीं होती — यह आज के अस्मितावादी समय में दुर्लभ विशेषता है।” उन्होंने आगे कहा है कि—“ओम प्रकाश जी की कविताएँ अंतरंग, पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की परवाह करती हैं, ताकि इतिहास के लंबे दौर में मनुष्य द्वारा कमाई गई रिश्तों की पूँजी विलुप्त न हो पाए। माँ, पिता और बेटी पर लिखी कविताएँ उनकी काव्यदृष्टि की गवाही देती हैं और संवेदना-क्षरण के विरुद्ध मजबूत मोर्चा बन जाती हैं।”

“विदा होती बेटियाँ” समकालीन हिंदी कविता का वह संवेदनात्मक दस्तावेज है जो रिश्तों, मूल्यों और मानवीय करुणा की पुनर्स्मृति कराता है। डॉ. ओम प्रकाश ने अपनी कविताओं के माध्यम से उस ‘मौन’ को स्वर दिया है, जिसे आधुनिक जीवन की आपाधापी में अक्सर अनसुना छोड़ दिया जाता है।

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