लोक एवं शब्दशास्त्र का सामाजिक चिन्तन पं. वासुदेवशरण का भाषा का अनुपम योगदान था

वाराणसी/ काशी की महनीय विद्वत्परम्परा को स्मृति व्याख्यानमाला की परम्परा के द्वारा व्याख्यायित करते हुये इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के क्षेत्रीय केन्द्र वाराणसी द्वारा भारतीय विद्या के अप्रतिम साधक, कलामर्मज्ञ प्रो० वासुदेवशरण अग्रवाल की पुण्यस्मृति के अवसर पर 7 अगस्त, 2025 को स्मृति-व्याख्यान आयोजित किया गया जिसका केन्द्रीय विषय ‘पाणिनीय व्याकरण का सामाजिक परिदृश्य’  निर्धारित किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्यवक्त्री अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृत समवाय की अध्यक्षा तथा पूर्व विभागाध्यक्षा, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली सुविख्यात विदुषी प्रोफेसर दीप्ति शर्मा त्रिपाठी थीं तथा प्रोफेसर बाल शास्त्री, पूर्व संकायप्रमुख, संस्कृतविद्याधर्मविज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने अध्यक्ष पद को अलंकृत किया।
स्मृति व्याख्यान हेतु कला केन्द्र की परम्परानुसार कार्यक्रम का शुभारम्भ बृहस्पति पाण्डेय द्वारा लौकिक मंगलाचरण तथा पुनः आगन्तुक अतिथियों के द्वारा देवी सरस्वती एवं प्रो० वासुदेव शरण अग्रवाल के चित्र पर पुष्पाजंलि अर्पित करने एवं दीप प्रज्जवलन से किया गया। तत्पश्चात् कला केन्द्र के क्षेत्रीय निदेशक डॉ० अभिजित् दीक्षित ने वाचिक स्वागत करते हुये यह प्रकाशित किया कि आज स्मृति व्याख्यान का आयोजन जिनकी स्मृति में किया जा रहा है, ऐसे प्रो० वासुदेव शरण अग्रवाल जी का चिन्तन भारतीय ज्ञान परम्परा के मूल्यों पर आधारित रहा है। वे 20वीं सदी के ऐसे शलाका पुरुष हैं, जिन्होंने वेद को इतिहास से, इतिहास को संस्कृति से,  संस्कृति को धर्म से, धर्म को समाज से, समाज को परम्पराओं से, परम्पराओं को लोक से और लोक को अध्यात्म से जोड़ा। वे सांस्कृतिक अध्ययन के अग्रदूत तथा विविध परम्पराओं के बीच सेतु तथा ज्ञानमीमांसाओं के मौलिक भाष्यकार हैं। उन्होंने व्याख्यान हेतु उपस्थित सभी आगन्तुक विद्वानों का वाचिक स्वागत किया।
व्याख्यान की मुख्य वक्त्री प्रो० दीप्ति शर्मा त्रिपाठी ने भाषा के माहात्म्य को केन्द्रित करते हुये पाणिनि के व्याकरण और संस्कृति के महत्ता को विशद रूप में परिभाषित किया, उन्होंने पाणिनीय के लोकचिन्तन तथा भाषा में उसकी समन्वय को विभिन्न उदाहरणों एवं सूत्रों के साथ प्रकाशित किया। प्रो० त्रिपाठी ने भारतीय समाज में हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं की पतनशील होते प्रभाव पर गहन चिन्ता एवं दुःख व्यक्त किया।  उन्होंने भाषा के साथ समाज के दुराव एवं समाज के चारित्रिक गिराव हेतु सचेत किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो० बाल शास्त्री ने पाणिनीय व्याकरण में लोकमीमांसा को प्रकाशित करते हुये वर्णित किया कि व्याकरण एक दर्शन के रूप में व्यापक चिन्तन स्वरूप है। उसमें शास्त्रार्थ, व्युत्पत्ति, शब्द सिद्धि के विस्तृत चिन्तन समन्वित हैं।यह ब्रह्म के जुड़ाव का सूत्र है। भाषा के तदर्थ सूत्र है जिनका समझना आवश्यक है उन्होंने इस व्याख्यान हेतु कला केन्द्र को साधुवाद दिया। कार्यक्रम के अंत में डॉ० त्रिलोचन प्रधान ने उपस्थित श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया तथा कार्यक्रम का संचालन डॉ० रजनीकांत त्रिपाठी ने किया।
कार्यक्रम में काशी के अनेक विशिष्ट विद्वान् उपस्थित रहे, जिनमें – पद्मश्री राजेश्वराचार्य जी, प्रो० सीबी झा, प्रो० उपेन्द्र त्रिपाठी, प्रो० सदाशिव द्विवेदी, प्रो० कमलेश जैन, प्रो० हरिनारायण तिवारी, प्रो० कृष्णकान्त शर्मा, प्रो० दीनानाथ शर्मा, विजय शंकर त्रिपाठी, डॉ० कृष्णानन्द सिंह, डॉ० अवधेश कुमार, डॉ० गीता भट्ट, डॉ० त्रिलोचन प्रधान, मोहन सिंह, डॉ० देबाशीष जाना, डॉ० शिवेन्द्र सिंह राणा, संजय सिंह, गौतम चटर्जी आदि प्रमुख हैं। कार्यक्रम में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग एवं संस्कृतविद्या एवं धर्मविज्ञान संकाय के विभिन्न शोधार्थियों के साथ-साथ, रणवीर संस्कृत महाविद्यालय तथा संस्कृत भारती के बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थीं।

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