बनारस क्वीयर प्राइड द्वारा पोस्टर मेकिंग इवेंट का आयोजन

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 वाराणसी । बनारस क्वीयर प्राइड के तत्वावधान में रविवार को आनंद पार्क, वाराणसी में पोस्टर मेकिंग इवेंट का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य कला के माध्यम से क्वीयर समुदाय से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर संवाद को बढ़ावा देना और युवाओं को जागरूक करना था। कार्यक्रम का संचालन नीति द्वारा किया गया। कार्यक्रम में बनारस के क्वीयर समुदाय के साथ-साथ ललित कला विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

प्रतिभागियों द्वारा एचआईवी, एड्स, यौनिकता, जेंडर पहचान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सम्मान, समानता और सामाजिक

स्वीकृति जैसे विषयों पर बनाए गए पोस्टरों ने उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया।प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कार्यक्रम को सार्थक बनाने में सहयोग दिया। स्नेहा ने कहा, “आजादी कहने मात्र से नहीं मिलती, उसके लिए सभी पहचान और वर्ग के लोगों को साथ में लेकर आगे बढ़ना है। लेकिन आज भी समाज में क्वीयर समुदाय को वह मर्यादा नहीं मिली है जिसके वे हकदार हैं।

आज इस पोस्टर के माध्यम से हम उसी आजादी की मांग कर रहे हैं।” इसी क्रम में आकांक्षा कुमारी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “समाज में LGBTQ+ समुदाय के लिए सम्मान नहीं, इसलिए उन्हें अपनी पहचान छुपाकर रखना पड़ता है। लेकिन अब इसके लिए जागरूकता लाने की जरूरत है।”, वहीं अंजली पंकज ने कहा “भारत विविधता का देश है। लेकिन इसमें भेदभाव भी बहुत है। हमें मनुष्यता को केंद्र में लाना होगा तभी यह देश बेहतर बन पाएगा।” और विशाल विश्वकर्मा ने “जैसे आसमान पर सातों रंग खुबसूरत लगते हैं उसी तरह हमारे समाज में भी विविधता सुंदर लगती है। इसलिए हर पहचान और लिंग के लोगों को स्वीकार कर समान अधिकार देना चाहिए।” कहकर अपने अनुभव व्यक्त किए।

इस आयोजन को सफल बनाने में बनारस क्वीयर प्राइड के साथ प्रिज्मैटिक फाउंडेशन, एशियन ब्रिज इंडिया और भगतसिंह छात्र मोर्चा और धनंजय, मो.मूसा और डॉ शार्दूल जी का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। स्वयंसेवक के रूप में अनन्या, रुमान, साहिल, आर्या, अनामिका, बन्नी, अनमोल और उदय की उपस्थिति ने कार्यक्रम को सुचारू रूप से सम्पन्न कराने में अहम भूमिका निभाई।कार्यक्रम के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि कला समाज में जागरूकता, संवेदनशीलता और स्वीकृति बढ़ाने का सशक्त माध्यम है और विविध पहचानों का सम्मान और स्वीकार ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकता है। 

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