भारत-रूस संबंधः विश्वास, सम्मान और दशकों पुराने भावनात्मक जुड़ाव की नींव”

(विशेष आलेख)

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भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंध दशकों से अत्यंत गहरे, विश्वसनीय और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच की यह मित्रता केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे के समर्थन और सहयोग के रूप में हमेशा मजबूती से प्रकट हुई है। रूस ने हमेशा भारत को अपना अत्यंत निकटतम और विश्वासपात्र मित्र माना है, वहीं भारत ने भी वैश्विक मंचों पर रूस के साथ अपनी पुरानी और मजबूत साझेदारी को निरंतर बनाए रखा है। विश्व राजनीति के विभिन्न दौरों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भी दोनों मित्र देशों ने कभी एक-दूसरे के विरुद्ध बोलने से परहेज किया है। इसके विपरीत, वे हमेशा एक-दूसरे के पक्ष में खड़े हुए हैं और परस्पर सहयोग को प्राथमिकता दी है। इसी स्थायी और भरोसेमंद संबंध ने भारत और रूस की मित्रता को वैश्विक मानचित्र पर एक विशेष पहचान दी है। दोनों देशों की यह साझेदारी न केवल ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से मजबूत है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछली भारत यात्रा चार वर्ष चार वर्ष पहले की थी। इस अवधि में विश्व राजनीति में बड़े बदलाव आए। पुतिन की उस यात्रा के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध आरंभ हुआ, जिसने वैश्विक शक्ति-संतुलन को नया मोड़ दिया। इस युद्ध के चलते अमेरिका तथा अनेक पश्चिमी देशों ने रूस पर विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाए, जिससे रूस अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पड़ने लगा। लेकिन ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को कमजोर नहीं होने दिया। भारत ने प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ अपना व्यापार, विशेषकर ऊर्जा क्षेत्र में, जारी रखा और परस्पर सहयोग को प्राथमिकता दी। भारत ने हमेशा वैश्विक शांति, स्थिरता और संवाद की वकालत की है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत ने कई बार संयम, कूटनीति और बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की अपील की।

भारत ने इस युद्ध को समाप्त कराने के लिए समय-समय पर मध्यस्थता की पेशकश भी की, ताकि तनाव कम हो सके और क्षेत्र में शांति स्थापित हो सके। भारत और रूस के बीच की यह निरंतर प्रगाढ़ होती साझेदारी न केवल ऐतिहासिक मित्रता का प्रमाण है, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में दोनों देशों की दूरदर्शिता और परिपक्व कूटनीति का भी परिचायक है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंधों ने उल्लेखनीय मजबूती और व्यापकता हासिल की है। यदि इन संबंधों को आँकड़ों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग कितनी तेजी से आगे बढ़ा है। जहाँ पाँच वर्ष पहले द्विपक्षीय व्यापार का कुल मूल्य लगभग 8 अरब डॉलर था, वहीं यह अब बढ़कर 68 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। यह वृद्धि न केवल आपसी आर्थिक भरोसे को दर्शाती है, बल्कि भविष्य में सहयोग के और अधिक विस्तार की संभावनाओं को भी मजबूत करती है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता को महत्वपूर्ण सहारा मिला है। इसी प्रकार रक्षा क्षेत्र में भी भारत का रूस पर भरोसा कायम है। भारतीय सेना के साजो-सामान और रणनीतिक हथियारों का बड़ा हिस्सा अब भी रूसी तकनीक पर आधारित है, जो दशकों पुराने रक्षा सहयोग की गहराई को रेखांकित करता है।

काफी वर्षों के अंतराल के बाद जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने दो दिवसीय भारत दौरे पर पहुँचे, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं एयरपोर्ट जाकर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। रेड कार्पेट अभिवादन के साथ उच्चतम स्तर का सम्मान प्रदर्शित करते हुए राष्ट्रपति पुतिन को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ भी प्रदान किया गया। यह दृश्य भारत की ओर से दिखाए गए विशेष सम्मान और द्विपक्षीय संबंधों की गहनता का स्पष्ट प्रतीक था। अगली सुबह राष्ट्रपति भवन में उनका औपचारिक और भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया गया। सैन्य बैंड, परंपरागत प्रोटोकॉल और पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ आयोजित इस कार्यक्रम ने भारत-रूस संबंधों की गहराई को एक बार फिर उजागर किया। इन सभी राजकीय औपचारिकताओं और गर्मजोशी भरे स्वागत ने यह संदेश दुनिया तक स्पष्ट रूप से पहुँचा दिया कि भारत और रूस की मित्रता सामान्य कूटनीतिक संबंधों से कहीं अधिक विशेष और रणनीतिक महत्व रखती है। दोनों देशों की यह साझेदारी बदलते वैश्विक परिदृश्य में भी दृढ़ और स्थिर बनी हुई है।

रूसी राष्ट्रपति की इस भारत यात्रा पर पूरे विश्व की निगाहें टिकी हुई थीं। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियोंकृविशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘टैरिफ राजनीति’कृने अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को दो स्पष्ट धड़ों में विभाजित कर दिया है। ऐसी जटिल स्थिति में भारत की विदेश नीति और उसकी सामरिक संतुलन क्षमता की परीक्षा भी लगातार होती रही है। भारत लंबे समय से रूस और अमेरिका दोनों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध आरंभ होने के बाद भी भारत ने स्वयं को तटस्थ रखते हुए संवाद और शांति-सुलह की वकालत की। किन्तु जब से अमेरिका ने वैश्विक स्तर पर अपनी टैरिफ नीतियों को आक्रामक रूप दिया है, तब से भारत-अमेरिका संबंधों की सहजता पर प्रभाव पड़ा है। इसी पृष्ठभूमि में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा और अधिक महत्वपूर्ण हो गई।

दो दिवसीय दौरे के दौरान संपन्न हुए शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के बीच कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, व्यापार और तकनीकी सहयोग से जुड़े इन संधियों ने भारत-रूस साझेदारी को नई मजबूती और दिशा प्रदान की। इस यात्रा ने वैश्विक स्तर पर यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारत और रूस की मित्रता केवल आर्थिक या सामरिक हितों पर आधारित नहीं है, बल्कि यह संबंध विश्वास, परस्पर सम्मान और दशकों पुराने भावनात्मक जुड़ाव पर टिका है। भारत और रूस ने विश्व मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए यह प्रदर्शित किया कि बदलते भू-राजनीतिक माहौल के बावजूद उनकी मित्रता स्थिर, गहरी और पारस्परिक हितों से कहीं आगे की है-ऐसी मित्रता जो समय, परिस्थिति और वैश्विक दबावों की परवाह किए बिना निरंतर मजबूत होती चली आ रही है।

भारत और रूस के बीच दशकों से चली आ रही गहरी मित्रता ने बदलते वैश्विक समीकरणों और राजनीतिक तनावों के बीच भी अपनी मजबूती बनाए रखी है। पुतिन की हालिया भारत यात्रा ने न केवल दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को पुनः पुष्ट किया, बल्कि यह भी प्रदर्शित किया कि यह साझेदारी समय और परिस्थितियों से परे है। शिखर सम्मेलन में हुए समझौतों ने द्विपक्षीय सहयोग के नए द्वार खोले और यह संदेश स्पष्ट किया कि भारत और रूस की दोस्ती केवल रणनीतिक हितों पर आधारित नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और विश्वास की नींव पर खड़ी है। वैश्विक ध्रुवीकरण के इस दौर में दोनों देशों ने मिलकर अपनी विशेष साझेदारी को और अधिक सुदृढ़ करने का संकल्प दिखाया है, जो भविष्य की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

– डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत, आगरा

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