महापुरुष-गुरुजन हमें अपने तदरूप बनाना चाहते हैं – पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी

माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी का निर्वाण दिवस मनाया गया

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पड़ाव, वाराणसी/ हमलोगों का आचरण-व्यवहार हर जगह बदलता रहता है। जैसा व्यवहार-आचरण हमलोग यहाँ या अपने दूसरे आश्रम में करते हैं, जैसा बात-विचार यहाँ करते हैं, यहाँ से जाने के बाद हमारा आचरण-व्यवहार, विचार, भावनाएं आदि दूसरी हो जाती हैं। जीवन के बहुत से ऐसे भटकाव हैं, आकर्षण हैं, जिनको रोकने के लिए कहा गया है।

पूज्य बाबा जी ने कहा कि शिक्षा बहुत आवश्यक है- आगे बढ़ाने के लिए, राष्ट्र-समाज को दिशा देने के लिए, आगे बढ़ाने के लिए। लेकिन इसमें अपवाद भी है, क्योंकि कई लोग शिक्षा लेकर ऊटपटांग कृत्य भी करते हैं, देशद्रोह करते हैं और वहीं कोई अशिक्षित हैं फिर भी बहुत अच्छा कार्य करते हैं। माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी कितना पढ़ी थीं, उस समय पढ़ाई-लिखाई, स्कूल बहुत कम थे, जाने की कोई सुविधा नहीं थी। वैसे ही परमपूज्य अघोरेश्वर कहाँ तक पढ़े? नहीं पढ़े थे। आप सोच लीजिए कि वह पढ़े नहीं लेकिन खूब पढ़े-लिखे, विद्वान भी उनसे आकर शिक्षा लेते थे। हमारा जो संस्कार है, संस्कृति है हमारे जो संत-महात्मा हैं, महापुरुष हैं- वह क्या कहते हैं, किस चीज को प्राप्त करने के लिए कहते हैं? वह अपने आत्मानुसंधान के लिए, ध्यान-धारणाओं के लिए कहते हैं। वह आपको अपने जैसा बनाना चाहते हैं।

पूज्य श्री ने समझाया कि जैसे वह भृंगी मिट्टी का घर बनाती है फिर उसमे रेंगने वाले कीड़े को पकड़ कर ले आती है और उसमे बंद कर देती है, डंक मारती है। वह कीड़ा उसी को देखता-सुनता है, उसको बहुत भय उत्पन्न होता है और उसी को याद करते-करते वह रेंगने वाले कीड़े को भी पंख निकल आते हैं, वह उस भृंगी के तदरूप हो जाता है। भय भी कभी-कभी उत्पन्न किया जाता है कि किसी में सुधार आ जाए। क्योंकि भय बिन होय न प्रीत। एक जो सबसे बड़ा सत्य है जो हम सबके सामने रोज घटता है- वह है मृत्यु, लेकिन उससे भी हम भयभीत होते हैं। महापुरुषों के लिए तो मृत्यु वही है जैसे कि आप रोज कपड़ा बदलते हैं, वैसे ही उनका शरीर बदलता है, शरीर ही छूटता है। हम अपने-आप को, अपनी आत्मा को, परम पवित्र आत्मा समझेंगे, ईश्वर का अंश समझेंगे, तभी हम कुछ कर पाएंगे और हमारे यहाँ आने-जाने की सार्थकता तभी सिद्ध होगी।

मंत्र हमारा मित्र है जो हमें रास्ता दिखाता रहता है। मित्र वही होता है जो अच्छा रास्ता दिखाता है, सही रास्ता दिखाता  आपको बुरा भी लग सकता है आपको भला भी लग सकता है। वह मित्र है, वह गुरु है, वह अपने अभ्यंतर का वह चिंतन है, वह सही रास्ता देगा। हमारे महापुरुषों ने, मैत्रायण योगिनी ने भी जो समझाया, कहा, अघोरेश्वर महाप्रभु ने भी हम लोग को जो कहा उसे पर हम अवश्य चिंतन करें। हमारा जीवन ही ज्यादा से ज्यादा 100 वर्ष है, उतना तो बहुत हो गया।  आजकल तो नौजवान से लेकर, छोटे से लेकर बड़े तक का हाल यह है कि कोई कहीं भी गिर जा रहा है।  तो बंधु इस क्षणभंगुर जीवन को हमलोग समझें और अपने जीवन के भौतिक कार्यों के साथ-साथ अपने आध्यात्मिक और अपने अभ्यंतर, अपने गुरु, अपने ईश्वर के प्रति भी जो कुछ हमारे कर्तव्य बनते हैं उसको भी हमलोग पूर्ण करें।

ये बातें माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी का 34 वें निर्वाण दिवस पर मंगलवार, दिनांक 13 जनवरी, 2026  को वाराणसी के गंगातट अघोरेश्वर भगवान राम घाट पर स्थित महाविभूति स्थल के पुनीत प्रांगण में मध्याह्न 12 बजे आयोजित एक पारिवारिक विचार गोष्ठी में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने अपने आशीर्वचन में कहीं। वक्ताओं में डॉ० दिव्या सिंह, वसुंधरा सिंह, नीतिका सिंह, शालिनी पाण्डेय, कुमारी शुभदा पाण्डेय ने अपने विचार व्यक्त किये। सोनी सिंह ने भजन गाया। कुमारी राशि ने मंगलाचरण किया। गोष्ठी का सञ्चालन अवधूत भगवन राम नर्सरी विद्यालय की अध्यापिका श्रीमती सुष्मिता ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्था के उपाध्यक्ष सुरेश सिंह जी ने किया।     

इससे पूर्व अघोरेश्वर महाविभूति स्थल के पुनीत प्रांगण में परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी की जननी “माँ महा मैत्रायणी योगिनी जी” का निर्वाण दिवस बड़ी ही श्रद्धा एवं भक्तिमय वातावरण में श्रद्धालुओं द्वारा मनाया गया। मनाने के क्रम में प्रातः आश्रम परिसर की साफ-सफाई की गई। लगभग 8:30 बजे से पूज्यपाद बाबा गुरुपद संभव राम जी ने परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु एवं माताजी की समाधि पर माल्यार्पण, पूजन एवं आरती किया। इसके बाद पृथ्वीपाल जी ने सफलयोनि का पाठ किया। तत्पश्चात् पूज्य बाबा जी ने हवन-पूजन किया। श्रद्धालुओं मे प्रसाद वितरित किया गया।

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