सुभारती विश्वविद्यालय में दस दिवसीय कजरी लोकगायन एवं नृत्य कार्यशाला का भव्य शुभारंभ

 लखनऊ: भारतीय लोकसंस्कृति के संरक्षण और युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ में दस दिवसीय कजरी लोकगायन एवं नृत्य कार्यशाला का कल 26 जुलाई, 2025 को भव्य शुभारंभ किया गया। यह कार्यशाला उत्तर प्रदेश एवं जनजातीय लोक कला संस्कृति संस्थान, लखनऊ के सौजन्य से विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित की जा रही है।

कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रमोद शर्मा द्वारा माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ पदाधिकारी, संकाय सदस्य, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। उद्घाटन समारोह में सभी ने लोककला के पुनर्जीवन और संरक्षण की दिशा में इस प्रकार के आयोजनों की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में भाषा विभागाध्यक्ष ने उपस्थित विद्यार्थियों को कजरी की परंपरा और सांस्कृतिक महत्ता से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि कजरी उत्तर भारत की एक विशिष्ट लोकगायन शैली है, जो सावन के महीने में महिलाओं द्वारा गाई जाती है, जिसमें प्रेम, विरह, प्रकृति, उत्सव और स्त्री मन की भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति होती है। उन्होंने कहा कि कजरी सिर्फ गायन नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव है जिसमें संगीत और नृत्य दोनों का समावेश होता है।

इस कार्यशाला के प्रमुख प्रशिक्षक गौरब साहा हैं, जो लोकसंगीत एवं नृत्य के अनुभवी कलाकार हैं। वे प्रतिदिन विद्यार्थियों को कजरी गायन की पारंपरिक बंदिशें, लय, ताल एवं शैली का प्रशिक्षण दे रहे हैं। इसके साथ ही छात्रों को कजरी नृत्य की भी विधिवत शिक्षा दी जा रही है, जिसमें पारंपरिक वेशभूषा, भाव-भंगिमा और समूहगत प्रस्तुतियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

कार्यशाला के प्रथम दिन ही विद्यार्थियों द्वारा सीखे गए कजरी नृत्य और गायन की आकर्षक प्रस्तुति दी गई, जिसमें उन्होंने बरसी जाए सावन की बदरिया जैसे पारंपरिक गीतों पर भावपूर्ण नृत्य किया। यह प्रस्तुति दर्शकों के लिए अत्यंत हर्ष और आनंद का कारण बनी तथा कार्यक्रम स्थल तालियों से गूंज उठा। इस अवसर पर कुलपति ने कहा, ऐसे आयोजनों से हमारी नई पीढ़ी लोकसंस्कृति के वास्तविक स्वरूप को जान पाती है। आज जब वैश्वीकरण के कारण पारंपरिक कलाएं संकट में हैं, ऐसे में विश्वविद्यालयों की यह जिम्मेदारी है कि वे ज्ञान के साथ-साथ संस्कृति का भी संवहन करें। इस दस दिवसीय कार्यशाला का उद्देश्य न केवल कजरी जैसी लोक विधा का संरक्षण करना है, बल्कि युवा वर्ग में इसके प्रति रुचि जागृत करना और उन्हें इसकी शुद्ध शैली से अवगत कराना भी है।

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