आज कैबिनेट के निर्णय में राज्य कर्मचारियों पर  कसा शिकंजा

राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष जे एन तिवारी ने दिया प्रतिक्रिया कर्मचारियों को बनाया जा रहा है निशाना 

NTPC

कर्मचारियों से संबंधित लाभकारी निर्णय किए जा रहे हैं विलंबित 

लखनऊ 10 मार्च, 

राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष जे एन तिवारी ने आज लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्य  की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में अनुमोदित 30 प्रस्तावों में से  कर्मचारी आचरण नियमावली में संशोधन से संबंधित प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अवगत कराया है कि सरकार जानबूझकर कर्मचारियों पर लगातार शिकंजा कसती जा रही है ।पहले ही मुख्य सचिव के एक आदेश से 68000 कर्मचारियों  का जनवरी से वेतन रोका गया है। अब कर्मचारी आचरण नियमावली में  संशोधन करते हुए दो माह के मूल वेतन से अधिक मूल्य की किसी भी चल संपत्ति, वाहन ,सोना,  निवेश की सूचना तत्काल विभाग अध्यक्ष को देने तथा 6 माह के मूल वेतन से ज्यादा शेयर मार्केट में निवेश पर घोषणा करने का बाध्यकारी परिवर्तन किया जा रहा है।

जे  एन तिवारी ने कहा है कि किसी भी नई चल अचल संपत्ति के क्रय करने तथा प्रत्येक वर्ष अपनी संपत्ति का विवरण उपलब्ध कराने की व्यवस्था आचरण नियमावली में पहले से ही है। इसी व्यवस्था के अंतर्गत प्रवेश के 68000 कर्मचारियों का जनवरी से वेतन रोका गया है, क्योंकि इन कर्मचारियों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा पोर्टल पर अपलोड नहीं किया है। जे एन तिवारी ने कहा है कि आचरण नियमावली के वर्तमान संशोधन से कर्मचारियों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के भी लाले पड़ जाएंगे। यदि कर्मचारी अपनी बेटी की शादी करता है तो उसको वाहन एवं गहने खरीदने पड़ते हैं किसी भी वाहन की कीमत 2 लाख से कम नहीं है तथा सोना सरकार के नियंत्रण से बाहर चल रहा है। सोने की कीमत प्रति 10 ग्राम, 1.5 लाख से भी अधिक है। ऐसी स्थिति में कर्मचारी को बेटी की शादी के लिए सरकार से अनुमति लेकर खर्च करना होगा? मकान बनाने तथा शादी विवाह जैसे समारोह पर होने वाले खर्च के लिए कर्मचारी कर्ज लेकर अपनी इज्जत संभालता है लेकिन सरकार अब कर्मचारियों को बेपर्दा करने पर उतर आई है। उन्होंने आगे कहा है कि  सरकार कर्मचारियों को  लगातार परेशान कर रही है। कर्मचारियों को परेशान करने से संबंधित  आदेश निरंतर जारी किए जा रहे हैं तथा  उनका कड़ाई से पालन भी किया जा रहा है ,जबकि कर्मचारियों के हित लाभ से संबंधित निर्णय वर्षों से लंबित हैं ,उन पर कोई कार्यवाही नहीं की जारही है।  चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग में इलेक्ट्रीशियन, कीट संग्रह कर्ता ,मलेरिया फाइलेरिया,  ईसीजी टेक्निशियन संवर्ग की नियमावलियां वर्षों से लंबित हैं, खाद्य रसद विभाग में नियमावली लंबित होने के कारण पदोन्नति नहीं हो रही है, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई  विभाग में 2011 से मेठ संवर्ग के पदोन्नति से संबंधित नियमावली लंबित है। उच्च शिक्षा विभाग में राज्य विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के लिए कोई नियमावली नहीं है। उनके खिलाफ कार्यवाही करने के लिए सरकारी आचरण नियमावली थोपी जाती है जबकि राज्य विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को सेवा में सेवानिवृत्ति पर अवकाश नगदी करण देने  के संबंध में सरकारी नियमावली को अनदेखी कर दी जाती है।

कर्मचारियों से संबंधित इन समस्याओं पर सरकार कार्यवाही नहीं कर रही है, लेकिन कर्मचारियों को परेशान करने की नीयत से आचरण नियमावली में संशोधन करके कर्मचारियों पर शिकंजा कसा जा रहा है। 2001 के बाद संविदा कर्मियों के नियमितीकरण की नियमावली विगत 25 वर्षों से जारी नहीं की गई है, सरकार उस पर निर्णय नहीं ले रही है। आउटसोर्स कर्मचारियों के शोषण पर भी कार्यवाही धरातल पर नहीं उत्तर सकी है। मुख्य सचिव समिति , 7वें वेतन आयोग की संस्तुतियों पर निर्णय नहीं कर रही है। आशा, आंगनवाड़ी, शिक्षा मित्रों के मानदेय बढ़ाने की घोषणा तो लगातार हो रही है लेकिन उन पर अमल नहीं हो रहा है।  जे एन तिवारी ने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि कर्मचारी पर शिकंजा कसते समय यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कर्मचारियों के हित लाभ से संबंधित निर्णय शासन में  लंबित न रहे तथा उन पर समय-समय पर निर्णय लिया जाता रहे। जे एन तिवारी ने अवगत कराया है कि कर्मचारी आचरण नियमावली में संशोधन का प्रभाव प्रदेश के 12 लाख राज्य कर्मचारियों पर सीधा पड़ेगा जबकि उन विभागों में जहां पर विभागीय नियमावली लागू नहीं है उन विभागों के कर्मचारी भी इस संशोधन से प्रभावित होंगे।  संयुक्त परिषद  के अध्यक्ष जे एन तिवारी ने अवगत कराया है  कि मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव कार्मिक एवं शासन के सभी प्रमुख सचिव, अपर मुख्य सचिव कर्मचारी संगठनों के साथ कर्मचारियों की समस्याओं पर वार्ता नहीं कर  कर रहे हैं। मुख्यमंत्री का ध्यान बार-बार आकृष्ट करने पर भी कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। संवाद हीनता के चलते प्रदेश के कर्मचारी पहले से ही सरकार से नाराज हैं इस तरह के गैर जरूरी आदेशों  से कर्मचारियों में  नाराजगी अधिक बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। 

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