वरिष्ठ कृषि बैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह को बासमती चावल विकास में उत्कृष्ट योगदान हेतु दिया गया पद्मश्री 

वाराणसी। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर–आईएआरआई), पूसा, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक एवं कुलपति डॉ. अशोक कुमार सिंह को बासमती चावल की उन्नत किस्मों के विकास में उनके उत्कृष्ट और दीर्घकालिक योगदान के लिए पद्म श्री पुरस्कार–2026 से सम्मानित किया गया है। उनके शोध एवं नवाचारों ने न केवल भारत के कृषि निर्यात को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है, बल्कि देश के लाखों किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है।

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     पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के छोटे से गाँव बरहट में जन्मे डॉ. सिंह एक कृषक परिवार में पले-बढ़े, जहाँ कृषि केवल आजीविका नहीं बल्कि जीवन का आधार थी। उनके पिता, स्व. श्री केदारनाथ सिंह, एक नवोन्मेषी किसान थे, जिनके साथ बचपन से खेतों में काम करते हुए डॉ. सिंह के मन में कृषि के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई। यही अनुभव उनके जीवन का उद्देश्य बना—किसानों और खेती के लिए समर्पित रहना। उन्होंने अपने क्षेत्र में ही हाई स्कूल (कृषि) और इंटरमीडिएट (कृषि) की शिक्षा पूरी की, जिसके लिए वे प्रतिदिन लगभग 25 किलोमीटर साइकिल से कॉलेज जाते थे। उनकी प्रतिभा का प्रमाण तब मिला जब उन्होंने यूपी बोर्ड इंटरमीडिएट परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया—जो देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्डों में से एक है। इसके बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), वाराणसी से स्नातक एवं स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली से पीएचडी प्राप्त की। यह उनके जीवन का एक विशिष्ट और प्रेरणादायक क्षण रहा जब वे आगे चलकर उसी संस्थान के निदेशक एवं कुलपति बने, जहाँ वे कभी छात्र थे।

एक अग्रणी धान प्रजनक (लीड राइस ब्रीडर) के रूप में डॉ. सिंह ने देश की सबसे सफल बासमती किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनमें पूसा बासमती 1509 और पूसा बासमती 1692 प्रमुख हैं। आणविक प्रजनन तकनीकों का उपयोग करते हुए उन्होंने उच्च गुणवत्ता वाले दाने के साथ धान में बैक्टीरियल ब्लाइट, ब्लास्ट और बकाने रोग के प्रतिरोध को सफलतापूर्वक संयोजित किया, जिससे पूसा बासमती 1718, 1728, 1847, 1885 और 1886 जैसी ऐतिहासिक किस्में विकसित हुईं। उन्होंने खरपतवारनाशी सहनशील (हर्बिसाइड टॉलरेंट) बासमती किस्मों, पूसा बासमती 1979 और 1985, के विकास का भी नेतृत्व किया, जिससे धान की सीधी बुआई (डिएसआर) को बढ़ावा मिला। इसके अलावा वे प्रतिष्ठित पूसा बासमती 1121 के सह-प्रजनक भी रहे हैं। आज उनकी विकसित की गई किस्में भौगोलिक संकेतक (जीआई) क्षेत्र में 25 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में उगाई जा रही हैं, जिससे प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ टन परिष्कृत बासमती चावल का उत्पादन होता है। इनमें से लगभग 60 लाख टन चावल का निर्यात किया जाता है, जिससे करीब 6 अरब अमेरिकी डॉलर (₹51,000 करोड़) का विदेशी मुद्रा अर्जन होता है—जो भारत के कुल कृषि निर्यात का लगभग 12 प्रतिशत है। इन उपलब्धियों से न केवल देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हुई है, बल्कि लाखों किसानों के जीवन में समृद्धि, स्थिरता और सम्मान आया है। बढ़ी हुई आय से किसान परिवार अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश कर पा रहे हैं।

डॉ. सिंह का किसानों से रिश्ता केवल वैज्ञानिक या पेशेवर नहीं है—वे उन्हें परिवार का सदस्य मानते हैं। किसान उन्हें अपने सुख-दुख का साथी मानते हैं और इसी स्नेह से उन्हें “बासमती किंग” कहा जाता है। हालांकि, डॉ. सिंह इस उपाधि को अत्यंत विनम्रता के साथ स्वीकार करते हैं और इसे किसानों की उनके प्रति प्रेम व सम्मान की अभिव्यक्ति मानते हैं।

     पद्म श्री–2026 का यह सम्मान डॉ. अशोक कुमार सिंह के उस जीवनभर के समर्पण की राष्ट्रीय स्वीकृति है, जिसने विज्ञान, किसान और देश की कृषि समृद्धि को एक सूत्र में बाँधा है।

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