मुख्यमंत्री एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक ने दिव्य गीता प्रेरणा उत्सव का शुभारम्भ किया

श्रीमद्भगवद्गीता 140 करोड़ भारतवासियों के लिए दिव्य मंत्र,प्रत्येक व्यक्ति को इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए : मुख्यमंत्री

श्रीमद्भगवद्गीता की दिव्य वाणी ‘वे ऑफ लाइफ’ तथा जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त करने वाली यदि कोई व्यक्ति अच्छे कर्म करेगा, तो पुण्य का भागीदार बनेगा,गलत कार्य करने पर पाप का भागीदार बनेगा, जब प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी इसी भाव से आगे बढ़ता, तो वह अच्छे कर्म करने का प्रयास करता दिव्य गीता प्रेरणा महोत्सव

लखनऊ :  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डॉ0 मोहन भागवत ने आज यहां दिव्य गीता प्रेरणा उत्सव का शुभारम्भ किया। मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारतीय परम्परा ने धर्म को उपासना विधि मात्र न मानकर जीवन जीने की कला माना है। श्रीमद्भगवद्गीता की दिव्य वाणी ‘वे ऑफ लाइफ’ तथा जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त करने वाली है। श्रीमद्भगवद्गीता 140 करोड़ भारतवासियों के लिए दिव्य मंत्र है। प्रत्येक व्यक्ति को इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः’ धर्मक्षेत्र से ही प्रारम्भ होता है। दुनिया में कहीं भी युद्ध का मैदान धर्मक्षेत्र के नाम से उल्लिखित नहीं किया गया है। हमारे यहां प्रत्येक कर्तव्य पवित्र भाव से संयुक्त किया गया है। यदि कोई व्यक्ति अच्छे कर्म करेगा, तो वह पुण्य का भागीदार बनेगा। गलत कार्य करने पर वह पाप का भागीदार बनता है। जब प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी इसी भाव से आगे बढ़ता है, तो वह अच्छे कर्म करने का प्रयास करता है। भारत ने प्राचीनकाल से विश्व मानवता को यही सन्देश दिया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि दिव्य गीता प्रेरणा महोत्सव श्रीमद्भगवद्गीता के 700 श्लोकों का स्मरण करा रहा है, जिन्हें भारत का प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी जीवन का मन्त्र मानकर पवित्रता व आदरभाव के साथ आत्मसात करने का प्रयास करता है। 18 अध्यायों में संकलित श्रीमद्भगवद्गीता प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी को धर्म की वास्तविक प्रेरणा प्रदान करती है। जैसा यहां पूज्य स्वामी परमात्मानन्द गिरी जी महाराज ने कहा है कि श्रीमद्भगवद्गीता धर्म से प्रारम्भ होकर अन्त में उसी मर्म के साथ अपना विराम प्राप्त करती है। भारतीय मनीषा धर्म को कर्तव्य के साथ जोड़कर देखती है। स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज ने जीओ गीता को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छोटे-छोटे उद्धरण के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। उन्होंने श्रमिक, किसान, महिला, विद्यार्थी, युवा, नौकरीपेशा व्यक्ति, चिकित्सक, अधिवक्ता, व्यापारी, योद्धा तथा सैनिक के लिए गीता का महत्व जीओ गीता के माध्यम से प्रस्तुत किया है। उनकी छोटी-छोटी पुस्तकें अत्यन्त प्रेरणादायी होती हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय परम्परा ने यह कभी नहीं कहा कि जो हम कह रहे हैं, वही सबकुछ है। हमने यह कभी नहीं कहा कि हमारी उपासना विधि ही सर्वश्रेष्ठ है। हमने सबकुछ होते हुए भी कभी भी अपनी श्रेष्ठता का डंका नहीं पीटा। जो आया उसको शरण प्रदान की। जिसके ऊपर विपत्ति आयी उसके साथ खड़े हो गए। जिसके सामने कोई चुनौती आयी, उस चुनौती का सामना करने के लिए सनातन धर्मावलम्बी उसके साथ सहयोग के लिए खड़ा हुआ। किसी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। भारत की भूमि ने ‘जियो और जीने दो’ की प्रेरणा प्रदान की है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत ने ‘अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम्’ की प्रेरणा भी प्रदान की है। गीता के अन्तिम श्लोक में धृतराष्ट्र पूछते हैं कि इस युद्ध का क्या परिणाम निकलने वाला है। तो उनसे कहा गया कि युद्ध का परिणाम पहले से तय है। ‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः, तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम’ अर्थात जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ निश्चित रूप से श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है। ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ अर्थात जहाँ धर्म और कर्तव्य होंगे वहाँ विजय सुनिश्चित है। अधर्म के मार्ग पर चलने से विजय कभी नहीं हो सकती। यह प्रकृति का अटूट नियम है। सदैव से यही हुआ है और यही होता आ रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः’ अर्थात अपने धर्म व कर्तव्य पथ पर चलकर मृत्यु का वरण करना श्रेष्यकर है, लेकिन स्वार्थ के लिए अपने कर्तव्यों से च्युत होना पतन का कारण है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ श्लोक हमें ऐसा कर्म करने की प्रेरणा प्रदान करता है, जिसमें फल की इच्छा न की जाय। हम सभी को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रदान की गयी निष्काम कर्म की प्रेरणा अपने जीवन में उतारनी चाहिए। आज के समारोह के मुख्य अतिथि डॉ0 मोहन भागवत जी निष्काम कर्म के प्रेरणा स्रोत हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने शताब्दी महोत्सव कार्यक्रम के साथ जुड़ रहा है। यह दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय है। दुनिया से आये हुए एम्बेस्डर और हाई कमिश्नर हमसे सदैव पूछते हैं कि क्या आपका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है। हम उन्हें जवाब देते हैं कि हमने राष्ट्रीय स्वयं संघ में एक स्वयं सेवक के रूप में कार्य किया है। जब वह पूछते हैं कि यह इतना बड़ा संगठन कैसे बना तथा इसकी फण्डिंग का क्या पैटर्न है, तो हम उन्हें जवाब देते हैं कि यह संगठन समाज के सहयोग से खड़ा हुआ है तथा समाज के कल्याण के लिए समर्पित भाव के साथ प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करता है।
 राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डॉ0 मोहन भागवत ने कहा कि हमें गीता को अपने जीवन में उतारना आवश्यक है। गीता में कुल 700 श्लोक हैं। यदि हम प्रत्येक दिन गीता के 02 श्लोक पढ़ेंगे, उनपर मनन करेंगे तथा उससे प्राप्त सार अपने जीवन में लागू करेंगे, तो हमारा जीवन वर्षभर में गीतामय बनने की दिशा में अग्रसर हो जाएगा। जैसे कुरुक्षेत्र में अर्जुन मोहग्रस्त हुए थे, वैसे ही आज सम्पूर्ण विश्व जीवन के रणांगन में भय व मोह ग्रस्त होकर दिग्भ्रमित हो चुका है। जैसा कि मुख्यमंत्री जी ने कहा कि हमें धर्मानुसार कार्य करते हुए फल की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। जो भी परिणाम प्राप्त होगा, उससे हमें लाभ ही मिलेगा।  इस अवसर पर जियो गीता के संस्थापक स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज, अखिल भारतीय आचार्य महासभा के महासचिव स्वामी परमात्मानन्द जी महाराज, स्वामी श्रीधराचार्य जी महाराज, स्वामी सन्तोषाचार्य जी महाराज, स्वामी धर्मेन्द्र दास जी महाराज सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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