(विश्व जल दिवस पर विशेष आलेख)


यमुना नदी यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है और गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है। भारतवर्ष की सर्वाधिक पवित्र और प्राचीन नदियों में यमुना को गंगा के साथ रखा जाता है। आज यह नदी गंगा नदी से भी ज्यादा प्रदूषित है। जिस तरह गंगा नदी का सांस्कृतिक इतिहास है उसी प्रकार यमुना नदी का भी सांस्कृतिक इतिहास है। सम्पूर्ण ब्रज क्षेत्र की तो यमुना एक मात्र महत्वपूर्ण नदी है। जहां तक ब्रज संस्कृति का संबध है, यमुना को केवल नदी कहना ही पर्याप्त नहीं है। वस्तुतः यह ब्रज संस्कृति की सहायक, इसकी दीर्ध कालीन परम्परा की प्रेरक और यहा की धार्मिक भावना की प्रमुख आधार रही है। जिस प्रकार ब्रज क्षेत्र में कृष्ण का स्थान है उसी प्रकार ब्रज में यमुना का स्थान है। आज उसी नदी यमुना में प्रदूषण का स्तर खतरनाक है, और दिल्ली से आगे जा कर ये नदी मर रही है। यमुना सिर्फ एक नाला बन कर रह गयी है और इसकी सांसें छिन रही हैं।
जो लोग यमुना पर सालो से शोध कर रहे है उन विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी वजह है औद्योगिक प्रदूषण, बिना ट्रीटमेंट के कारखानों से निकले दूषित पानी को सीधे नदी में गिरा दिया जाना, यमुना किनारे बसी आबादी मल-मूत्र और गंदगी को सीधे नदी मे बहा देती है, लेकिन इनमें सबसे खतरनाक है रासायनिक कचरा जो कि यमुना किनारे लगे कारखाने उडेल रहे है। आज यमुना का हाल घर में पड़ी बूढ़ी मां की तरह हो गया है जिसे हम प्यार तो करते हैं, उसका लाभ भी उठाते हैं, लेकिन उसकी फिक्र नहीं करते। यमुना का आधार केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक भी है। इसके बावजूद इसकी दुर्दशा लगातार बढ़ती जा रही है। इस नदी का गौरवशाली इतिहास रहा है, इसलिए यमुना को प्रदूषण मुक्त कर उसकी गरिमा लौटने की मुहिम के लिए सभी देशवासिओ को आगे आना होगा। देश की हर नदी पर व्यवासायिक गतिविधियां दिनोदिन बढती जा रही है, कम से कम यमुना और देश की प्रमुख नदियों को इससे मुक्त रखने की जरूरत है।
दिल्ली का वजीराबाद बैराज एक ऐसा स्थान है, जहां यमुना की बदहाली का वास्तविक चित्र स्पष्ट हो जाता है। यहीं से नदी दिल्ली में प्रवेश करती है और यहीं पर इसका अधिकांश स्वच्छ जल पेयजल आपूर्ति के लिए मोड़ लिया जाता है। इसके बाद जो आगे बहता है, वह वास्तव में यमुना नहीं, बल्कि नालों का मिला हुआ प्रदूषित जल होता है। दिल्ली के लगभग 22 किलोमीटर के हिस्से में बहुत सारे नाले यमुना में गिरते हैं, जिससे इसकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाती है।

पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली सरकार द्वारा यमुना की सफाई के लिए कई प्रयास किए गए हैं। यमुना एक्शन प्लान के विभिन्न चरणों में करोड़ों रुपये खर्च किए गए, नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए गए, पुराने संयंत्रों का उन्नयन किया गया तथा नालों को इंटरसेप्ट कर ट्रीटमेंट की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही रिवरफ्रंट विकास और प्रदूषण की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग भी शुरू किया गया है। इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता और यमुना का जल पूर्ण रूप से प्रदूषित है। कई स्थानों पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर रहे, अनधिकृत कॉलोनियों का सीवेज अभी भी सीधे नदी में गिर रहा है, और औद्योगिक प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। यमुना एक्शन प्लान में भारी खर्च के बावजूद परिणाम न मिलना इसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। वास्तविकता यह है कि यमुना की स्थिति सुधारने के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
यमुना नदी एक हजार 29 किलोमीटर का जो सफर तय करती है, उसमें दिल्ली से लेकर चंबल तक का जो सात सौ किलोमीटर का जो सफर है उसमें सबसे ज्यादा प्रदूषण तो दिल्ली, आगरा और मथुरा का है। दिल्ली के वजीराबाद बैराज से निकलने के बाद यमुना की स्थिति बद से बदतर होती जाती है। इन जगहों पर यमुना के पानी में ऑक्सीजन तो है ही नही। चंबल नदी से मिलकर इस नदी को जीवन दान मिलता है और पुनः पुनर्जीवित होती है, वो फिर से अपने रूप में वापस आती है। नदी साफ रहने के लिए जरूरी है कि पानी बहने दिया जाए, हर जगह बांध बना कर उसे रोकने से काम नही चलेगा। दिल्ली के आगे जो बह रहा है वो यमुना है ही नही वो तो मल-जल और रासायनिक कचरा है। पहले मल-जल और रासायनिक पदार्थों को नदी में छोड़ दो और उसके बाद उसका उपचार करते रहो तो नदी कभी साफ नही हो सकती।
असल बात यह है कि कालिंदी की हालत सुधारने के लिए प्रयास तो किये गये लेकिन उनका परिणाम जमीन पर नहीं दिखा। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर भी कार्यक्रम चलाए गए पर हालात जस के तस रहे। इसके लिए जरूरत है दृढ संकल्प की जो कि हर भारतीय के अन्दर होना चाहिए, तब हमें करोडो रुपए बहाने की भी जरूरत नहीं पडेगी। सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोगो को यमुना को अपनी माँ का दर्जा देना होगा, क्यांेकि यमुना देश के करोडो लोगो की प्यास बुझती है चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम इसके लिए सभी को प्रयास करना चाहिए। इसके अलावा तब तक शांत नहीं बैठना है- जब तक यमुना निर्मल और अविरल नहीं हो जाती है। आज जरूरत है यमुनातट पर बसे लोगों को यमुना की दुर्दशा के बारे में बताने और उन्हें जागरूक करने की, तभी हम यमुना की धारा को अविरल, निर्मल तथा आचमन लायक बना सकते है- और ब्रज को वही पुरानी कालिंदी लौटा सकते है।
लेखक- डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत (यमुना और पर्यावरण चिन्तक)
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