(वीरांगना अवंतीबाई लोधी के 168वें बलिदान दिवस पर विशेष काव्य-रचना)


मध्यभारत की पावन धरती पर आज भी ज्वाला जलती है प्रचंड,
वीरों के रक्त से लिखी गाथाएँ करती हैं इतिहास को अनंत।
सिवनी के मनकेहणी ग्राम में जन्मी वह वीरांगना अपार,
जिसने बचपन से ही थाम लिया था शौर्य, साहस और तलवार।
रानी अवंतीबाई लोधी नाम नहीं केवल, रण में दहकती हुई एक ज्वाला थी प्रखर,
अन्याय के अंधकार में चमकती वह स्वाभिमान की अमर मशाल थी अमर।
रामगढ़ की रानी बनकर जिसने प्रजा का मान बढ़ाया था,
अन्याय के हर तूफान के आगे साहस से सिर उठाया था।
जब अंग्रेजों ने छल से छीन लिया उसका राज्य और उसका सम्मान,
तब उसके भीतर जाग उठा था स्वतंत्रता का प्रज्वलित महान तूफान।
चूड़ियों के संग भेजा संदेश-“या तो रण में उतरो, या लज्जा अपनाओ”,
उसके हर शब्द में था साहस-“या तो जियो शान से, या रण में प्राण गँवाओ।”
मंडला की रणभूमि में जब उसकी तलवार बिजली बनकर कड़कती थी,
तो दुश्मन की हर सांस उसी के प्रचंड प्रहार से थर-थर काँपती थी।
कम थी सेना, पर हर सैनिक में ज्वालामुखी सा साहस उफनता था,
हर हृदय में अवंतीबाई का ही अटल संकल्प प्रचंड स्वर में गूँजता था।
जब चारों ओर से घिर गई वह शत्रु की विशाल सेना के घोर प्रहार में,
तब भी अडिग खड़ी रही वह मातृभूमि के सम्मान और स्वाभिमान के द्वार में।
घायल होकर भी उसके नेत्रों में केवल स्वतंत्रता का उज्ज्वल स्वप्न रहा,
हर श्वास में मातृभूमि के चरणों में समर्पण का पवित्र तप रहा।
जब लगा कि अब शरीर बंधन बन रहा है आजादी के पथ में,
तब उसने प्राण अर्पित कर दिए भारत माँ के अमर रथ में।
देवहारगढ़ की पर्वत-भूमि पर अंतिम रण का दृश्य सजाया,
वहीं स्वयं की छाती में तलवार भोंक अमर बलिदान निभाया।
अपनी ही छाती में तलवार भोंककर जो गाथा उसने अमर बना दी,
वह केवल बलिदान नहीं, बल्कि युगों-युगों के लिए प्रेरणा जगा दी।
मरते-मरते भी अपनी प्रजा को निर्दोष बताकर जीवनदान दिया,
ऐसा त्याग, ऐसा करुणा का सागर उसने इतिहास को दान दिया।
आज 20 मार्च का यह पावन दिन उस बलिदान को याद दिलाता है,
हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम का अमर दीप जलाता है।
आओ प्रण लें, उसके आदर्शों को जीवन में साकार बनाएंगे हम,
अन्याय के हर अंधकार से लड़कर सत्य का दीप जलाएंगे हम।
नमन है उस वीरांगना को जिसने प्राणों से भी बढ़कर देश को माना,
भारत माँ की लाज बचाने को जिसने हँसकर जीवन को बलिदान ठाना।
हर वर्ष यह दिन हमें उसका अमर संदेश सुनाता रहेगा सदा,
अवंतीबाई का नाम युगों-युगों तक गूँजता रहेगा अमिट ध्वजा।
रचियता/लेखक
-डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत
(Dr. Brahmanand Rajput)
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