विंढमगंज। झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे बैरखड़ गांव में आदिवासी समाज ने सदियों पुरानी परंपरा निभाते हुए नियत तिथि से पांच दिन पहले ही होलिका दहन कर होली पर्व मना लिया। गांव में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरे विश्वास और रीति-रिवाज के साथ निभाई जाती है।निवर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल ने बताया कि अन्य स्थानों की अपेक्षा यहां पहले होली मनाने की परंपरा काफी पुरानी है।


ग्रामीणों के अनुसार पूर्वजों के समय होली के दौरान धन-जन हानि और महामारी जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी। इसके बाद समुदाय के बुजुर्गों और बैगा की सलाह पर तय तिथि से चार-पांच दिन पहले होली मनाने की शुरुआत हुई, जो आज तक जारी है।पूर्व प्रधान अमर सिंह गौड़, मनरूप गहंवां, छोटेलाल सिंह, रामकिशुन सिंह और लाल मोहन गोंड ने बताया कि होलिका दहन की रस्म बैगा या बिरादरी द्वारा मनोनीत व्यक्ति के माध्यम से “संवत डाड़” स्थल पर संपन्न कराई जाती है। अगले दिन अवशेष उड़ाते हुए पूरे दिन रंग खेला जाता है और इष्ट देव की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। गांव में परंपरा और आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला।

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