एचएनएलयू रायपुर में रामसर कन्वेंशन के 50 वर्ष पूर्ण होने पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन,छत्तीसगढ़ के पहले रामसर स्थल का स्मरण

रायपुर हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू), रायपुर ने 2 फ़रवरी 2026 को विश्व आर्द्रभूमि दिवस के अवसर पर “रामसर कन्वेंशन के 50 वर्ष: वैश्विक एवं भारतीय परिप्रेक्ष्य में आर्द्रभूमि संरक्षण” विषय पर एक ऑनलाइन राष्ट्रीय कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इस कार्यशाला के माध्यम से राज्य के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि का भी स्मरण किया गया, जिसमें कोपरा जलाशय को छत्तीसगढ़ के पहले रामसर स्थल के रूप में मान्यता मिलने का उल्लेख किया गया।

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उद्घाटन वक्तव्य देते हुए प्रो. (डॉ.) वी. सी. विवेकानंदन, कुलपति, एचएनएलयू रायपुर ने 1971 में अंगीकृत रामसर कन्वेंशन की स्थायी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। प्रो. विवेकानंदन ने कहा, “विश्व आर्द्रभूमि दिवस और कोपरा जलाशय को रामसर स्थल के रूप में नामित किया जाना केवल किसी अंतरराष्ट्रीय संधि का उत्सव या वैश्विक सूची में एक औपचारिक दर्जा भर नहीं है; यह इस सशक्त विचार की पुनः पुष्टि भी है कि आर्द्रभूमियाँ प्रकृति, मानव समुदाय और हमारे साझा भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।”

मुख्य भाषण डॉ. रितेश कुमार, निदेशक, वेटलैंड्स इंटरनेशनल – साउथ एशिया द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने रामसर ढांचे के अंतर्गत भारत की चार दशकों की यात्रा का विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने रामसर स्थलों के विस्तार तथा नियामक ढाँचों के विकास सहित भारत की उल्लेखनीय प्रगति को रेखांकित किया, साथ ही शासन, पारिस्थितिकी और संस्थागत चुनौतियों पर स्पष्ट रूप से प्रकाश डाला। डॉ. कुमार ने कहा, “आर्द्रभूमियाँ अक्सर अविवेकपूर्ण और अवैज्ञानिक कार्यक्रमों—जैसे कंक्रीटीकरण और सौंदर्यीकरण परियोजनाओं—का शिकार बन जाती हैं… जबकि वास्तव में उन्हें आईसीयू में रखने की आवश्यकता होती है, उन्हें ब्यूटी पार्लर उपचार दिया जाता है।” उन्होंने आर्द्रभूमियों के लिए एक राष्ट्रीय मिशन, अनुसंधान–नीति के बेहतर समन्वय, सुदृढ़ वित्तपोषण, क्षमता निर्माण तथा शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में आर्द्रभूमि शिक्षा के मुख्यधारा में समावेशन की आवश्यकता पर बल दिया।

प्रतीक वर्मा, विधिक सलाहकार, छत्तीसगढ़ राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने आर्द्रभूमि संरक्षण के विधिक और शासनगत आयामों पर विचार रखे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण विधि के एक आधारभूत उपकरण के रूप में रामसर कन्वेंशन के महत्व को रेखांकित किया तथा भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण को सुदृढ़ करने में न्यायालयों की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने विश्व आर्द्रभूमि दिवस को जन-जागरूकता सृजन तथा इन नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण हेतु राजनीतिक एवं संस्थागत संकल्प को सशक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर बताया।

यह कार्यक्रम डॉ. देबमिता मंडल, प्रमुख, सेंटर फॉर लॉ एंड साइंसेज़ द्वारा परिकल्पित एवं आयोजित किया गया तथा डॉ. राणा नवनीत रॉय, प्रमुख, सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉज़, एचएनएलयू के सहयोग से संपन्न हुआ। आयोजन वेटलैंड्स इंटरनेशनल – साउथ एशिया, छत्तीसगढ़ राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण तथा छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम का संचालन हिमांशी ठाकुर, एलएलएम छात्रा, एचएनएलयू द्वारा किया गया।

कार्यशाला में एचएनएलयू के संकाय सदस्यों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों तथा देशभर से 80 से अधिक प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी रही। कार्यक्रम का समापन इस सामूहिक आह्वान के साथ हुआ कि रामसर कन्वेंशन की भावना को स्वस्थ आर्द्रभूमियों, सुदृढ़ समुदायों, जागरूक नागरिकों और सतत विकास जैसे मापनीय परिणामों में रूपांतरित किया जाए, तथा छत्तीसगढ़ को भारत की आर्द्रभूमि संरक्षण यात्रा में एक उभरते हुए योगदानकर्ता के रूप में स्थापित किया जाए।

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