
“(होली पर्व पर विशेष काव्य-रचना)

फाल्गुन की उजली पूर्णिमा, जब नभ में मुस्काती है,
होलिका की पावन ज्वाला बुराई को जलाती है।
सत्य की राह दिखाकर हमको, नव विश्वास जगाती है,
अंधियारे मन के कोनों में भी उजियारा भर जाती है।
सुबह धुलेंडी रंग लिए जब आँगन में आ जाती है,
अबीर-गुलाल की खुशबू से हर गली महक जाती है।
छोटे-बड़े सब संग मिलकर प्रेम का रंग लगाते हैं,
रूठे-रूठे मन भी हँसकर फिर से मित्र बन जाते हैं।
ढोल मंजीरे गूँज उठें जब गीत फाग के गाए जाएँ,
नाचें गाएँ लोग सभी, हर चेहरे पर रंग समाएँ।
मन का मैल धुल जाए सारा, कटुता दूर भगाएँ,
गिले-शिकवे भूल सभी हम गले से गले मिल जाएँ।
ब्रज में छाए फागुन रस, बरसाना मुस्काता है,
राधा-कृष्ण की प्रेम कहानी हर दिल को भाती है।
लठमार की हँसी-ठिठोली में भी अपनापन रहता है,
सदियों से चलता यह उत्सव प्रेम-संदेशा कहता है।
होली केवल रंग नहीं, यह संस्कृति की शान है,
सौहार्द, प्रेम और भाईचारा भारत की पहचान है।
आओ मिलकर प्रण ये लें हम, द्वेष-द्वार सब बंद करें,
कटुता भुलाकर इस होली पर, फिर से प्रेम प्रचंड करें।
रचियता/लेखक
*डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत*
(Dr. Brahmanand Rajput)
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