एनटीपीसी कोरबा की प्रस्तुति “धरोहर” : अन्नपूर्णा देवी की विरासत को समर्पित दिव्य भारतीय शास्त्रीय संगीत संध्या

 कोरबा। एनटीपीसी कोरबा ने 24 जनवरी की संध्या को अपने सांस्कृतिक परिदृश्य को दिव्य राग–रस और शाश्वत परंपरा से सराबोर करते हुए “धरोहर” नामक भव्य भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य संध्या का आयोजन किया, जो महान संगीत मनीषी अन्नपूर्णा देवी की अमर विरासत को समर्पित थी। बसंत पंचमी की पावन भावना में आयोजित यह कार्यक्रम भारत की समृद्ध संगीत और कला परंपरा को सच्ची श्रद्धांजलि था — और “धरोहर” अर्थात् अमूल्य विरासत के भाव को पूर्णतः साकार करता था।

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यह प्रतिष्ठित कार्यक्रम एनटीपीसी कोरबा टाउनशिप स्थित अंबेडकर भवन में आयोजित हुआ। समारोह का शुभारंभ अतिथियों एवं विशिष्ट गणमान्यों के गरिमामय स्वागत के साथ हुआ। मुख्य अतिथि बिभास घटक, उनके साथ श्रीमती सुभ्रा घटक (अध्यक्ष, मैत्री महिला समिति) तथा एनटीपीसी के वरिष्ठ अधिकारियों का पारंपरिक स्वागत किया गया, जिससे पूरे वातावरण में गरिमा, श्रद्धा और सांस्कृतिक गौरव का भाव व्याप्त हो गया।

बसंत पंचमी — विद्या, संगीत और सृजन का पर्व — की भावना से ओत–प्रोत यह संध्या एक आध्यात्मिक और कलात्मक अर्पण के रूप में सजी। कार्यक्रम में देश के पाँच प्रतिष्ठित कलाकारों की प्रस्तुति रही, जो भारतीय शास्त्रीय परंपराओं के सच्चे संवाहक हैं:  पं. देबप्रसाद चक्रवर्ती – सितार पं.  सुदीप चट्टोपाध्याय – बांसुरी रूपक मित्र – तबला किशन कुमार देवांगन – हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन कल्पना साहू – कथक (शास्त्रीय नृत्य) कार्यक्रम की शुरुआत एकल प्रस्तुतियों से हुई, जिनमें दर्शकों ने भारतीय शास्त्रीय कलाओं की गहराई और विविधता का अनुभव किया। सितार की ध्यानमग्न गूंज, बांसुरी की मधुर लहरियाँ, तबले की सटीक लयकारी, शास्त्रीय गायन की भावपूर्ण अभिव्यक्ति और कथक की सौम्य मुद्राएँ — प्रत्येक प्रस्तुति अन्नपूर्णा देवी की प्रेरणा को नमन थी।कार्यक्रम का उत्कर्ष एक भव्य जुगलबंदी के साथ हुआ, जहाँ सभी कलाकारों ने एक साथ सुर, लय और भाव का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। इस सामूहिक प्रस्तुति ने वातावरण को मंत्रमुग्ध कर दिया और श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।समापन अवसर पर सभी कलाकारों को पारंपरिक डोकरा शिल्प स्मृति–चिह्न और कोसा शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया — जो सम्मान और सांस्कृतिक जड़ों का प्रतीक था ।“धरोहर” के माध्यम से एनटीपीसी कोरबा ने एक बार फिर भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ किया। यह केवल एक संगीत संध्या नहीं, बल्कि परंपरा, भक्ति और कलात्मक उत्कृष्टता का उज्ज्वल उत्सव था — जिसकी स्मृति सदा दर्शकों के हृदय में जीवित रहेगी।

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