वाराणसी। शनिवार, गंगातट,पड़ाव स्थित अघोरेश्वर महाविभूति स्थल के पुनीत प्रांगण में परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी का 34 वाँ महानिर्वाण दिवस बाबा भगवान राम ट्रस्ट,सर्वेश्वरी समूह एवं अघोर परिषद ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं अघोरेश्वर महाप्रभु के उत्तराधिकारी पूज्यपाद औघड़ बाबा गुरुपद संभव राम जी के सान्निध्य में तथा श्री सर्वेश्वरी समूह के हजारों सदस्यों, श्रद्धालुओं और शिष्यों द्वारा भक्तिमय वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर प्रात:कालीन सफाई श्रमदान के पश्चात लगभग 9:00 बजे पूज्यपाद बाबा गुरुपद संभव राम जी ने अघोरेश्वर महाप्रभु की भव्य समाधि में अघोरेश्वर महाप्रभु की प्रतिमा के समक्ष पुष्पांजलि, माल्यार्पण, पूजन एवं आरती किया। श्री पृथ्वीपाल जी ने सफलयोनि का पाठ किया। तत्पश्चात पूज्य बाबा ने हवन का कार्यक्रम संपन्न किया।
इसके पश्चात लगभग 12 बजे पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी की उपस्थिति में एक विचार गोष्ठी आयोजित की गई। गोष्ठी कि अध्यक्षता डॉ. वी. पी. सिंह ने की। वक्ताओं में भोलानाथ त्रिपाठी, तेजबल सिंह, शशि गुप्ता एवं अशोक कुमार जी थे। मंगलाचरण यशवंतनाथ शाहदेव ने, संचालन डॉ. बामदेव पाण्डेय तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्था के उपाध्यक्ष सुरेश सिंह ने किया।
इस अवसर पर अपना आशीर्वचन देते हुए पूज्य बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने कहा कि —

महापुरुषों की सेवाओं को सही अर्थों में हम प्राप्त करें
-पूज्यपाद बाबा औघड़ गुरूपद संभव राम जी
परमपूज्य अघोरेश्वर के महानिर्वाण दिवस पर हमलोग एकत्रित होते हैं तो उसके बारे में चिंतन-मनन करते हैं कि नहीं करते हैं या फिर जो अभी आप लोगों ने सुना कि मनुष्य की सेवा के लिए हमलोग कार्य करते हैं। लेकिन समस्या यह है कि सेवायें तो बहुत प्रकार की हैं। हम अपने आश्रमों में भी देखते हैं कि बहुत-सी इकाइयाँ हैं, वहाँ लोग सेवारत हैं, सेवा कर रहे हैं, शारीरिक सेवा में कोई अपना सहयोग दे रहा है, बनाने में दे रहा है, सजाने में दे रहा है, मेहनत करके दे रहा है, कोई खेत में दे रहा है। बहुत तरीके की सेवायें हैं। लेकिन जो सेवा महापुरुष लोग, महात्मा लोग देना चाहते हैं, वह सेवा हमलोग लेने के लिए तैयार भी नहीं रहते हैं। मनुष्य की सेवा कैसे हो सकती है? जब हम अपने स्वयं की सेवा में लगेंगे। हम अपने-आप को भुलाए हुए हैं, यही एक बहुत बड़ा दुख का कारण है। क्योंकि बाहरी दृष्टि जो है- बाहर तो बहुत तरह का उपद्रव है, बहुत तरह के कार्य हो रहे हैं, बहुत तरह की गतिविधियाँ हो रही हैं, जिनको देखते-देखते उस बाहरी दृष्टि से हम खुद ही विचलित हो जाते हैं, अस्थिर हो जाते हैं और अपनी जो सेवा है, जो महापुरुष देना चाहते हैं, जिनका यह महानिर्वाण दिवस मनाया है, कि सभी उस अवस्था को प्राप्त करें। उस अवस्था को प्राप्त न हों, तो कम-से-कम उसके करीब हों। और उसके करीब हों तो कम-से-कम यह मनुष्य योनि को पुनः प्राप्त करें। और अपनी आगे की यात्रा को जारी रखें। सभी अच्छे कार्य- करुणा, दया, मैत्री, प्रेम, सौहार्द, भाईचारा हमारे जीवन के लिए बहुमूल्य हैं। बातें कहने में तो बहुत आसान है। हमलोग कह भी देते हैं, हमलोग सुन भी लेते हैं, लेकिन करने के लिए हमलोग उद्धत नहीं हो पाते हैं। जब तक हमारी दृष्टि; बाह्य दृष्टि रहेगी, अपने-आप के लिए हमलोग नहीं सोचेंगे, तब तक दूसरे के लिए भी नहीं सोच सकते। अपने लिए हमलोग करुणाशील नहीं रहेंगे, अपने पर दयावान नहीं रहेंगे, अपने से हम अपने ऊपर न्याय नहीं करेंगे, तो हम दूसरों के लिए भी नहीं कर सकते हैं।
हमारे समूह के जो लोग हैं- वह बाहरी लोगों से कुछ अलग हैं, उनका व्यवहार-आचरण, उनकी जीवन शैली सब अलग है, क्योंकि वह इन विचारों से जुड़े हुए हैं। बाहर के लोगों को आपलोग देखते ही होंगे, हम सभी लोग देखते हैं कि बाहर कैसी जीवन शैली है, वह पूरी कृत्रिम है। आपका कोई काम, बिना स्वास्थ्य अपना पूर्ति किये, कोई नहीं करेगा- चाहे वह करने योग्य हो, कानूनन हो, अनुकूल हो, लेकिन कोई नहीं करेगा। वह केवल वही करेगा जो महापुरुषों का सानिध्य किए हुए हैं, विशेषकर जो इस समूह के हैं और परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु की वाणियों पर चलने का प्रयत्न करते हैं, उनके आचरण-व्यवहार और सारी चीजें बहुत-ही भिन्न होती हैं, बहुत-ही अलग होती हैं, बहुत-ही अनुशासित होती हैं। लेकिन फिर भी हमलोग अपने उस बाह्य दृष्टि को लेकर चूक जाते हैं। हमको अपने में ध्यान-धारणा करना चाहिए। यह सब बहुत ही आवश्यक चीज है। आपका ध्यान है, धारणा है, जप है, तप है और वह स्थिरता है जिसको हमलोग प्राप्त करते हैं। और उस स्थिरता को प्राप्त करने के बाद हमें उच्च स्थिति का भान होता है।
पूज्य बाबा जी ने आगे कहा कि बाह्य दृष्टि रख के हमलोग दुनिया से या मृत्यु से बहुत भयभीत भी रहते हैं। हमारी पुस्तिका (मृत्यु और अन्त्येष्टि क्रिया) में प्रथम यही लिखा है कि आओ मृत्यु हम तुम्हारा स्वागत करते हैं। लेकिन हमारे लिए एक बहुत भयावत चीज है वह मृत्यु- चाहे हमारे निकटवर्ती हों या हमारा खुद का ही शरीर हो, कि हमारी मृत्यु हो जाएगी, तो हमलोग बहुत डर जाते हैं। हमारे महापुरुषों ने कहा है कि यह शरीर जो कष्ट भोग रहा है, वह जब छोड़ता है तो बहुत ही हल्का हो जाता है, फिर उस शरीर में दोबारा आना भी नहीं चाहता। क्योंकि इतनी पीड़ा, इतनी समस्याएँ हमलोग खुद ही बटोर के रखे हुए हैं। अपनी मानसिकता को दुरुस्त नहीं कर पा रहे हैं, नहीं सोच पा रहे हैं, उन महापुरुषों की असली सेवाओं को लेने के लिए तैयार नहीं हो पा रहे हैं। जब हम उन असली सेवाओं को लेने के लिए तैयार होंगे तो इस संसार में हमें कोई विचलित नहीं कर सकता है, कोई भयभीत नहीं कर सकता है। हमारे पास इतनी संपदा स्वयं ही हमलोग रखे हैं। सुन रहे हैं, देख रहे हैं, उस पर चलने की कोशिश कर रहे हैं, तो वह एक अलग व्यक्तित्व आपलोगों में दिखाई देता है, बहुत से लोगों में है। लेकिन बहुत-से लोगों के लिए तो ऐसा भी है कि ‘जान न सको इन लोगों की माया, काम रूप केहि कारण आया’। अपने काम के लिए आते हैं, काम हो गया, फिर भूल जाते हैं, चले जाते हैं। आपने दवा दे दिया, स्वस्थ हो गए, फिर चले गए, आपसे कोई मतलब नहीं है। आपने सेवा कर दिया, निःस्वार्थ सेवा करते ही हैं। मनुष्य की सेवा क्यों की जाती है? क्योंकि सभी में वही व्याप्त हैं। वह ईश्वर सभी मे व्याप्त है, इसीलिए उसकी सेवा की जाती है, न कि खाली शरीर की सेवा की जाती है। शरीर स्वस्थ रहेगा तो मन भी स्वस्थ रहेगा तो आप अपने अभ्यंतर को जानने में सक्षम हो सकते हैं। और जब उसको आप जानने लगेंगे, बहुत करीब पहुँच जायेंगे तो आप लोग परेशान नहीं होंगे। हमलोग देखते हैं कि समूह के बहुत से लोग उस अवस्था को जानते हैं। उस अवस्था को प्राप्त भले ही न हों, लेकिन बहुत करीब से जानते हैं। मनुष्य के कर्मों के द्वारा ही आगे का हमारा जन्म बनता है।
तो बंधुओं! बहुत सी ऐसी चीजें हैं, इस दुनिया में घटित हो रही हैं, हमलोग देख रहे हैं, लेकिन उसकी अनदेखी भी करना पड़ेगा और उसका निराकरण भी करना पड़ेगा। कैसे अनदेखी करना होगा, कैसे निराकरण करना होगा? वह हमें अपने बुद्धि और विवेक से सोचना होगा। निराकरण करना होगा कि हमारे ऊपर उसका असर न हो। यही एक उपाय है उसका असर हम पर न आये। क्योंकि संगत से ही गुण हममें आते हैं और कुसंगत से ही गुण चले जाते हैं। हमलोग समाज में देख रहे हैं, क्या हो रहा है? बहुत दुःखपूर्ण है, बहुत कष्टपूर्ण है। सबलोग जान रहे हैं इसको, फिर भी हमको इतना लगाव हो गया है, इतना मोह हो गया है। सब जान रहे हैं कि कोई रहेगा नहीं, जो आया है, वह जाएगा ही। परमपूज्य अघोरेश्वर महाप्रभु ने भी कहा था कि मैं तो बहुत थोड़े समय के लिए आया हूँ, मैं ज्यादा समय नहीं रहना चाहता इस पृथ्वी पर। वैसे ही हमारा भी सब बँधा हुआ है कि हमलोग कितना दिन रहेंगे और हमलोग देख ही रहे हैं, अनुभव भी कर रहे हैं कि हमारे पूर्वज भी, जो भी रहे जाते रहे, जाते रहे, आज हमलोग हैं, हमलोग भी जाएंगे, फिर आनेवाली पीढ़ी आएगी वह भी करेगी। इतना सा भी ज्ञान हमको नहीं हो पाता है कि यहाँ पर रहने वाला कोई नहीं है। रहेगा, तो हमारा वह आत्मज्ञान ही रहेगा, जिससे कि हम चिरकाल तक रहेंगे। क्योंकि वह आत्मा तो मरता नहीं है, शरीर ही मारेगा। अंतिम परिणति वही है जिसे हम प्राप्त करना चाहते हैं कि हम भी उनके तदरूप हों। उनके तदरूप जब हो जायेंगे तो हम भी सब जगह व्याप्त ही रहेंगे। लेकिन ऐसा कोई करना चाहता नहीं है। हम तो एक छोटी-सी जगह में रहना चाहते हैं, उसी मोह में, उसी माया में, उसी फंदे में रहना चाहते हैं। क्योंकि माया तो बहुत बड़ी माया है और माया के द्वारा ही, माया को पूजकर ही उससे अलग हुआ जा सकता है। नहीं तो उसे छूटना बड़ा मुश्किल है, बड़ा दुरूह है। लेकिन सबके साथ रहकर, सबसे प्रेम, व्यवहार, सौहार्द रखते हुए भी सबसे अलग रहेंगे, तो वह अभ्यंतर की दृष्टि देगा। वह अभ्यंतर की दृष्टि मिलेगी तभी इस तरह से हम लोग हो पायेंगे।
तो बंधुओं! मैं आपलोगों से प्रार्थना करता हूँ कि उन महापुरुषों की जो सेवा है, सेवा का जो अर्थ है, उसको लेने के लिए हमलोग तत्पर रहें, ताकि जीवन मरण के बार-बार के चक्र से निकलने के लिए हमलोग प्रयत्नशील रहें। क्योंकि बहुत दुःखपूर्ण तो है ही। समाज में जिस तरह की लड़ाइयाँ हो रही हैं- चाहे हम कई देशों में लड़ाइयाँ देख रहे हैं, हम अपने यहाँ भी देख रहे हैं, अपने परिवारों में भी देख रहे हैं, अपने भारत देश में भी देख रहे हैं, हर जगह लड़ाइयाँ हो रही हैं। वैसे ही हमारे शरीर में जो रोग होते हैं, तो वह भी एक युद्ध हो रहा है। क्योंकि बाहरी तत्व उसमें आ जाते हैं तो वह युद्ध होता है। तब वह दवा रूपी आयुध को हमलोग लेते हैं उसको मारने के लिए, उस शत्रु को समाप्त करने के लिए। यह सारी चीजें समझने की हैं कि हमारे में भी युद्ध चल रहा है, निरंतर चल रहा है- चाहे शारीरिक हो, चाहे मानसिक हो। हमारा दिमाग भी दौड़ रहा है दिनभर, वह भी हमसे युद्ध कर रहा है। जब आप स्थिर होंगे, उन महापुरुषों के सेवाओं को लेंगे, तो कम-से-कम चाहे यह सब ठीक रहेगा। चाहे जो परिस्थिति आ जाएगी उसमें एकदम शांत रहेंगे, स्थिर रहेंगे, जिस तरह की जल स्थिर रहता है, कुछ फेंक दिया जाता है तो उसमें तरंगें पैदा होती हैं, तो वह तरंगे नहीं पैदा होंगी। जब तरंगें पैदा नहीं होंगी, तो हमको किसी चीज का आभास नहीं रहेगा।
पूज्य बाबा जी ने आगे कहा कि हमलोग जब भी एकांत मे बैठें या ऐसे स्थानों पर आकर बैठें तो अपने मस्तिष्क को खाली करके, एकांत में चुपचाप बैठे रहें। किसी का कोई चिंतन मनन न करें, तो बहुत ही अच्छा होगा, हमारे लिए बहुत कुछ सुगम होगा, हमको हर बातें समझ में आने लगेंगी। जो नहीं समझाया गया है वह भी समझ में आने लगेगा। लेकिन स्थिर तो हों, उस स्थिरता की तरफ हमलोग बढ़ें तो। ऐसे स्थानों पर आकर जो हम अनर्गल प्रलाप करते हैं, वह न करें। आपको अगर ऐसे स्थानों पर आने का, महापुरुषों के सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त है तो आराम से आपलोग बैठ जाइए, किसी का चिंतन-मनन मत करिए, किसी का सोच मत रखिए तो आपको उससे नई-नई प्रेरणाएँ मिलेंगी। मैं आशा करता हूँ कि हमलोग इन छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान देंगे। और जो अभी हमारे पूर्व वक्ता प्रेम के बारे में कह रहे थे कि प्रेम ही सब है, तो उसी के लिए यह भी कहा गया है कि ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े तो पंडित होय। हम अपने समाज में, अपने लोगों के बीच मे, अपने राष्ट्र में उस प्रेम को फैलायें। हाँ, कहीं-कहीं उन अतताईयों से लड़ना भी होता है, तो वह भी हमारे बुद्धि-विवेक पर निर्भर करता है। और हमें सुधारना भी है, गलत लोगों कोसुधारना भी है, तो उसको भी सहन पड़ता है, उनकी बातों को भी सुनना पड़ता है। तो यही सब चएजें हैं जो हमारे रोजमर्रा के जीवन में निकलती हैं। वह ईश्वर भी हमारे करीब से रोज निकल जाता है और हम पहचान नहीं पाते हैं, जान नहीं पाते हैं, अनुभव नहीं कर पाते हैं। तो बंधु! मैं आपसे निवेदन करूंगा कि उन महापुरुषों की सेवाओं को सही अर्थ में हमलोग लेने का प्रयास करेंगे।
गोष्ठी के पश्चात लगभग 2 बजे से “अघोरन्ना परो मन्त्रः नास्ति तत्वं गुरोः परम्” के 24 घंटे के अखंड संकीर्तन का शुभरम्भ पूज्यपाद बाबा जी ने अघोरेश्वर समाधि में पूजन आरती के उपरांत समाधि की पाँच परिक्रमा करके किया। संकीर्तन का समापन कल 30 नवंबर को मध्याह्न मे किया जायेगा।

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