मिर्जापुर। नगर के सहुवाईंन गोला में अहरौरा धर्म सभा द्वारा आयोजित रामलीला के दूसरे दिन प्रभू राम सहित चारों भाईयों के जन्म के बाद तीसरे दिन की लीला में प्रभु श्रीराम लक्ष्मण के ऋषि विश्वामित्र के साथ राजा जनक के निमंत्रण पर स्वयंवर के आयोजन में जनकपुरी पहुँचते हैं। नगर भ्रमण के क्रम जनक जी के बाग़ में पहुंचते जहाँ सीता जी अपनी सहेलियों के साथ पुष्प चुनने के लिए जाती हैं।
तेहिं अवसर सीता तहँ आई, गिरिजा पूजन जननि पठाई।।
प्रभु श्रीराम और सीता जी एक दूसरे को देखते हैं- देखि विलोचन चारु अचंचल, मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल।।
सीता स्वयंवर के लिए भव्य दरबार सजाया गया है जिसमें दिगदिगंत के राजा आए हुए हैं। स्वयंवर के शर्त के अनुसार शिव जी के धनुष को उठाने वाले को सीता जी वरमाला पहनाएंगी किन्तु सभी आए हुए नृप गणों को हताशा प्राप्त होती है तब जनक जी दुखी होकर कहते हैं कि क्या पृथ्वी वीर बलवानों से खाली हो गई है।उनके वचन को सुनकर लक्ष्मण जी कहते ऐसा नहीं है अगर गुरुवर आज्ञा दें तो प्रभु श्रीराम इसे उठाकर फेंक सकते हैं। गुरु आज्ञा देते हैं-
उठहूँ राम भंजहु भवचापा, मेटहु तात जनक परितापा।।
प्रभु श्रीराम उठते हैं और धनुष को उठाकर प्रत्यंचा खींचते हैं- तेहिं छन राम मध्य धनु तोरा, भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ।।
जिससे धनुष टूट जाता है और जनकपुर में खुशी की लहर दौड़ जाती है। शिवजी के धनुष के टूटने पर घोर गर्जना से परशुराम जी समझ जाते हैं कि किसी ने शिव धनुष को तोड़ा है जिससे कुपित होकर जनकपुर स्वयंवर में पहुँच कर रोष प्रकट करते हैं जिससे लक्ष्मण जी पर कुपित होकर कहते हैं ।
रे नृप बालक काल बस,बोलत तोहिं न संभार। धनुहीं सम त्रिपुरारी धनु,विदित सकल संसार ।।
प्रभु श्री राम उठकर उनसे विनय निवेदन करते हैं उनके कोप को शांत करते हैं और परशुराम जी समझ जाते हैं कि यह प्रभु की लीला है तब आशीर्वाद देकर प्रस्थान करते हैं।
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू । भृगुपति गए बनहि तप हेतू ।।
इसके बाद श्रद्धालु लीला प्रेमियों के भारी जयघोष से गुंजायमान पंडाल हो जाता है। इस अवसर पर संरक्षक शुभेन्द्र जायसवाल सहित अन्य लोग उपस्थित रहे ।
