साहित्य, बेटियों, परिवार और बदलते सामाजिक परिवेश की कविता ‘विदा होती बेटियाँ’ को मिली सराहना

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डीएम चर्चित गौड़ एवं सीडीओ जागृति अवस्थी को पुस्तक भेंट; डॉ. ओम प्रकाश की साहित्यिक यात्रा पर हुआ आत्मीय संवाद

सोनभद्र, । समकालीन हिंदी कविता में पारिवारिक रिश्तों, बेटियों, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं को स्वर देने वाले चर्चित काव्य-संग्रह ‘विदा होती बेटियाँ’ की प्रति इसके रचनाकार डॉ. ओम प्रकाश, उप महाप्रबंधक (मानव संसाधन–राजभाषा), एनटीपीसी सिंगरौली ने , चर्चित गौड़, आईएएस, जिलाधिकारी, सोनभद्र एवं श्रीमती जागृति अवस्थी, आईएएस, मुख्य विकास अधिकारी, सोनभद्र को सादर भेंट की। पुस्तक भेंट के अवसर पर साहित्य, बेटियों, परिवार और बदलते सामाजिक परिवेश में मानवीय संवेदनाओं की भूमिका पर आत्मीय संवाद हुआ। जिलाधिकारी  चर्चित गौड़ ने काव्य-संग्रह की विषयवस्तु की सराहना करते हुए पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक संवेदनाओं को साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त करने के प्रयास को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने बेटियों और परिवार जैसे आत्मीय विषयों पर केंद्रित साहित्य को समाज में मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने वाला रचनात्मक प्रयास बताया।

मुख्य विकास अधिकारी श्रीमती जागृति अवस्थी ने भी ‘विदा होती बेटियाँ’ की संवेदनात्मक विषयवस्तु की सराहना की। उन्होंने बेटियों और स्त्री-जीवन से जुड़ी अनुभूतियों को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त किए जाने को उल्लेखनीय बताते हुए ऐसी रचनात्मक अभिव्यक्तियों को समाज में बेटियों के प्रति सम्मान और सकारात्मक दृष्टि को प्रोत्साहित करने वाला बताया।

‘विदा होती बेटियाँ’ ने प्रकाशन के एक वर्ष के भीतर तीन संस्करणों तक पहुँचकर पाठकीय लोकप्रियता का उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। पुस्तक की साहित्यिक यात्रा पाठकीय सराहना तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इसकी रचनात्मकता और विषयवस्तु ने अकादमिक जगत का भी ध्यान आकर्षित किया है। हरियाणा के एक विश्वविद्यालय में इस काव्य-संग्रह पर शोध कार्य पूर्ण हो चुका है, जो पुस्तक की अकादमिक स्वीकार्यता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

बेटियों की विदाई से जुड़े भावों को संग्रह की शीर्षक कविता अत्यंत सहजता से अभिव्यक्त करती है—

“विदा होती जाती हैं बेटियाँ,

जैसे विदा हो जाती है आँगन की धूप,

चुप हो जाती हैं मंदिर की घंटियाँ।”

डॉ. ओम प्रकाश ने कहा कि ‘विदा होती बेटियाँ’ केवल बेटी की विदाई की कविता नहीं, बल्कि माँ-पिता, परिवार, प्रेम, स्मृति, स्त्री-जीवन और मनुष्य के भीतर बची संवेदना की व्यापक काव्य-यात्रा है। संग्रह की ‘पिता के सपने’, ‘माँ का अकेलापन’, ‘प्रेम-पत्र’ और ‘सबसे कठिन है’ जैसी रचनाएँ भी मानवीय रिश्तों और जीवन-मूल्यों के विविध पक्षों को सामने लाती हैं।

डॉ. ओम प्रकाश की साहित्यिक साधना को ‘नागार्जुन शिखर सम्मान’ तथा हाल ही में ‘माटी महकी सम्मान–2026’ सहित विभिन्न सम्मानों से मान्यता मिली है। पाठकों के बीच निरंतर बढ़ती स्वीकार्यता, तीन संस्करणों का प्रकाशन और विश्वविद्यालय स्तर पर शोध इस काव्य-संग्रह की विस्तृत होती साहित्यिक यात्रा को रेखांकित करते हैं।

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