दुद्धी, सोनभद्र। स्थानीय श्री रामलीला मंच पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत माहौल देखने को मिला। सायं कालीन सत्र में व्यास पीठ पर विराजमान लड्डू गोपाल जी की आरती के उपरांत अंतरराष्ट्रीय कथा वाचक बाल व्यास मानस जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया।कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़े ही उत्साह के साथ मनाया गया। श्रद्धालुओं ने अपने हृदय में कृष्ण भक्ति के पालन-पोषण और जीवन में धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। बाल व्यास मानस जी महाराज ने कहा कि केवल भगवान का जन्मोत्सव मना लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारना ही सच्ची भक्ति है। उन्होंने कहा कि “बालक को जन्म देना कठिन नहीं, बल्कि उसका सही पालन-पोषण करना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।”
उन्होंने कथा में बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने पूतना जैसी राक्षसी का उद्धार कर उसे मातृत्व का स्थान प्रदान किया। जो पूतना भगवान को मारने आई थी, उसे भी भगवान ने बैकुंठ धाम प्रदान कर अपनी असीम करुणा का परिचय दिया। वहीं यमलार्जुन वृक्षों को गिराकर भगवान ने देवताओं को मुक्ति दिलाई और यह संदेश दिया कि भगवान अपने भक्तों के कष्ट हरने वाले हैं।बाल व्यास जी ने गौ रक्षा, मानव रक्षा और संस्कृति संरक्षण को जीवन का मूल धर्म बताते हुए कहा कि भगवान सदैव अपने भक्तों और धर्म की रक्षा करते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान बाहरी आडंबर और दिखावे को समाप्त कर मनुष्य को सत्य का मार्ग दिखाते हैं।
कथा के दौरान गोवर्धन लीला का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र पूजा का विरोध कर किसानों को यह संदेश दिया कि भूमि ही उनका वास्तविक जीवनाधार है। जिस धरती पर अन्न उत्पन्न होता है, वही मनुष्य का सर्वस्व है। भगवान ने गोवर्धन रूप में प्रकट होकर समाज को ऋषि, कृषि और संस्कृति से जुड़ने की प्रेरणा दी।इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने गोवर्धन भगवान को छप्पन भोग अर्पित कर श्रद्धा पूर्वक पूजा-अर्चना की तथा मानसिक रूप से गोवर्धन परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना की। कथा में बड़ी संख्या में महिला, पुरुष एवं बच्चों ने उपस्थित होकर कथा श्रवण किया और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त की।कार्यक्रम के दौरान पूरा पंडाल कृष्ण भक्ति और जयकारों से गूंज उठा।
भगवान बाहरी दिखावे को दूर कर मनुष्य को सत्य का मार्ग दिखाते हैं – बाल व्यास मानस जी महाराज
