जहरीले रसायनों की फैक्ट्री बनी खतरे की घंटी, तीन दशक से बिना सुरक्षा चल रही कंपनी पर खड़े हुए बड़े सवाल

सोनभद्र।(गिरीश तिवारी) जिले में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनाए गए नियम-कायदों की जमीनी हकीकत दुद्धी तहसील के पिपरी थाना क्षेत्र स्थित सेंदूर ग्राम पंचायत में संचालित एक केमिकल फैक्ट्री को देखकर समझी जा सकती है। रीवा–रांची नेशनल हाईवे के किनारे चल रही ओरिएंट माइक्रो ओब्रिहेसिव लिमिटेड नामक यह इकाई तीन दशक से अधिक समय से संचालित बताई जा रही है, लेकिन सुरक्षा और प्रदूषण नियंत्रण के मानकों को लेकर लगातार गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

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सूत्रों के अनुसार करीब 30 वर्षों से चल रही इस फैक्ट्री में प्रदूषण नियंत्रण के लिए किसी अत्याधुनिक संयंत्र की व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि फैक्ट्री परिसर की पूरी तरह से बाउंड्रीवाल तक नहीं बनाई गई है। ऐसे में आसपास रहने वाले ग्रामीणों और हाईवे से गुजरने वाले राहगीरों के लिए यह इकाई किसी बड़े खतरे से कम नहीं मानी जा रही है।

बताया जाता है कि इस फैक्ट्री में सल्फ्यूरिक एसिड, सोडियम हाइपोक्लोराइट, हाइड्रोक्लोरिक एसिड, क्लोरीनेटेड पैराफिन वैक्स, कैल्शियम कार्बोनेट, ऑप्टिकल ब्राइटनर और क्लोरीन गैस जैसे खतरनाक रसायनों का उत्पादन किया जाता है। इन रसायनों का निर्माण अपने आप में बेहद संवेदनशील और जोखिम भरा माना जाता है। इसके बावजूद सुरक्षा इंतजामों की कमी, प्रदूषण नियंत्रण के ठोस उपायों का अभाव और अपशिष्ट प्रबंधन की स्पष्ट व्यवस्था न होना स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील है क्षेत्र सोनभद्र–सिंगरौली औद्योगिक क्षेत्र पहले से ही पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। इस पूरे इलाके में लगभग 20 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के साथ एल्युमिनियम, केमिकल, कोयला, कार्बन, सीमेंट और सैकड़ों पत्थर क्रशर प्लांट संचालित हो रहे हैं। इन उद्योगों से निकलने वाला धुआं और अपशिष्ट पूरे क्षेत्र में प्रदूषण का बड़ा कारण बन रहा है। इसी क्षेत्र में एशिया की मानव निर्मित सबसे बड़ी झील गोविंद बल्लभ पंत सागर भी स्थित है। भारी औद्योगिक गतिविधियों और लगातार बढ़ते प्रदूषण के कारण झील का पानी कई स्थानों पर दूषित होता जा रहा है, जिससे पर्यावरण और जनजीवन दोनों पर खतरा मंडरा रहा है।

एनजीटी में भी चल रही सुनवाई

क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) में भी सुनवाई जारी है। “जगतनारायण विश्वकर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” और “सिंगरौली प्रदूषण मुक्ति वाहिनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” नामक मामलों में एनजीटी ने एक हाई पावर स्टैंडिंग कमेटी का गठन किया था। कमेटी की रिपोर्ट में इस पूरे औद्योगिक क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण और उससे पैदा हो रही पर्यावरणीय समस्याओं का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

कंपनियों की मनमानी पर उठे सवाल प्रदूषण मामलों के जानकार डॉ. बी.जे. सिंह का कहना है कि इलाके में कंपनियों की मनमानी का कोई अंत नहीं है। उनके अनुसार सरकारी और निजी दोनों तरह की औद्योगिक इकाइयां अक्सर उतना ही प्रदूषण नियंत्रण करती हैं, जिससे उनके मुनाफे पर असर न पड़े। यदि पर्यावरणीय नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए तो कई कंपनियों को प्रदूषण नियंत्रण के लिए भारी खर्च करना पड़ेगा और कुछ इकाइयों को बंद भी करना पड़ सकता है। यही कारण है कि कई कंपनियां नियमों की अनदेखी करती रहती हैं और प्रदूषण से आम जनजीवन व पर्यावरण को होने वाली हानि की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देतीं।

आईएसओ प्रमाणपत्र की वैधता भी खत्म

औद्योगिक इकाइयों की गुणवत्ता और प्रबंधन व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आईएसओ) द्वारा प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। बताया जा रहा है कि ओरिएंट माइक्रो ओब्रिहेसिव लिमिटेड को जारी आईएसओ प्रमाणपत्र की वैधता भी करीब 9 वर्ष पहले ही समाप्त हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतने खतरनाक रसायनों का उत्पादन करने वाली यह इकाई बिना अद्यतन प्रमाणन और पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों के आखिर किस आधार पर संचालित हो रही है।

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