हजारीबाग। भारत के विकास की गति ऊर्जा उपलब्धता पर निर्भर करती है। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद, कोयला आज भी देश की बिजली व्यवस्था का आधार बना हुआ है। ऐसे में चुनौती यह नहीं है कि कोयले की आवश्यकता है या नहीं, बल्कि यह है कि इसे कितनी जिम्मेदारी से निकाला जाए। झारखंड के नॉर्थ करणपुरा कोयला क्षेत्र में एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड की चट्टी–बरियातू कोयला खनन परियोजना इस संतुलन का एक सफल उदाहरण बनकर उभरी है। 7 मिलियन मीट्रिक टन वार्षिक क्षमता वाली यह परियोजना उत्पादन, पर्यावरण और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करती है। परियोजना ने तेज़ी से कार्य करते हुए 25 अप्रैल 2022 को ओवरबर्डन हटाने का कार्य शुरू किया। 29 सितंबर 2022 को कोयला उत्पादन प्रारंभ हुआ और 15 नवंबर 2022 से कोयले का प्रेषण भी शुरू हो गया। वर्तमान में यहाँ से कोयला एनटीपीसी नॉर्थ करणपुरा और बाढ़ परियोजनाओं में भेजा जाता है, जहाँ कोयले से बिजली उत्पादन के पश्चात बिजली देशभर के उपभोक्ताओं तक पहुँचाई जाती है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिल रही है।
वित्त वर्ष 2025–26 में परियोजना ने 4.887 मिलियन टन कोयला उत्पादन और 4.935 मिलियन टन प्रेषण (डिस्पैच) हासिल किया, जो निरंतर प्रगति को दर्शाता है। रिकॉर्ड रेक मूवमेंट और 2000वें रेक के सफल प्रेषण जैसी उपलब्धियाँ इसकी परिचालन क्षमता को दर्शाती हैं। पर्यावरण और सुरक्षा के क्षेत्र में भी परियोजना ने ISO 9001, ISO 14001 और ISO 45001 प्रमाण पत्र प्राप्त किए हैं, जो गुणवत्ता, पर्यावरण संरक्षण और कार्यस्थल सुरक्षा के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।सामाजिक विकास के क्षेत्र में, परियोजना ने सड़कों का निर्माण, सोलर स्ट्रीट लाइट, पेयजल सुविधाएँ और आरओ सिस्टम जैसी बुनियादी सुविधाओं पर काम किया है। महिलाओं के लिए सिलाई, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन और अन्य कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से रोजगार के अवसर भी बढ़ाए गए हैं।
स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में मेडिकल कैंप, टीबी मरीजों के लिए पोषण सहायता, लाइब्रेरी, सोलर स्टडी लैंप और युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण जैसी पहलें की गई हैं। विशेष रूप से बिरहोर जनजाति के लिए स्वास्थ्य, आवास और खाद्य सुरक्षा पर केंद्रित योजनाएँ लागू की गई हैं, जो संवेदनशील और समावेशी विकास का उदाहरण हैं। चट्टी–बरियातू परियोजना यह दर्शाती है कि सही दृष्टिकोण और जिम्मेदार प्रबंधन द्वारा खनन क्षेत्र में विकास के साथ-साथ सामाजिक एवं पर्यावरणीय संतुलन एक साथ संभव है।
