रेलवे परिसरों में वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) प्रणालियों का व्यापक विस्तार
प्रयागराज । उत्तर मध्य रेलवे ने जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण की दिशा में एक बड़ी पहल करते हुए अपने विभिन्न रेलवे परिसरों में वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) प्रणालियों का व्यापक विस्तार किया है। रेलवे भवनों की छतों और खुले क्षेत्रों में एकत्र होने वाले बारिश के पानी को व्यर्थ बहने देने के बजाय, इसे आधुनिक और पारंपरिक रिचार्ज संरचनाओं के जरिए जमीन के भीतर पहुंचाया जा रहा है।इसी क्रम में 18 सितंबर 2026 तक उत्तर मध्य रेलवे में कुल 124 वर्षा जल संचयन संरचनाएं पूर्ण की जा चुकी हैं।
ज्ञात हो कि, जल संरक्षण की शुरुआत हमेशा किसी बड़े जलाशय से नहीं होती। कई बार इसकी शुरुआत एक छत से गिरती कुछ बूंदों को सही दिशा देने से होती है। रेलवे के बड़े परिसरों में हर बारिश के साथ छतों और खुले क्षेत्रों पर बड़ी मात्रा में पानी पहुंचता है। यदि इस पानी को बहकर निकलने देने के बजाय एकत्र कर, छानकर और जमीन में उतारा जाए, तो वही वर्षा जल भूजल पुनर्भरण का माध्यम बन सकता है।
इसी विचार को आधार बनाकर उत्तर मध्य रेलवे अपने विभिन्न रेलवे परिसरों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्थाओं को विस्तार दे रहा है। यहां बारिश के पानी को केवल जमा करने के बजाय उसे एक निर्धारित मार्ग के जरिए जमीन तक पहुंचाने पर जोर है। रेलवे भवनों की छतों और अन्य उपयुक्त सतहों से एकत्र पानी को पाइपों के माध्यम से रिचार्ज पिट, सोक पिट, पुराने कुओं, सूखे बोरवेल और डीप-बोर जैसी संरचनाओं तक पहुंचाया जाता है। आवश्यक फिल्ट्रेशन के बाद पानी धीरे-धीरे मिट्टी में समाहित होता है और भूजल पुनर्भरण में योगदान देता है।
इस प्रयास के तहत उत्तर मध्य रेलवे में पूर्ण की गई कुल 124 वर्षा जल संचयन संरचनाओं में आगरा मंडल, 41 प्रयागराज मंडल और 45 झांसी मंडल में हैं। पूरे नेटवर्क में हर स्थान के लिए एक ही तरह की व्यवस्था नहीं अपनाई गई है। स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध स्थान और मौजूदा रेलवे परिसंपत्तियों के अनुसार अलग-अलग रिचार्ज प्रणालियों का उपयोग किया गया है।
झांसी मंडल में महोबा, पामां, मलासा, आटा, भुआ, मोंठ, चिरगांव, परिछा, झांसी और ग्वालियर सहित विभिन्न रेलवे स्थानों पर वर्षा जल को जमीन तक पहुंचाने की व्यवस्थाएं की गई हैं। महोबा में छत से आने वाले वर्षा जल को एक पुराने कुएं की ओर मोड़ा गया है, जिससे पानी धीरे-धीरे आसपास की मिट्टी में समाहित हो सके। पामन में सूखे बोरवेल को वर्षा जल पुनर्भरण के लिए उपयोग में लाया जा रहा है, जबकि मलासा और आटा जैसे स्थानों पर जल तारा एवं सोक पिट आधारित प्रणालियां अपनाई गई हैं। झांसी में रेलवे कॉलोनियों, बीटीसी एसी लोको शेडऔर अन्य परिसरों में रिचार्ज व्यवस्थाएं विकसित की गई हैं। वहीं ग्वालियर में रिचार्ज पिट आधारित प्रणालियों के माध्यम से रेलवे परिसरों में एकत्र वर्षा जल को जमीन तक पहुंचाया जा रहा है।
प्रयागराज मंडल में भी वर्षा जल संचयन को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप आगे बढ़ाया गया है। प्रयागराज, कानपुर, इटावा, फिरोजाबाद, हाथरस, दादरी, दनकौर, चुनार, लूसा और खैराही सहित विभिन्न रेलवे स्थानों पर भवनों और अन्य उपयुक्त सतहों से एकत्र वर्षा जल को पाइपों तथा फिल्ट्रेशन व्यवस्थाओं के माध्यम से रिचार्ज संरचनाओं तक पहुंचाया जाता है। जहां तकनीकी रूप से उपयुक्त है, वहां पहले से मौजूद डीप बोर और बोरवेल को भी रिचार्ज प्वाइंट के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे न केवल वर्षा जल को जमीन में पहुंचाने का एक प्रभावी माध्यम मिलता है, बल्कि उपलब्ध रेलवे परिसंपत्तियों का उपयोग भी सुनिश्चित होता है।
कई स्थानों पर वर्षा जल को सीधे रिचार्ज संरचना में भेजने के बजाय फिल्ट्रेशन और फर्स्ट-फ्लश व्यवस्था से गुजारकर आगे पहुंचाया जाता है। इससे पानी को नियंत्रित तरीके से जमीन में उतारने में मदद मिलती है। जहां मौजूदा बोर या कुएं उपलब्ध हैं, वहां उनका उपयोग नई संरचना तैयार करने के बजाय रिचार्ज व्यवस्था के हिस्से के रूप में किया जा रहा है। इस तरह रेलवे के पास मौजूद बुनियादी ढांचे को जल संरक्षण के उद्देश्य से एक नया उपयोग मिल रहा है।
वर्षा जल संचयन की यह पूरी प्रक्रिया एक बात स्पष्ट करती है – हर स्थान के लिए एक जैसा समाधान जरूरी नहीं, लेकिन हर बूंद के लिए एक सही रास्ता जरूर बनाया जा सकता है। कहीं पुराना कुआं बारिश की बूंदों को संभाल रहा है, कहीं सूखा बोरवेल फिर से उपयोगी बन रहा है और कहीं सोक पिट या रिचार्ज पिट पानी को जमीन के भीतर पहुंचा रहा है। उत्तर मध्य रेलवे के इन प्रयासों का उद्देश्य बारिश के पानी को बहकर व्यर्थ जाने से रोकना, सतही बहाव को कम करना और उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना है।
