बबुरी । मां बागेश्वरी देवी की सिद्धपीठ बबुरी में सात दिन से चल रहे श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के 26वें सोपान का प्रारंभ गुरुवार को भक्ति और सामाजिक चेतना के साथ हुआ। मानस मंजरी समिति द्वारा आयोजित इस सप्तम दिवस की कथा में व्यास पीठ से वृंदावन से पधारे कथा व्यास पंडित कमोद मिश्र शास्त्री जी ने समाज में तेजी से फैल रहे विभिन्न प्रकार के “मनमुखी धर्म” यानी कुधर्म पर सीधा और तीखा प्रहार किया। उन्होंने साफ कहा कि सनातन मर्यादा से हटकर की गई पूजा-पद्धति केवल भ्रम है, उससे मोक्ष नहीं मिल सकता।
कथा की शुरुआत मंगलाचरण के बाद व्यास जी ने सीधे कुधर्म के विषय को छेड़ा। उन्होंने कहा “आज समाज में लोग तरह-तरह के मनगढ़ंत धर्म बना रहे हैं। शिव चर्चा करते हैं, ईश्वर पूजा के नाम पर नए-नए पंथ चला रहे हैं, ब्रह्माकुमारी जैसी संस्थाओं के पीछे भाग रहे हैं। पर याद रखो, जिस हृदय में राम नहीं, वो हृदय मंदिर नहीं हो सकता”। व्यास जी ने दो टूक कहा “जिन्हें राम प्रिया ना हो, उन्हें चाहे वो आपके कितने भी नजदीकी, रिश्तेदार या मित्र क्यों न हों, त्याग देना ही उचित है। भक्ति का आधार राम-कृष्ण हैं, बाकी सब शाखाएं हैं”। व्यास जी की इस बात पर पंडाल में बैठे हजारों श्रद्धालु “जय श्री राम” के जयकारे लगाने लगे।
व्यास जी ने विशेष रूप से उन लोगों पर सवाल उठाए जो “शिव चर्चा” के नाम पर शिव के केवल आधार भाग की पूजा करते हैं और शिव के ऊपरी भाग को नहीं मानते। उन्होंने कहा “कुछ लोग शिव जी का बिना सर की पूजा करते हैं और कहते हैं कि शिव प्राप्त होंगे। ये कैसे संभव है? सनातन धर्म में खंडित विग्रह की पूजा नहीं की जाती। भगवान का स्वरूप अखंड होना चाहिए। हाथ-पैर टूटे विग्रह, बिना मुख की मूर्ति, अधूरे शिव की पूजा शास्त्र सम्मत नहीं है। पूर्ण विग्रह की पूजा से ही पूर्ण फल मिलता है”। व्यास जी ने कहा कि आज लोग परंपरा भूलकर अपने मन से धर्म बना रहे हैं, यही सबसे बड़ा अधर्म है। कथा में व्यास जी ने पौंड्रक नामक राजा की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि पौंड्रक काशी का राजा था और उसने अहंकार में खुद को वासुदेव घोषित कर दिया था। उसने मोरपंख, पीतांबर और चक्र धारण कर लिया और द्वारिका पर हमला कर दिया। भगवान कृष्ण ने उसका वध कर ये संदेश दिया कि “नकली भगवान बनने वालों का अंत निश्चित है। जो भगवान की नकल करेगा, वो भगवान नहीं बन जाएगा”। व्यास जी ने आज के समय से जोड़ते हुए कहा “आज भी कई लोग अपने आप को अवतार घोषित कर रहे हैं। उनसे सावधान रहो”।
व्यास जी ने बताया कि जब कलियुग शुरू हुआ तो कलिकाल ने राजा परीक्षित से पूछा कि “मैं कहां रहूं?” परीक्षित ने उसे चार स्थान दिए -जहां जुआ खेला जाए, जहां व्यभिचारी स्त्रियां हों, जहां मदिरा पान हो, और जहां जीव हत्या हो। कलिकाल ने स्वर्ण को भी अपना पांचवां निवास स्थान मांग लिया क्योंकि स्वर्ण के लोभ में ये चारों पाप अपने आप आ जाते हैं। व्यास जी ने चेतावनी देते हुए कहा “देखो, आज समाज में ये चारों चीजें खुलेआम बढ़ रही हैं। जुआ-सट्टा, व्यभिचार, नशा और हिंसा – यही कलियुग के स्तंभ हैं। जहां ये चार होंगे, वहां कलिकाल का वास होगा। इसलिए इनसे बचो। जुआ मत खेलो, व्यभिचार से दूर रहो, शराब-मांस का त्याग करो और जीव हत्या मत करो। तभी जीवन का उद्धार होगा, वरना कलिकाल तुम्हें निगल जाएगा”।
कथा में उद्धव संवाद का प्रसंग सुनाते हुए व्यास जी ने ज्ञान और भक्ति का सुंदर समन्वय समझाया। उन्होंने बताया कि भगवान ने उद्धव को गोपियों के पास ज्ञान देने भेजा था, पर गोपियों की निस्वार्थ भक्ति देखकर उद्धव का ज्ञान भी प्रेम में बदल गया। व्यास जी ने कहा “उद्धव बड़े ज्ञानी थे, पर गोपियों ने उन्हें सिखाया कि बिना प्रेम के ज्ञान अधूरा है। ज्ञान से मोक्ष मिल सकता है, पर भगवान केवल भक्ति से मिलते हैं। आज समाज को ज्ञान भी चाहिए और भक्ति भी चाहिए”। व्यास जी ने बताया कि राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण ने शिशुपाल की 100 गालियां सहन कीं। पर जब 101वीं गाली दी तो भगवान ने सुदर्शन चक्र चलाकर उसका वध कर दिया। व्यास जी ने कहा “भगवान परम सहनशील हैं, पर अधर्म की भी सीमा होती है। जब अधर्म हद पार कर जाए तो दंड देना ही धर्म है। शिशुपाल वध ये सिखाता है कि अत्याचारी को समय पर रोकना जरूरी है”। कथा के अंत में व्यास जी ने एक बार फिर सामाजिक संदेश दिया। उन्होंने कहा “आज का मनुष्य पैसा, पद और प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहा है, पर धर्म भूल गया है। जीव हत्या, व्यभिचार, जुआ, नशा – ये चारों कलियुग के द्वार हैं। इनसे बचोगे तो जीवन सफल होगा, नहीं तो पतन निश्चित है। सनातन धर्म की मर्यादा में रहो, राम-कृष्ण को अपना आधार बनाओ”। आयोजन का सफल संचालन कृष्ण कुमार पाण्डेय जी ने किया। मां बागेश्वरी के आंगन में गूंजी इस कथा से पूरे क्षेत्र में सनातन चेतना जागृत हुई है।
