रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाई पर बचन न जाई 

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अहरौरा, मिर्जापुर। स्थानीय नगर के साहुवाइन गोले में चल रही रामलीला के पांचवें दिन गुरुवार को रामलीला का मंचन व्यास जी के इस चौपाई से आरंभ हुआ ‘आए ब्याहि रामु घर जब तें, बसई अनंद अवध सब तब तें’  जनकपुर से बारात वापस अयोध्या में आ चुकी है पूरे अवध में प्रसन्नता का वातावरण है। कुछ समय के उपरान्त राजा दशरथ श्री राम का राज्याभिषेक करने की घोषणा करते हैं जिसे सुनकर मंथरा रानी कैकेयी का कान भरती है और भरत को राजगद्दी पर बैठाने के लिए कैकेयी को याद दिलाती है कि दशरथ जी ने उससे तीन वरदान माँगने की बात कही थी तब आपने समय आने पर माँग लूँगी कहा था जिसका उपयोग करने का यही उचित समय है।

रानी कैकेयी मंथरा की बातों में आ जाती हैं और जाकर कोप-भवन में लेट जाती हैं।महाराज दशरथ आते हैं कारण पूछने पर कैकेयी उन्हें दो वरदान देने की बात बताते हुए कहती हैं ।

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहुं एक बर भरतहिं टीका॥

तापस बेस बिसेषि उदासी, चौदह बरिस राम वनवासी

   दशरथ जी यह सुनते ही क्रोधित हो जाते हैं तो कैकेयी रघुकुल रीति याद दिलाते हुए कहती हैं 

देन कहेन्हि मोहि दुइ वरदाना, मांगेउँ जो कछु मोहि सोहाना

  दशरथ जी के लाख समझाने पर भी कैकेयी टस से मस नहीं होती है विवश विकल हो दशरथ जी सुमंत्र को बुलाकर राम को बुलाने के लिए भेजते हैं।

राम के आने पर दुखी मन से सारी बातों को बताते हैं । राम सत्य सबु जो कछु कहहू, तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू

  प्रभु राम पिता के वचन का पालन करते हैं साथ में सीता जी और लक्ष्मण जी भी राम का अनुसरण करते हैं और वन के लिए प्रस्थान कर जाते हैं।

दशरथ जी करुण स्वर में विलाप करते हैं। दशरथ जी भाव भरे विलाप से पूरे श्रध्दालु दर्शक भावुक हो जाते हैं। अन्ततः दशरथ जी अपना प्राण राम राम कहते हुए त्याग देते हैं।

राम राम सिय लखन पुकारी, परेउ धरनितल ब्याकुल भारी

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम, तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम

 दशरथ जी के मृत्यु का समाचार भरत जी को ननिहाल में पहुंचाई जाती है। वो आते हैं सारी बातें सुनकर कैकेयी को बहुत ताड़ना देते हैं। दशरथ जी का क्रिया कर्म करने के बाद भरत जी श्रीराम को मनाने के लिए आते हैं। भरत मनावन की भावप्रवण लीला में राम-भरत मिलन,भरत जी का निवेदन वापस लौटने का और राम चन्द्र जी का रघुकुल रीति का पालन करना और पिता के वचनों का आदर करने की बात कहते हुए भरत जी को समझा बुझाकर वापस करते हैं।

भरत जी प्रभु श्रीराम का चरण पादुका लेकर वापस होते हैं-

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिन साधि ।। इसी के साथ लीला समाप्त हो जाती है और लोग जय श्री राम का जयकारा लगाते हुए अपने अपने धाम को लौट जाते हैं। इस अवसर पर शुभेन्द्र जायसवाल, रजनीश मिश्रा सहित अन्य लीला प्रेमी उपस्थित रहे।

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