प्रेम को समझना आसान नहीं, महसूस करना पड़ता है

प्रेम… एक ऐसा शब्द, जिसे बोलना बहुत आसान है, लेकिन समझना शायद पूरी जिंदगी भी कम पड़ जाए। प्रेम को परिभाषित करने की कोशिश जब भी हुई, शब्द छोटे पड़ गए। किसी ने इसे पूजा कहा, किसी ने समर्पण, किसी ने पागलपन और किसी ने जीवन की सबसे खूबसूरत अनुभूति। लेकिन सच तो यह है कि प्रेम इन सबके बीच कहीं सांस लेता है। वह दिखाई नहीं देता, फिर भी जीवन के सबसे गहरे हिस्से को छू जाता है। कभी किसी की आंखों में उतरकर प्रेम हमारे भीतर घर बना लेता है, कभी किसी की आवाज सुनते ही मन शांत हो जाता है, कभी किसी की एक मुस्कान पूरे दिन की थकान मिटा देती है और कभी वही मुस्कान याद बनकर आंखों में नमी भी ले आती है। यही प्रेम है, वह जो बिना दस्तक दिए दिल में प्रवेश करता है और फिर वहां से निकलने का रास्ता भूल जाता है।

मनुष्य ने जीवन में बहुत कुछ अपने निर्णय से चुना है कहां पढ़ना है, क्या बनना है, किस रास्ते पर चलना है, किससे मित्रता करनी है, लेकिन प्रेम शायद उन चीजों में से है, जिसे मनुष्य चुनता कम और महसूस अधिक करता है। हम नहीं जानते कि हमें कब किसी से प्रेम हो जाएगा। हमें नहीं पता कि वह प्रेम जीवनभर साथ रहेगा या कुछ समय बाद एक स्मृति बन जाएगा। हमें यह भी मालूम नहीं होता कि जिसे हम अपनी जिंदगी का सबसे जरूरी व्यक्ति समझ रहे हैं, वह हमारी कहानी का अंतिम पात्र होगा या केवल एक सुंदर अध्याय। प्रेम के भाग्य में क्या लिखा है, यह मनुष्य नहीं जानता। शायद यह केवल ईश्वर जानता है। हम अक्सर प्रेम को पाने की इच्छा से जोड़ देते हैं। हमें लगता है कि जिसे हम चाहते हैं, वह भी हमें चाहे, हमारे साथ रहे, हमारी भावनाओं को समझे और हमारे जीवन का हिस्सा बने। इसमें कुछ गलत भी नहीं। हर प्रेमी मन के किसी कोने में यही सपना देखता है। लेकिन प्रेम केवल पाने का नाम नहीं है। प्रेम का एक रूप वह भी है, जिसमें हम किसी को उसकी खुशी के लिए स्वतंत्र छोड़ देते हैं। कभी-कभी प्रेम में सबसे कठिन निर्णय यही होता है कि जिसे हम अपने पास रखना चाहते हैं, उसे जाने दें। दिल कहता है उसे रोक लो। मन कहता है उसे समझाओ। यादें कहती हैं इतनी आसानी से हार मत मानो, लेकिन परिस्थितियां कहती हैं हर रिश्ता साथ रहने के लिए नहीं बना होता। तब प्रेम एक परीक्षा बन जाता है। और जो व्यक्ति उस परीक्षा में सामने वाले की खुशी को अपने अधिकार से ऊपर रख पाता है, शायद वही प्रेम का वास्तविक अर्थ समझ पाता है।
प्रेम से पहले हम केवल अपने बारे में सोचते हैं, लेकिन प्रेम के बाद किसी दूसरे की चिंता हमारे भीतर जन्म लेती है। पहले हमें अपनी नींद प्यारी होती है, फिर किसी की आवाज सुनने के लिए रात तक जागना अच्छा लगने लगता है। पहले हम अपनी खुशी तलाशते हैं, फिर किसी दूसरे की मुस्कान में अपनी खुशी मिलने लगती है। प्रेम मनुष्य को बदल देता है। वह उसे संवेदनशील बनाता है, उसे दूसरों के दर्द को समझना सिखाता है, उसे धैर्य देता है, उसे इंतजार करना सिखाता है और कभी-कभी वह साहस भी देता है, जो अकेले मनुष्य में नहीं होता। किसी के लिए बेहतर बनने की इच्छा भी प्रेम से जन्म ले सकती है। एक व्यक्ति जो कल तक अपने भविष्य को लेकर उदासीन था, प्रेम के बाद अपने सपनों को गंभीरता से लेने लगता है। उसे लगता है कि उसे केवल अपने लिए नहीं, किसी और के लिए भी मजबूत बनना है। यही प्रेम की शक्ति है। लेकिन जहां प्रेम शक्ति देता है, वहीं उसका अतिरेक मनुष्य को कमजोर भी कर सकता है। जब हम अपनी पूरी खुशी किसी एक व्यक्ति के हाथों में सौंप देते हैं, तब हम अपनी भावनाओं के मालिक नहीं रहते। सामने वाले की एक छोटी-सी बात हमें आसमान पर पहुंचा देती है और उसकी एक बेरुखी हमें जमीन पर गिरा देती है। फोन पर आया एक संदेश खुशी देता है और संदेश न आए तो बेचैनी होने लगती है। किसी का मिलना अच्छा लगता है और उसका दूर जाना असहनीय लगने लगता है। यहीं से प्रेम और निर्भरता के बीच की महीन रेखा शुरू होती है।
प्रेम सुंदर है, लेकिन किसी व्यक्ति को अपनी पूरी दुनिया बना देना हमेशा सुंदर नहीं होता, क्योंकि दुनिया का कोई भी व्यक्ति हमेशा हमारे साथ नहीं रह सकता। जीवन में परिस्थितियां बदलती हैं, लोग बदलते हैं, रिश्ते बदलते हैं और कभी-कभी हमारी सबसे मजबूत उम्मीदें भी टूट जाती हैं। इसलिए प्रेम कीजिए, लेकिन स्वयं को मत खोइए। किसी को अपना बनाइए, लेकिन अपने अस्तित्व की कीमत पर नहीं। आज के समय में प्रेम के नाम पर सबसे अधिक जो चीज रिश्तों को नुकसान पहुंचाती है, वह है अविश्वास। “कहां थे?”, “किससे बात कर रहे थे?”, “फोन क्यों नहीं उठाया?”, “मेरे अलावा किसी और से इतनी बात क्यों करते हो?” ये सवाल कभी-कभी चिंता से जन्म लेते हैं, लेकिन लगातार पूछे जाने लगें तो रिश्ते को सांस लेने में कठिनाई होने लगती है। प्रेम किसी को कैद करने का नाम नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को हर पल यह साबित करना पड़े कि वह आपसे प्रेम करता है, तो शायद वहां प्रेम से अधिक भय मौजूद है। सच्चा प्रेम कहता है “मुझे तुम पर विश्वास है।” और विश्वास का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला कभी गलती नहीं करेगा। विश्वास का अर्थ है कि रिश्ते में इतनी मजबूती हो कि गलती के बाद भी संवाद का रास्ता खुला रहे। प्रेम का सबसे सुंदर रूप शायद वह है, जिसमें दो लोग एक-दूसरे को बदलने की कोशिश नहीं करते, बल्कि समझने की कोशिश करते हैं।
हर मनुष्य अधूरा है। हर व्यक्ति के भीतर कुछ अच्छी बातें हैं और कुछ कमजोरियां भी। प्रेम यदि केवल अच्छाइयों से है तो वह आकर्षण हो सकता है, लेकिन जब हमें किसी की कमजोरियां मालूम होने के बावजूद उसके प्रति सम्मान बना रहता है, तब प्रेम गहरा होने लगता है। प्रेम में यह कहना भी जरूरी है।“तुम जैसे हो, मैं तुम्हें समझने की कोशिश करूंगा।” लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि प्रेम के नाम पर गलत व्यवहार स्वीकार कर लिया जाए। प्रेम में सम्मान आवश्यक है और आत्मसम्मान उससे भी अधिक। जहां अपमान लगातार हो, जहां हिंसा हो, जहां भय हो, जहां व्यक्ति स्वयं को खोने लगे वहां केवल प्रेम का नाम लेकर रिश्ते को ढोते रहना प्रेम नहीं है। प्रेम का एक संसार ऐसा भी है, जहां दो लोग नहीं होते, केवल एक व्यक्ति होता है और उसकी भावनाएं होती हैं। वह किसी को चाहता है, उसके आने की प्रतीक्षा करता है, उसके संदेश का इंतजार करता है, उसकी तस्वीर देखकर मुस्कुराता है, लेकिन सामने वाला शायद कुछ भी महसूस नहीं करता।
एकतरफा प्रेम बहुत गहरा दर्द दे सकता है, क्योंकि इसमें उम्मीद का जन्म भी स्वयं होता है और टूटना भी स्वयं। लेकिन यहां भी एक बात समझना जरूरी है किसी को प्रेम करना हमारा अधिकार है, लेकिन सामने वाले से प्रेम करवाना हमारा अधिकार नहीं। प्रेम प्रस्ताव स्वीकार हो सकता है, अस्वीकार भी। स्वीकार होने पर जीवन सुंदर हो सकता है, अस्वीकार होने पर जीवन समाप्त नहीं होता।
किसी का हमें न चुनना, हमारी कीमत कम नहीं करता। यह बात हर उस युवा को समझनी चाहिए, जो प्रेम में असफल होने के बाद स्वयं को असफल समझने लगता है। प्रेम में इंतजार का अपना एक संगीत होता है। किसी के आने का इंतजार, किसी की आवाज का इंतजार, किसी के एक संदेश का इंतजार और कभी-कभी केवल इस उम्मीद का इंतजार कि शायद वह एक दिन समझ जाएगा कि हम उसे कितना चाहते हैं। लेकिन हर इंतजार का अंत मिलन हो, यह जरूरी नहीं। कुछ इंतजार हमें स्वयं से मिलाने के लिए होते हैं। जब सामने वाला नहीं मिलता, तब हम अपने भीतर उतरते हैं और पूछते हैं मैं आखिर चाहता क्या हूं? तभी प्रेम हमें दूसरे से हटाकर स्वयं तक ले आता है और शायद यही प्रेम की सबसे बड़ी सीख है। प्रेम हमें केवल कोई व्यक्ति नहीं देता, वह हमें अनुभव देता है, इंतजार देता है, खुशी देता है, दर्द देता है, धैर्य देता है, त्याग सिखाता है और यह समझाता है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं, भावनाओं का भी संसार है। प्रेम के कारण हम कभी हंसते हैं और कभी रोते हैं। कभी सपने देखते हैं और कभी उन्हीं सपनों के टूटने का दर्द सहते हैं। लेकिन इस पूरी यात्रा में हम पहले जैसे नहीं रहते। प्रेम हमें बदल चुका होता है। हम थोड़ा अधिक संवेदनशील, थोड़ा अधिक समझदार और कभी-कभी थोड़ा अधिक अकेला हो जाते हैं। क्या प्रेम हमेशा मिलना चाहिए? नहीं। हर प्रेम कहानी का अंत विवाह नहीं होता। हर प्रेम कहानी का अंत साथ रहने में नहीं होता। कुछ प्रेम केवल स्मृति बनकर रह जाते हैं। कुछ लोग जीवन में आते हैं, हमें छूते हैं, हमें बदलते हैं और फिर किसी मोड़ पर हमसे दूर हो जाते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनका प्रेम झूठा था। हर रिश्ते की अपनी एक उम्र होती है। कुछ रिश्ते जीवनभर चलते हैं और कुछ कुछ वर्षों, महीनों या कभी-कभी कुछ पलों में अपना काम पूरा कर देते हैं। कुछ लोग हमें प्रेम करना सिखाने आते हैं। कुछ लोग हमें यह सिखाने आते हैं कि प्रेम में स्वयं को खोना नहीं चाहिए। कुछ लोग हमें छोड़कर जाते हैं ताकि हम अपने भीतर की ताकत पहचान सकें और कुछ लोग इतने गहरे उतर जाते हैं कि उनके चले जाने के बाद भी वे हमारी स्मृतियों में जीवित रहते हैं। शायद प्रेम को समझने के लिए ईश्वर को समझना जरूरी नहीं, लेकिन ईश्वर की तरह प्रेम भी अदृश्य होकर प्रभाव डालता है। हम ईश्वर को देख नहीं पाते, लेकिन विश्वास करते हैं। हम प्रेम को छू नहीं सकते, लेकिन महसूस करते हैं। शायद इसी कारण प्रेम को मनुष्य के भीतर ईश्वर की सबसे सुंदर अनुभूतियों में से एक माना जा सकता है। क्योंकि प्रेम हमें अपने स्वार्थ से बाहर निकालता है। जब हम किसी की खुशी के लिए प्रार्थना करते हैं, बिना किसी अपेक्षा के, तब प्रेम अपने सबसे पवित्र रूप में दिखाई देता है।
प्रेम की कोई अंतिम परिभाषा नहीं है। जिसने प्रेम किया, उसके लिए प्रेम की अपनी कहानी है। किसी के लिए प्रेम पहली मुलाकात है, किसी के लिए वर्षों का साथ, किसी के लिए मां की गोद, किसी के लिए पिता का संघर्ष, किसी के लिए किसी दोस्त का बिना पूछे साथ खड़ा हो जाना और किसी के लिए वह व्यक्ति, जो अब उसके साथ नहीं है, लेकिन आज भी उसकी यादों में सांस लेता है। प्रेम ताकत भी है और कमजोरी भी। यह हमें दुनिया से लड़ने का साहस देता है और कभी-कभी उसी दुनिया से छिपकर रोने की वजह भी। यह हमें किसी के करीब लाता है और कभी-कभी किसी के दूर जाने का दर्द भी देता है। लेकिन शायद प्रेम की खूबसूरती इसी विरोधाभास में है। प्रेम में जीतना जरूरी नहीं, प्रेम को समझना जरूरी है। किसी को पाना प्रेम की एक संभावना है, लेकिन किसी को उसकी खुशी में खुश देख पाना प्रेम की ऊंचाई है। किसी के साथ जिंदगी बिताना सुंदर है, लेकिन किसी के जीवन को सुंदर बनाने की कोशिश करना उससे भी सुंदर है। इसलिए प्रेम कीजिए। पूरे मन से कीजिए। लेकिन प्रेम में स्वयं को मत खोइए। किसी पर विश्वास कीजिए, लेकिन अपनी आत्मा की आवाज को मत दबाइए। किसी का हाथ थामिए, लेकिन यदि कभी वह हाथ छूट जाए तो अपने पैरों पर खड़े होना मत भूलिए। क्योंकि प्रेम जीवन का अंत नहीं है। प्रेम जीवन का वह अध्याय है, जो हमें यह सिखाता है कि मनुष्य केवल सांसों से नहीं, भावनाओं से भी जीवित रहता है। और अंततः प्रेम हमारे भाग्य में क्या लिखेगा, यह हम नहीं जानते। कौन हमारा होगा, कौन बिछड़ जाएगा, कौन याद बन जाएगा यह भी नहीं जानते। लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि जब प्रेम सच्चा होता है, तो वह हमें पहले जैसा नहीं रहने देता। वह हमें बदल देता है। और शायद यही प्रेम का सबसे बड़ा चमत्कार है।
–डा. पंकज भारद्वाज, एवीके न्यूज सर्विस
