भारत अनेक प्राचीन तीर्थयात्राओं और सांस्कृतिक परंपराओं का देश, पंढरपुर वारी भी ऐसी ही एक अद्वितीय परंपरा – डॉ. सच्चिदानंद जोशी

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“पंढरपुर वारी – 700 वर्ष पुरानी परंपरा पर संवाद एवं प्रस्तुति”

नई दिल्ली । भारत की सात सौ वर्षों से अधिक पुरानी जीवंत सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं में से एक पंढरपुर वारी का परिचय राजनयिक समुदाय को कराने के उद्देश्य से “पंढरपुर वारी – 700 वर्ष पुरानी परंपरा पर संवाद एवं प्रस्तुति” विषयक एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विभिन्न देशों के राजनयिकों एवं सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को वारी के सांस्कृतिक, सामाजिक और सभ्यतागत महत्व से परिचित कराना था। श्रद्धा, समता, सामाजिक सद्भाव, अनुशासन और सेवा जैसे मूल्यों पर आधारित यह परंपरा भारतीय संस्कृति की एक अद्वितीय धरोहर है।

इस अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, भाजपा अंतरराष्ट्रीय संपर्क विभाग के प्रमुख डॉ. विजय चौथाईवाले, दिल्ली मराठी प्रतिष्ठान के संस्थापक वैभव डांगे तथा आईजीएनसीए के डीन प्रो. सुधीर लाल प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम में रूस, सूरीनाम, फिलीपींस, अंगोला, मॉरीशस, थाईलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, मोल्दोवा, ऑस्ट्रेलिया, भूटान, इंडोनेशिया और ब्राज़ील के राजनयिक एवं सांस्कृतिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति वैश्विक स्तर पर बढ़ती रुचि का यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण रहा।

अपने संबोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि भारत अनेक प्राचीन तीर्थयात्राओं और सांस्कृतिक परंपराओं का देश है। उन्होंने कुंभ मेले का उल्लेख करते हुए कहा कि पंढरपुर वारी भी ऐसी ही एक अद्वितीय परंपरा है, जिसने सात शताब्दियों से भारतीय समाज के सांस्कृतिक चरित्र, सामाजिक समरसता, भक्ति और सामूहिक चेतना को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

डॉ. विजय चौथाईवाले ने अपने उद्बोधन में वारकरी परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके उद्भव की परिस्थितियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों और सामाजिक अस्थिरता के दौर में संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत एकनाथ और संत तुकाराम जैसे संतों ने भक्ति आंदोलन के माध्यम से समाज में आत्मविश्वास, नैतिक शक्ति और आध्यात्मिक चेतना का संचार किया। उन्होंने कहा कि वारी ने समाज का मनोबल बढ़ाने, सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखने तथा सामाजिक एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस अवसर पर श्री वैभव डांगे द्वारा लिखित पंढरपुर वारी पर आधारित मोनोग्राफ का लोकार्पण भी किया गया। इसके उपरांत श्री डांगे ने वारकरी परंपरा पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने वारी को केवल एक धार्मिक यात्रा न बताते हुए इसे सात सौ वर्षों से चली आ रही एक जीवंत सभ्यतागत परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया, जो समता, विनम्रता, सेवा, अनुशासन, सामूहिक सहभागिता और भक्ति के मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती रही है। पिछले नौ वर्षों से स्वयं वारी में सहभागी होने के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि वारी व्यक्ति को केवल ईश्वर के निकट ही नहीं ले जाती, बल्कि उसे अधिक संवेदनशील, सेवाभावी और मानवीय बनाती है।

प्रस्तुति के पश्चात उपस्थित राजनयिक प्रतिनिधियों ने वारी के इतिहास, संगठनात्मक व्यवस्था, अनुशासन, सामाजिक प्रभाव, समता के दर्शन, समुदाय निर्माण में इसकी भूमिका तथा आधुनिक विश्व में इसकी प्रासंगिकता को लेकर उत्सुकतापूर्वक अनेक प्रश्न पूछे। इस संवाद के माध्यम से उपस्थित प्रतिनिधियों को भारत की इस अद्वितीय जीवंत अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को निकट से समझने का अवसर प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम का समापन इस साझा भावना के साथ हुआ कि पंढरपुर वारी केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, सामाजिक समावेश, मानवता और भारतीय सभ्यता की निरंतरता का एक सशक्त प्रतीक है। इस आयोजन ने भारत और विभिन्न देशों के राजनयिक समुदाय के बीच सांस्कृतिक संवाद को और अधिक सुदृढ़ किया तथा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की एक अनूठी परंपरा को वैश्विक समुदाय के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।

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