2 नवंबर — पत्रकारों के विरुद्ध अपराधों में दंडमुक्ति समाप्त करने का अंतरराष्ट्रीय दिवस

लोकतंत्र में पत्रकारिता केवल समाचार प्रस्तुत करने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने, अन्याय को उजागर करने और समाज के सामने सच रखने का महत्वपूर्ण दायित्व है। लेकिन जब सच लिखने, भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने या जनहित के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों को धमकियाँ मिलती हैं, उन पर हमले होते हैं अथवा उनकी हत्या के दोषियों को सजा नहीं मिलती, तब संकट केवल पत्रकारिता का नहीं, बल्कि लोकतंत्र और नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार का भी होता है।
इसी गंभीर चुनौती के प्रति वैश्विक चेतना जगाने के लिए प्रतिवर्ष 2 नवंबर को पत्रकारों के विरुद्ध अपराधों में दंडमुक्ति समाप्त करने का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 दिसंबर 2013 को प्रस्ताव संख्या A/RES/68/163 के माध्यम से इस दिवस की घोषणा की थी। इसकी तारीख माली में 2 नवंबर 2013 को दो फ्रांसीसी पत्रकारों की हत्या की स्मृति से जुड़ी है।

पत्रकार समाज की आँख और कान की तरह काम करता है। वह उन घटनाओं और परिस्थितियों को सामने लाता है, जिन्हें अक्सर प्रभावशाली लोग छिपाए रखना चाहते हैं। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितता, मानवाधिकारों के उल्लंघन, अपराध और जनसमस्याओं पर निर्भीक रिपोर्टिंग जनहित की रक्षा करती है। लेकिन जब पत्रकार को खबर प्रकाशित करने के कारण धमकाया जाता है, झूठे मुकदमों में उलझाया जाता है, उसकी प्रतिष्ठा पर हमला होता है या उसे शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है, तो उसका प्रभाव एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। भय का वातावरण अन्य पत्रकारों को भी सवाल उठाने से रोक सकता है। परिणामस्वरूप, जनता तक महत्वपूर्ण सूचनाएँ पहुँचने में बाधा आती है और जवाबदेही की लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है।
संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को ने पत्रकारों की हत्या के मामलों में दोषियों को दंड न मिलने की समस्या पर लगातार चिंता जताई है। यूनेस्को के अनुसार, पत्रकारों के विरुद्ध अपराधों की प्रभावी जाँच और दोषियों को न्याय के कटघरे तक पहुँचाना दंडमुक्ति की संस्कृति को तोड़ने के लिए अनिवार्य है। दंडमुक्ति का आशय है ,अपराध होने के बावजूद दोषियों का कानून के अनुसार जवाबदेह न ठहराया जाना। जब किसी पत्रकार पर हमला करने वाले व्यक्ति या समूह को राजनीतिक, आर्थिक अथवा अन्य प्रभावों के कारण संरक्षण मिलता है, जाँच निष्पक्ष नहीं होती या मामला वर्षों तक लंबित रहता है, तो न्याय की आशा कमजोर पड़ती है। यह स्थिति अपराधियों का मनोबल बढ़ा सकती है। इससे यह खतरनाक संदेश जाता है कि सच उजागर करने वालों को निशाना बनाकर भी बचा जा सकता है। इसलिए पत्रकारों के विरुद्ध अपराधों की निष्पक्ष, त्वरित और प्रभावी जाँच केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता की कसौटी है।
आज पत्रकारों के सामने पारंपरिक खतरों के साथ डिजिटल दुनिया की चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं। सोशल मीडिया पर संगठित दुष्प्रचार, व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक करना, ऑनलाइन धमकियाँ, चरित्रहनन और महिलाओं को निशाना बनाकर की जाने वाली अपमानजनक टिप्पणियाँ स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए गंभीर बाधाएँ हैं। डिजिटल माध्यमों ने सूचना के प्रसार को आसान बनाया है, लेकिन गलत सूचना और भीड़ के दबाव ने पत्रकारों की जिम्मेदारियों तथा जोखिमों को भी बढ़ाया है। विशेष रूप से महिला पत्रकारों को ऑनलाइन उत्पीड़न और लैंगिक आधार पर निशाना बनाए जाने का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों को सामान्य इंटरनेट व्यवहार मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए कुछ बुनियादी कदम आवश्यक हैं:-
- पत्रकारों के विरुद्ध धमकी, हिंसा और हमलों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई हो।
- मामलों की जाँच निष्पक्ष हो तथा दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिले।
- पत्रकारिता के नाम पर जानबूझकर फैलाए गए झूठ और वास्तविक जनहित की रिपोर्टिंग के बीच अंतर समझा जाए।
- पत्रकारों को कानूनी सहायता, सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण और डिजिटल सुरक्षा के साधन उपलब्ध हों।
- मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों की सुरक्षा और संकट के समय सहायता के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाएँ।
- पत्रकार भी तथ्य-जाँच, संतुलित भाषा, निष्पक्षता और पेशेवर आचरण के मानकों का पालन करें।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं है; उसी प्रकार पत्रकार की गलती होने पर कानूनसम्मत कार्रवाई का अर्थ उसे डराने या हिंसा का निशाना बनाने की छूट भी नहीं है। आलोचना का उत्तर तर्क और तथ्यों से दिया जाना चाहिए, धमकी या हमले से नहीं। पत्रकारों की सुरक्षा केवल सरकार या मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज, न्यायपालिका, नागरिक संगठनों और आम नागरिकों की भी इसमें भूमिका है। जब किसी पत्रकार पर हमला होता है, तब यह देखना जरूरी है कि कहीं उस हमले के पीछे जनहित के प्रश्नों को दबाने की कोशिश तो नहीं है।
लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं आँकी जा सकती कि पत्रकार कितनी सहजता से प्रशंसा लिखते हैं, बल्कि इससे आँकी जानी चाहिए कि वे कितनी स्वतंत्रता से कठिन प्रश्न पूछ सकते हैं। पत्रकार की कलम को निर्भीक बनाए रखने के लिए कानून का निष्पक्ष शासन, संस्थागत जवाबदेही और समाज का जागरूक समर्थन आवश्यक है। 2 नवंबर हमें यही संदेश देता है कि सच लिखने वाले की सुरक्षा और उसके विरुद्ध अपराध करने वालों को न्याय के कटघरे तक पहुँचाना, स्वतंत्र समाज की अनिवार्य शर्त है। जहाँ अपराधी दंड से नहीं डरते, वहाँ सच कमजोर पड़ता है; और जहाँ सच कमजोर पड़ता है, वहाँ लोकतंत्र भी अपनी शक्ति खोने लगता है।
कलम न झुके भय के आगे,सच का उजियारा जीवित हो, अन्यायों के हर अँधियारे में, न्याय का दीप प्रज्वलित हो। जो जनहित में प्रश्न उठाए, उसको निर्भय आसमान मिले, पत्रकार सुरक्षित हों जब, लोकतंत्र को नया सम्मान मिले।।
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” ,
