
भारत के मानचित्र पर 1 नवंबर 2000 को एक नए राज्य के रूप में उभरा छत्तीसगढ़ आज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, प्राकृतिक संपदा, जनजातीय विरासत और विकास की आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि का स्मरण नहीं, बल्कि उन जनभावनाओं, संघर्षों और सपनों को नमन करने का अवसर है, जिनकी परिणति पृथक राज्य के गठन के रूप में हुई। वर्ष 2025 में राज्य ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे किए और रजत जयंती मनाई। नवंबर 2026 में स्थापना दिवस की 26वीं वर्षगाँठ हमें बीते वर्षों की उपलब्धियों का मूल्यांकन करने और आने वाले कल के लिए नए संकल्प लेने का अवसर प्रदान करती है।

छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पहचान अत्यंत प्राचीन है। इस क्षेत्र का संबंध दक्षिण कोसल की ऐतिहासिक परंपरा से जोड़ा जाता है। यहाँ के पुरातात्त्विक अवशेष, मंदिर, लोकगाथाएँ और ऐतिहासिक स्थल इसकी समृद्ध विरासत के साक्षी हैं। रतनपुर, सिरपुर, मल्हार, राजिम और अन्य स्थानों का इतिहास इस भूभाग की सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाता है। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की माँग केवल प्रशासनिक सुविधा तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे भाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय विकास, स्थानीय आकांक्षाओं और संसाधनों पर क्षेत्र के लोगों की भागीदारी की भावना भी थी। लंबे समय तक यह क्षेत्र अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा रहा। पृथक राज्य की माँग को राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर समर्थन मिला तथा संसद में मध्य प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पारित होने के बाद 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पृथक राज्य के गठन से लोगों को उम्मीद जगी कि प्रशासन स्थानीय आवश्यकताओं के अधिक निकट आएगा, क्षेत्रीय समस्याओं पर बेहतर ध्यान दिया जाएगा और विकास की प्राथमिकताएँ स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित की जा सकेंगी।
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। यहाँ की कृषि परंपरा, ग्रामीण जीवन और लोकसंस्कृति का गहरा संबंध भूमि, जल, वन और ऋतुओं से है। महानदी, शिवनाथ, इंद्रावती, अरपा और हसदेव जैसी नदियाँ प्रदेश के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। वन संपदा, खनिज संसाधन और जैव विविधता भी इसकी विशिष्ट पहचान हैं। प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में लौह अयस्क, कोयला, चूना पत्थर और अन्य खनिज उपलब्ध हैं। इस संसाधन-संपन्नता ने ऊर्जा, इस्पात, सीमेंट तथा अन्य औद्योगिक गतिविधियों के विकास की संभावनाएँ बढ़ाई हैं। भिलाई इस्पात संयंत्र जैसे औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय औद्योगिक परिदृश्य में विशेष स्थान दिलाया है। लेकिन प्राकृतिक संपदा का वास्तविक महत्व तभी है, जब उससे प्राप्त लाभ स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाएँ। खनन और औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण, जल संसाधनों की रक्षा, वन्यजीवों का संरक्षण और प्रभावित समुदायों के अधिकारों का सम्मान भी आवश्यक है। विकास की सफलता केवल उत्पादन के आँकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जानी चाहिए कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुँचा।
छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसके खनिजों और कृषि उत्पादन से नहीं, बल्कि उसकी जीवंत लोकसंस्कृति से भी है। पंथी, राउत नाचा, सुआ नृत्य, करमा, सैला और लोकगीतों की परंपराएँ पीढ़ियों से समाज को जोड़ती रही हैं। हरेली, तीजा, पोला, छेरछेरा और अनेक स्थानीय पर्व ग्रामीण जीवन की सामूहिकता तथा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को अभिव्यक्त करते हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा जनजीवन की आत्मीय अभिव्यक्ति है। लोककथाओं, कहावतों, गीतों और नाट्य परंपराओं में यहाँ के लोगों का अनुभव, हास्य, संघर्ष और जीवन-दर्शन सुरक्षित है। पंडवानी की प्रसिद्ध गायिका तीजन बाई जैसी कलाकारों ने छत्तीसगढ़ की लोककला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। यह भी आवश्यक है कि लोकसंस्कृति को केवल उत्सवों और मंचीय कार्यक्रमों तक सीमित न रखा जाए। स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण साहित्य, बच्चों के लिए पाठ्य सामग्री, लोककलाकारों के लिए सम्मानजनक अवसर और पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण संस्कृति को भविष्य तक पहुँचाने के महत्वपूर्ण उपाय हैं।
राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ ने प्रशासनिक ढाँचे, सड़क संपर्क, ऊर्जा उत्पादन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और ग्रामीण विकास के अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़ने का प्रयास किया है। नए जिलों और प्रशासनिक इकाइयों के निर्माण से कई क्षेत्रों में शासन की पहुँच बढ़ाने की संभावना बनी है। समय के साथ शहरीकरण, औद्योगिक निवेश, संचार सुविधाओं और डिजिटल सेवाओं का विस्तार भी हुआ है। वर्ष 2025 में राज्य की रजत जयंती के अवसर पर विकास परियोजनाओं, आधारभूत संरचना और जनकल्याण से संबंधित कार्यक्रमों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। यह अवसर इस बात का भी स्मरण कराता है कि विकास की यात्रा निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। प्रत्येक उपलब्धि के साथ नई अपेक्षाएं और नई ज़िम्मेदारियां जुड़ती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, बिजली, आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। किसानों की आय, कृषि की उत्पादकता, सिंचाई, भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित रोजगार के अवसर भी महत्वपूर्ण हैं। धान उत्पादन में प्रतिष्ठित प्रदेश को कृषि विविधीकरण, स्थानीय उत्पादों के मूल्य संवर्धन और बाजार तक बेहतर पहुंच पर भी ध्यान देना चाहिए। इसी प्रकार उद्योगों के विस्तार के साथ स्थानीय युवाओं के कौशल विकास और रोजगार को जोड़ना आवश्यक है। यदि औद्योगिक प्रगति के बीच स्थानीय प्रतिभाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तो विकास का लाभ अपेक्षित व्यापकता प्राप्त नहीं कर पाता।
किसी भी राज्य का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी की क्षमताओं पर निर्भर करता है। विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षकों की उपलब्धता, पुस्तकालयों का विकास, डिजिटल संसाधनों तक पहुँच और उच्च शिक्षा के अवसरों का विस्तार आवश्यक है। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को भी वही अवसर मिलने चाहिए, जो बड़े शहरों में रहने वाले बच्चों को उपलब्ध होते हैं।तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, उद्यमिता और रोजगारोन्मुखी कौशल युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक हो सकते हैं। स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कृषि तकनीक, वन आधारित उद्योग, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं और सूचना प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, कुपोषण, जनजातीय क्षेत्रों में चिकित्सकीय पहुँच, मानसिक स्वास्थ्य और विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की इमारतों के साथ प्रशिक्षित कर्मियों, आवश्यक दवाओं और गुणवत्तापूर्ण उपचार की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना में जनजातीय समुदायों का विशेष स्थान है। उनकी भाषाएँ, परंपराएँ, प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की जीवनशैली और सामुदायिक ज्ञान प्रदेश की अमूल्य धरोहर हैं। जनजातीय क्षेत्रों में विकास की योजनाएँ बनाते समय स्थानीय समाज की भागीदारी और सहमति को महत्व देना आवश्यक है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, संचार और आजीविका के अवसरों के साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान तथा पारंपरिक अधिकारों की रक्षा भी होनी चाहिए। लघु वनोपज, हस्तशिल्प, स्थानीय कृषि उत्पाद और पारंपरिक कौशल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं। उचित मूल्य, प्रसंस्करण, विपणन और सहकारी व्यवस्थाओं के माध्यम से स्थानीय परिवारों की आय में सुधार किया जा सकता है। जनजातीय समाज को विकास का केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया का सक्रिय सहभागी बनाना समय की माँग है।
छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों ने लंबे समय तक नक्सल हिंसा और संघर्ष का दंश झेला है। इस हिंसा ने नागरिकों के जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और आधारभूत सुविधाओं को प्रभावित किया। सुरक्षा संबंधी प्रयासों के साथ यह भी आवश्यक है कि प्रभावित क्षेत्रों में शासन की विश्वसनीय उपस्थिति, न्याय तक पहुँच और विकास की सुविधाएँ मजबूत हों। स्थायी शांति के लिए नागरिकों की सुरक्षा, स्थानीय समुदायों का विश्वास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और लोकतांत्रिक भागीदारी महत्वपूर्ण हैं। हिंसा से प्रभावित परिवारों का पुनर्वास तथा सामान्य जीवन की ओर लौटने के अवसर भी संवेदनशीलता के साथ सुनिश्चित किए जाने चाहिए। शांति का वास्तविक अर्थ केवल हिंसा में कमी नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण है जिसमें नागरिक भयमुक्त होकर शिक्षा प्राप्त कर सकें, आजीविका कमा सकें और अपने भविष्य के बारे में स्वतंत्रता से निर्णय ले सकें।
वनों, नदियों और जैव विविधता से समृद्ध छत्तीसगढ़ के सामने पर्यावरण संरक्षण एक महत्वपूर्ण चुनौती है। बढ़ते औद्योगिक दबाव, खनन, शहरी विस्तार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए दीर्घकालीन दृष्टि आवश्यक है। नदी संरक्षण, वर्षा जल संचयन, वनों का पुनर्जीवन, स्थानीय प्रजातियों के वृक्षारोपण, प्रदूषण नियंत्रण और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों की रक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन करते समय उनके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को गंभीरता से समझना आवश्यक है। अरपा जैसी नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि शहरों की ऐतिहासिक स्मृति, पर्यावरण और जनजीवन का हिस्सा हैं। नदियों का संरक्षण तभी प्रभावी होगा, जब जलग्रहण क्षेत्र, प्राकृतिक प्रवाह, प्रदूषण नियंत्रण और नागरिक सहभागिता को एक साथ महत्व दिया जाए।
राज्य की प्रगति में सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संस्थाओं, शिक्षकों, पत्रकारों, साहित्यकारों और सामान्य नागरिकों की साझा भूमिका है। पारदर्शिता, जवाबदेही, समयबद्ध सेवाएं और शिकायतों का प्रभावी निराकरण सुशासन के आधार हैं। नागरिकों को भी सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, करों के प्रति जिम्मेदारी, स्वच्छता, जल संरक्षण और सामाजिक सद्भाव में योगदान देना चाहिए। लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है; जनहित के विषयों पर जागरूक रहना, तथ्यों के आधार पर प्रश्न पूछना और रचनात्मक सहभागिता निभाना भी नागरिक दायित्व है। पत्रकारिता की भूमिका यहाँ विशेष महत्वपूर्ण हो जाती है। उपलब्धियों का तथ्यपरक प्रस्तुतीकरण और समस्याओं की निष्पक्ष पड़ताल, दोनों लोकतांत्रिक विकास के लिए आवश्यक हैं। पत्रकारिता को न तो केवल प्रशंसा तक सीमित होना चाहिए और न ही आलोचना को तथ्यहीन आरोपों में बदलना चाहिए। उसका वास्तविक दायित्व जनहित और सत्य के प्रति प्रतिबद्ध रहना है।
छत्तीसगढ़ की स्थापना के 26वें वर्ष में प्रवेश करते समय सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आने वाले वर्षों में विकास को अधिक समावेशी, संतुलित और टिकाऊ कैसे बनाया जाए। इसके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता, किसानों और श्रमिकों की आय, युवाओं के लिए रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा, जनजातीय अधिकारों का सम्मान तथा पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। शहरों में बेहतर यातायात, स्वच्छ हवा, जल निकासी और कचरा प्रबंधन आवश्यक हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई, बाजार संपर्क, स्वास्थ्य सुविधाएँ और डिजिटल पहुँच को मजबूत करना होगा। पर्यटन स्थलों और ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण स्थानीय रोजगार बढ़ाने का माध्यम बन सकता है, बशर्ते विकास प्रकृति और संस्कृति के अनुकूल हो। सच्ची प्रगति तब होगी, जब किसी बच्चे का भविष्य उसके गाँव या आर्थिक स्थिति के कारण सीमित न हो; किसी किसान को उचित मूल्य के लिए संघर्ष न करना पड़े; किसी नागरिक को उपचार के अभाव में कठिनाई न झेलनी पड़े और किसी समुदाय को अपनी भाषा, संस्कृति या पहचान बचाने के लिए असुरक्षित महसूस न करना पड़े।
छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस हमें अतीत के संघर्षों का सम्मान करने, वर्तमान की उपलब्धियों का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करने और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा देता है। प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक विविधता और मेहनतकश जनता इस प्रदेश की सबसे बड़ी ताकत हैं।राज्य की स्थापना एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, लेकिन उस उपलब्धि का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा, जब विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्ण जीवन के अवसर मिलें। छत्तीसगढ़ का भविष्य केवल बड़े उद्योगों, सड़कों और भवनों से नहीं, बल्कि शिक्षित बच्चों, स्वस्थ परिवारों, सशक्त महिलाओं, समृद्ध किसानों, सुरक्षित जनजातीय समुदायों और जागरूक नागरिकों से निर्मित होगा। आइए, स्थापना दिवस पर हम संकल्प लें कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी, जल, जंगल, भाषा, लोककला और मानवीय संवेदनाओं की रक्षा करते हुए इसे समृद्ध, समतामूलक और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार प्रदेश बनाने में अपनी भूमिका निभाएँगे।
छत्तीसगढ़ महतारी की जय!
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” ,
