पुस्तक समीक्षा

समीक्षक: उमेश कुमार सिंह
भारत के इतिहास को सिर्फ राजा-रजवाड़ों, सत्ता के खेल या आज़ादी की बड़ी घटनाओं के चश्मे से देखना काफी नहीं है। समाज की नस-नस में जो नए विचार दौड़े, जो धर्म-सुधार हुए और आम जनमानस में जो चेतना जगी, उसे समझे बिना इतिहास अधूरा है। उन्नीसवीं सदी में उठे सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने कई पुराने सवालों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया। इसी कड़ी में आर्य समाज का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। डॉ. राकेश कुमार आर्य की सद्यः प्रकाशित कृति ‘आर्य समाज : है बलिदानी इतिहास हमारा’ इसी विमर्श को पूरी तरह से केंद्र में लाती है। यह सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि उस कड़े संघर्ष, वैचारिक मंथन और राष्ट्र-निर्माण की ज़मीनी हक़ीक़तों का एक खुला झरोखा है, जहाँ से हम आर्य समाज के योगदान को बिल्कुल साफ-साफ देख सकते हैं।

लेखक: डॉ. राकेश कुमार आर्य
ग़ौरतलब है कि 1875 में जब महर्षि दयानंद ने आर्य समाज का बीज बोया, तब उनका इरादा महज़ एक नया संगठन खड़ा करने का हरगिज़ नहीं था। वे तो दरअसल वेदों की उस ठेठ रोशनी से उन दीमक लगी रवायतों को भस्म करना चाहते थे, जिन्होंने समूचे समाज को पंगु बना दिया था। उनकी इस आवाज़ का असर सिर्फ पूजा-पाठ या कर्मकांडों तक सिमट कर नहीं रह गया। तालीम का मैदान हो या आम जनजीवन, हर मोर्चे पर उनकी बातों ने गहरी चोट की। बाद में इस विचार से जुड़े तमाम लोगों ने ज़मीन पर उतरकर जमकर काम किया और अपने दायरे को गाँव-देहात तक फैला दिया। आज के दौर में इस आंदोलन की नब्ज़ टटोलना इसलिए भी लाज़िमी हो जाता है, जिससे हम अपनी असल जड़ों और आज की दौड़-भाग (आधुनिकता) के बीच एक सही पुल बाँध सकें।

पुस्तक का शीर्षक पढ़ते ही माजरा काफी हद तक साफ हो जाता है। इसमें साफ तौर पर उस तपस्या और शहादत की गूँज है, जिसने आर्य समाज के समूचे इतिहास की रूपरेखा गढ़ी। ज़ाहिर है, इसे हाथ में लेते ही पाठक के ज़ेहन में पहला सवाल यही कौंधता है कि उन घुटन भरे और विपरीत हालात में आखिर इन लोगों ने ऐसा कौन-सा जादू किया, जिसने पूरे समाज का रुख ही पलट कर रख दिया? हालांकि, एक सजग पाठक के नाते हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इतिहास को सिर्फ तारीफों के ज़रिए नहीं तौला जाता। इसके लिए उस दौर की ज़मीनी हक़ीक़त, किरदारों के असल काम और पक्के सबूतों को कसौटी पर परखना पड़ता है। तभी हम किसी भी वैचारिक क्रांति का सच सामने ला पाते हैं।
आर्य समाज के सफर पर बात करते वक्त, समाज सुधार और राष्ट्रभक्ति के बीच बुने गए गहरे ताने-बाने को कतई नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हमारी आज़ादी की लड़ाई किसी एक विचार की मोहताज नहीं थी; इसमें कई अलग-अलग धाराओं ने अपना खून-पसीना एक किया था। आर्य समाज के कई पुरोधाओं ने कुरीतियों से लड़ने के साथ-साथ शिक्षा और राष्ट्रीय जन-जागरण में अपना सब कुछ झोंक दिया। इन बातों को गहराई से पढ़ने पर ही भारतीय इतिहास की वो असली तस्वीर साफ होती है, जो अमूमन धुंधली रह जाती है। हाँ, किसी भी व्यक्ति या संस्था का कद तय करते समय उनके दावों और ऐतिहासिक प्रमाणों के बीच एक साफ रिश्ता ज़रूर होना चाहिए।
डॉ. राकेश कुमार आर्य की यह किताब इसी ज़रूरी विमर्श की ओर हमारा ध्यान खींचती है। ऐसी किताबों की असली कामयाबी यही है कि वे हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटने पर मजबूर कर दें, जिन पर आम तौर पर इतिहासकारों की नज़र कम जाती है। जब हम संस्थाओं, घटनाओं और उनसे जुड़े लोगों को एक साथ रखकर देखते हैं, तो बदलाव की असली तस्वीर उभर कर आती है। हालांकि, किताब के दावों, उसकी रिसर्च और तथ्यों की सच्चाई पर पक्की राय तभी बनाई जा सकती है, जब पाठक खुद इसमें दिए गए संदर्भों को बारीकी से खंगाले।
शहादत और संघर्ष की कहानियाँ हमारे देश के इतिहास में हमेशा से नाज़ुक विषय रही हैं। किसी महापुरुष या संगठन के योगदान को याद रखना जितना ज़रूरी है, उतना ही यह भी अहम है कि वह बात पुख्ता ऐतिहासिक सबूतों की बुनियाद पर खड़ी हो। कोरी भावुकता किसी मुद्दे के प्रति हमारा ध्यान तो खींच सकती है, लेकिन इतिहास की असल साख तो ठोस तथ्यों से ही तय होती है। अगर लेखक ने आर्य समाज के नायकों और उनके कामों का ब्योरा प्रामाणिक दस्तावेज़ों के सहारे पेश किया है, तो यकीनन यह किताब हर पाठक के लिए एक शानदार संदर्भ ग्रंथ साबित होगी। जहाँ स्रोत थोड़े कमज़ोर लगें, वहाँ एक ज़िम्मेदार समीक्षा का काम है कि वह पाठकों को अपनी तरफ से और ज़्यादा खोजबीन करने के लिए उकसाए।
किताब में हैदराबाद सत्याग्रह और गोवा मुक्ति आंदोलन जैसे बड़े ऐतिहासिक प्रसंग भी आते हैं। ऐसे मामलों में भी वैसी ही सावधानी बरतने की ज़रूरत है। इन जन-आंदोलनों की अपनी एक अलग राजनीतिक ज़मीन और पेचीदा हालात थे। अगर यह किताब इन संघर्षों में आर्य समाज की भूमिका का दावा करती है, तो उस भूमिका को तत्कालीन दस्तावेज़ों और भरोसेमंद ऐतिहासिक शोध के तराजू पर तौला जाना चाहिए। किसी आंदोलन का महज़ समर्थन करना, उसमें सीधे शामिल होना या फिर उसका नेतृत्व करना—ये तीनों बिल्कुल अलग बातें हैं। इन बारीकियों को समझे बिना कोई भी पाठक विशाल ऐतिहासिक कैनवस पर किसी एक संगठन की असली जगह तय नहीं कर सकता।
किसी भी ऐतिहासिक किताब को परखने का कोई एक तय पैमाना नहीं होता। भाषा और शैली के साथ-साथ यह भी देखना पड़ता है कि तथ्य कहाँ से जुटाए गए हैं। सरल और बिना लाग-लपेट वाली भाषा पाठक को आसानी से अपने साथ जोड़ लेती है, लेकिन घटनाओं की तारीखें, नाम और उनके संदर्भ किताब की प्रामाणिकता की जान होते हैं। अगर लेखक ने संदर्भ-सूची और अभिलेखागार के दस्तावेज़ों का सही हवाला दिया है, तो यह किताब सिर्फ आम पाठकों के लिए नहीं, बल्कि शोधार्थियों और इतिहास के गंभीर विद्यार्थियों के लिए भी काम की चीज़ बन जाती है। ज़ाहिर है, इस कृति की भाषा, बुनावट और शोध के तरीकों पर आखिरी मुहर तो इसे पूरा पढ़ने के बाद ही लगाई जा सकती है।
इस किताब के बहाने एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि हम आज की पीढ़ी के सामने इतिहास को किस शक्ल में पेश कर रहे हैं। इतिहास पढ़ना सिर्फ गुज़रे हुए कल को रटना नहीं है; यह तो उन सामाजिक बदलावों, वैचारिक टकरावों और मुश्किल वक्त में लिए गए फैसलों को समझने की एक प्रक्रिया है। आर्य समाज जैसे आंदोलनों को पढ़ने से हमें यह सोचने का मौक़ा मिलता है कि कैसे कोई वैचारिक जागरण पूरे समाज की तकदीर बदल सकता है। ऐसे विमर्शों में सिर्फ उपलब्धियों के ही गीत न गाए जाएं, बल्कि तत्कालीन कमियों और वैचारिक मतभेदों को भी बेबाकी से सामने रखा जाए, तभी हमारी ऐतिहासिक समझ मुकम्मल होती है।
कुल मिलाकर कहें तो, डॉ. राकेश कुमार आर्य की कलम से निकली यह कृति ‘आर्य समाज : है बलिदानी इतिहास हमारा’, उन तमाम पाठकों के लिए एक बेहद ज़रूरी दस्तावेज़ बन जाती है, जिनकी दिलचस्पी भारतीय समाज की बुनावट, धर्म-सुधार की लहर और राष्ट्र-निर्माण के उन पन्नों में है जिन पर अब तक कम ही बात हुई है। इस काम को पढ़ते या तौलते समय हमें इसके ऐतिहासिक पलड़े के साथ-साथ इस बात पर भी पैनी नज़र रखनी होगी कि तथ्य कितने बेलाग और निष्पक्ष हैं। आख़िरकार, एक ईमानदार और खरी समीक्षा का काम कोरी वाहवाही करना नहीं होता, और न ही वह बिना सिर-पैर के मीनमेख निकालती है। समीक्षक की असली ज़िम्मेदारी बस इतनी सी है कि वह किताब की खूबियों-खामियों का अक्स दिखाए और पाठक को मजबूर कर दे कि वह खुद उस विषय की गहराई में गोते लगाए। अगर इस पैमाने पर कसें, तो आर्य समाज के उस तपते और शानदार अतीत को समेटने वाली यह पुस्तक, समाज-सुधार की ठंडी पड़ चुकी बहसों में एक नई और बेहद सार्थक गर्माहट ज़रूर पैदा करती है।
पुस्तक: आर्य समाज : है बलिदानी इतिहास हमारा लेखक: डॉ. राकेश कुमार आर्य प्रकाशक: डायमंड पॉकेट बुक्स समीक्षक: उमेश कुमार सिंह, एवीके न्यूज सर्विस
