रामचरितमानस की चौपाइयां मंत्र के समान, कथा श्रवण से जीवन में मिलती है शांति
नौगढ़। नौगढ़ बाजार स्थित दुर्गा मंदिर परिसर में आयोजित नौ दिवसीय भव्य श्रीराम कथा के प्रथम दिन कथावाचिका राघव प्रिया ओझा ने श्रद्धालुओं को सत्संग, भक्ति और मर्यादित जीवन का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि कलियुग के प्रभाव से बचने का सबसे उत्तम उपाय भगवान की भक्ति है। केवल कथा सुनना ही पर्याप्त नहीं है। बल्कि उसके संदेशों को अपने जीवन में उतारना भी जरूरी है। श्रीराम का चरित्र मर्यादा, आदर्श और धर्म की प्रतिमूर्ति है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर मनुष्य अपने आचरण को श्रेष्ठ बना सकता है।कथावाचिका ने सत्संग की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि बहुत पुण्य और तप-आराधना के फलस्वरूप सत्संग की प्राप्ति होती है।
सत्संग मनुष्य के विचारों को शुद्ध कर के उसे सही-गलत के बीच अंतर समझने की प्रेरणा देता है। भगवान का बार-बार स्मरण और निरंतर भजन करने से उनके प्रति प्रेम और विश्वास प्रगाढ़ होता है। निरंतर अभ्यास से मनुष्य भगवान के सानिध्य का अनुभव कर सकता है। बताया कि भगवान का दूसरा नाम करुणानिधान है। जो भक्त सच्चे मन से उन्हें याद करता है। उस पर उनकी कृपा अवश्य बरसती है। भक्त प्रह्लाद की कथा का वर्णन करते हुए बताया कि भगवान अपने भक्तों के प्रेम और विश्वास के वशीभूत होते हैं। भगवान को पाने के लिए दिखावे की नहीं, बल्कि सच्चे हृदय और निर्मल भावना की आवश्यकता होती है। अहिल्या और शबरी की भक्ति का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान की कृपा पाने में जाति, पद और प्रतिष्ठा नहीं। बल्कि भक्ति और समर्पण का महत्व है। मनुष्य से गलतियां होना स्वाभाविक है। लेकिन अपनी भूल को स्वीकार कर सही मार्ग पर चलना ही सच्ची साधना है। मनुष्य का शरीर बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। पशु शारीरिक रूप से बलशाली हो सकते हैं।
लेकिन मनुष्य को विवेक और भगवान का भजन करने की विशेष क्षमता मिली है। विद्यावान और विवेकवान होने में अंतर बताते हुए कहा कि केवल शिक्षा प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान का सदुपयोग करने और सही निर्णय लेने की क्षमता ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है।
कथावाचिका ने कहा कि जीवन में माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए। उनके प्रति कटु वचन बोलना और उनका अनादर करना उचित नहीं है। परिवार में संस्कार और प्रेम बनाए रखने के लिए बड़ों का आदर आवश्यक है। सनातन धर्म की मान्यताओं, गौ माता की महिमा और भारतीय संस्कृति में सेवा एवं करुणा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। कहा कि गौ माता को सनातन परंपरा में विशेष पूजनीय स्थान प्राप्त है।तीर्थराज प्रयाग में भरत जी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान श्रीराम की प्राप्ति ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। जीवन में प्रभु राम का प्रेम और आशीर्वाद मिल जाए तो मनुष्य को किसी अन्य वस्तु की लालसा नहीं रहती। रामचरितमानस का श्रवण जीवन की भागदौड़ और मानसिक अशांति के बीच विश्राम प्रदान करता है।
जिसकी एक-एक चौपाई में जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणा समाहित है। गंगा स्नान से तन की शुद्धि का भाव जुड़ा है। जबकि भगवान का भजन मन को निर्मल बनाता है। कथावाचिका ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि भगवान की कथा का वास्तविक लाभ उनके आदर्शों को व्यवहार में अपनाने से ही मिलता है। प्रभु श्रीराम के चरित्र का अनुसरण कर मनुष्य अपने जीवन में मर्यादा, प्रेम, त्याग और सदाचार को स्थान दे सकता है। कथा के दौरान भक्ति गीतों और प्रसंगों से दुर्गा मंदिर परिसर भक्तिमय बना रहा।
