एचएनएलयू में आदिवासी समुदायों के लिए न्याय तक पहुँच विषय पर कार्यशाला का आयोजन

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रायपुर: हिदायतुल्ला राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू), रायपुर के सेंटर फॉर लॉ एंड इंडिजेनस पीपल (Centre for Law and Indigenous People) द्वारा तथा सेंटर फॉर कोंस्टीटूशनल लॉ एंड फेडरलिस्म (Centre for Constitutional Law and Federalism) के सहयोग से तथा CG Learn Programme के अंतर्गत “मूल निवासी समुदायों के लिए न्याय तक पहुँच का ऑडिट: समावेश, जवाबदेही और परिवर्तनकारी न्याय का आकलन (Auditing Access to Justice for Indigenous Communities: Measuring Inclusion, Accountability, and Transformative Justice)” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश माननीय श्री न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में न्यायपालिका, शिक्षाविदों, विधि प्रोफेशनल्स, शोधकर्ताओं, नागरिक समाज संगठनों तथा विद्यार्थियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने संवैधानिक शासन, आदिवासी अधिकारों, सामुदायिक भागीदारी, पारिस्थितिक न्याय तथा न्याय तक पहुँच जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में प्रो. (डॉ.) वी. सी. विवेकानंदन, कुलपति, एचएनएलयू, ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय तक पहुँच का मूल्यांकन समाज के सबसे वंचित और कमजोर नागरिकों के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। उन्होंने कम्युनिटी जस्टिस फेलोज़ (Community Justice Fellows), आदिवासी भाषाओं में कानूनी नोटिसों के AI-आधारित अनुवाद, Legal Health Clinics, Mobile Constitutional Caravans तथा Indigenous Wisdom Councils जैसी अभिनव पहलों के विचार प्रस्तुत किए।

उद्घाटन संबोधन में माननीय न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा ने न्याय तक पहुँच को “सस्ता, सुलभ, स्वच्छ न्याय” के दृष्टिकोण से परिभाषित करते हुए किफायती, सुलभ और निष्पक्ष न्याय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने न्याय वितरण प्रणाली को सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील तथा समुदाय-केंद्रित बनाने के महत्व को रेखांकित किया। तकनीकी सत्रों में अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों, आवास एवं वन अधिकारों, ग्राम सभा के शासन, सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन, जैव-विविधता संरक्षण तथा न्यायिक उपचार एवं राज्य संस्थाओं तक पहुँच में आदिवासी समुदायों के सामने आने वाली व्यावहारिक बाधाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम में अविनाश दुबे, सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, रायपुर; डॉ. गीतंजोय साहू, डीन, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), मुंबई; तथा Centre for Social Justice और Ashoka Trust for Research in Ecology and the Environment (ATREE), बेंगलुरु से रिसोर्स पर्सन्स को आमंत्रित किया गया था।

कार्यक्रम की रूपरेखा डॉ. अयान हजरा, प्रमुख, Centre for Law and Indigenous People, द्वारा तैयार की गई। डॉ. दीपक श्रीवास्तव, प्रभारी कुलसचिव, ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि डॉ. अविनाश सामल ने समापन सत्र में कार्यक्रम का संक्षिप्त प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। सुश्री श्रेया केसरी और सुश्री तन्जील ने कार्यक्रम का संचालन किया। कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण अरण्यका (Aaranyaka) के प्रथम अंक का औपचारिक विमोचन रहा। यह एक पीयार रिवीव्ड शोध पत्रिका है, जो विधि, आदिवासी समुदायों, संवैधानिक शासन, पारिस्थितिकी तथा परिवर्तनकारी न्याय से संबंधित अकादमिक विमर्श को समर्पित है।कार्यशाला का समापन भारत में समावेशी, जवाबदेह और परिवर्तनकारी न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से शोध सहयोग को बढ़ावा देने, कानूनी साक्षरता की पहलों को मजबूत करने, समुदाय-केंद्रित न्याय तंत्र विकसित करने तथा नीतिगत सहभागिता को बढ़ाने के आह्वान के साथ हुआ।

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