महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति ने ‘विदा होती बेटियाँ’ को बताया मानवीय मूल्यों की सशक्त कृति

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शक्तिनगर । समकालीन हिंदी कविता के संवेदनशील हस्ताक्षर डॉ. ओम प्रकाश के काव्य-संग्रह “विदा होती बेटियाँ” को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के माननीय कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी का स्नेहिल आशीष प्राप्त हुआ। इस अवसर पर कुलपति ने कृति की विषयवस्तु, उसकी मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकारों की गहन अभिव्यक्ति की सराहना करते हुए इसे “साहित्यिक संवेदना की अनुपम कृति” बताया।

डॉ. ओम प्रकाश, जो वर्तमान में एनटीपीसी सिंगरौली में उप महाप्रबंधक (मानव संसाधन–राजभाषा) के पद पर कार्यरत हैं, अपने लेखन में बेटियों, परिवार, श्रम, प्रेम और सामाजिक यथार्थ को अत्यंत आत्मीय और मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। उनका यह काव्य-संग्रह केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि करुणा, संवेदना और सामाजिक चेतना का जीवंत दस्तावेज़ है।

“विदा होती बेटियाँ” की विशेषता यह है कि इसकी कविताएँ घर-आँगन की आत्मीयता से आरंभ होकर समाज की जटिलताओं तक पहुँचती हैं और अंततः पाठक के अंतर्मन में गहरी छाप छोड़ती हैं। संग्रह में करुणा का जीवंत ताप स्पष्ट रूप से महसूस होता है, जहाँ कवि जीवन के संघर्षों के बीच मनुष्य के आत्मबल और आशा को स्वर देते हैं—

“हे प्रभु / आँखों में सपने देना /

तो उन्हें पूर्ण करने का साहस भी देना /

ताकि बोझिल पंख लिए /

विदा होने से बचा सकूँ ख़ुद को।”

यह स्वर केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि आज के संघर्षरत मनुष्य की अंतर्ध्वनि है।

संग्रह की शीर्षक कविता “विदा होती बेटियाँ” समाज की गहरी संवेदनाओं को स्पर्श करती है। कवि इस भावुक सामाजिक परंपरा को प्रश्नों के दायरे में रखते हुए लिखते हैं—

“विदा होती बेटियाँ / कभी-कभी / हमेशा के लिए भी / विदा हो जाती हैं।”

ये पंक्तियाँ केवल भाव नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ पर एक गंभीर टिप्पणी हैं।

काव्य-संग्रह में माता-पिता के जीवन और उनके भावनात्मक संसार का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। पिता के साये की महत्ता और माँ के अकेलेपन की व्यथा इन पंक्तियों में उभरती है—

“पिता की छाँव में, बेफ़िक्र ज़िंदगी बिताते हुए…

असमय पतझड़ में झुलस जाते हैं ख़्वाब।”

“भीड़ भरे शहर में, अकेली हूँ मैं…

और लौट आती है मेरी आवाज़ — तुम तक नहीं पहुँचती।”

संग्रह में श्रमिक जीवन की पीड़ा और सामाजिक विडंबनाएँ भी समान रूप से स्थान पाती हैं—

“लालकिले की प्राचीर से मैं ही गूँजता हूँ,

मैं ही अनसुना रह जाता हूँ संसद में।”

वहीं प्रेम को कवि ने केवल भावनात्मक अनुभूति नहीं, बल्कि प्रकाश और आशा के रूप में प्रस्तुत किया है—

“मैं छुपाता हूँ अपने भीतर प्यार,

ताकि घनघोर अँधेरे को

तुम्हारी चौखट का सूरज बना सकूँ।”

इस कृति की भाषा सरल है, परंतु भाव अत्यंत गहरे और प्रभावशाली हैं। कवि यह भी संकेत करते हैं कि आज के समय में सबसे कठिन कार्य संवेदनशील बने रहना है –

“सबसे कठिन है / कठोर वक़्त में / ख़ुद को सरल बनाए रखना।”

कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने अपने संबोधन में कहा कि “विदा होती बेटियाँ” समकालीन समाज में मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं और पारिवारिक संबंधों को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है। यह संग्रह न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में संवेदना और करुणा को पुनर्स्थापित करने का भी कार्य करता है। “विदा होती बेटियाँ” कविता के माध्यम से मनुष्य के भीतर मनुष्यता को जीवित रखने का एक सार्थक और प्रभावशाली प्रयास है, जो इसे समकालीन हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट और स्मरणीय स्थान प्रदान करता है।

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