कलियुग में साधना को अति सरल कर दिया गया – पंकज महराज 

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अहरौरा, मिर्जापुर। जयगुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था, मथुरा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संत पंकज जी महाराज अपने 108 दिवसीय शाकाहार-सदाचार एवं मद्यनिषेध आध्यात्मिक वैचारिक जनजागरण यात्रा के 52 वें पड़ाव पर श्रृंगी ऋषि जूनियर हाई स्कूल एकली में रविवार को भक्तों को संबोधित करते हुए कहा की कलियुग में साधना को अत्यंत सरल कर दिया गया है । अपने संदेश में महाराज जी ने कहा कि हमारे आपके जन्म-मरण का आधार शब्द है। शब्द पर हमारी जगत की रचना टिकी है। शब्द से ही आकाश बना, शब्द से धरती बनी, शब्द से पक्षी पहचान में आते हैं, शब्द से ही आप अपने बच्चों की बोली परखते हैं। तभी तो नानक जी ने फरमाया कि शब्द ही धरती, शब्द हि आकाशा शब्द ही भयउ प्रकाषा। सगली सृश्टि शब्द के पाछे, नानक शब्द घटाघट आछे।

उन्होंने की शब्द दो प्रकार का होता है एक वर्णात्मक और दूसरा ध्वनात्मक। वर्णात्मक शब्द से हम जगत का व्यवहार करते हैं लेकिन धुनात्मक शब्द जगत में जीव को लाने और ले जाने का आधार है। मृत्यु के समय यमदूत आकर इसी शब्द की डोरी को तोड़ देते हैं  हमारा शरीर निस्तेज होकर धड़ाम से गिर जाता है। डाक्टर, वैद्य, हकीम की कोई दवा काम नहीं करती है। लोग कहते हैं कि ये मर गये, इन्तकाल हो गया। अब क्या है, रोना, पीटना षुरु हो जायेगा और अपने-अपने रस्मो-रिवाज के साथ ले जाकर कब्रिस्तान में दफना देंगे या श्मशान घाट में लकड़ियों पर रखकर जला देंगे। 

आप का सारा खेल वहीं समाप्त हो जायेगा। आप सोचो! खाने-पीने, बच्चे बनाने और मर जाने के लिये ही यह मानव तन आपको नहीं मिला है बल्कि यह आपको प्रभु के भजन के लिये मिला है। यह जीव का वादा था कि ‘‘मो पर कृपा करहु एहि भांती, सब तजि भजन करउँ दिन राती।’’ महात्माओं ने देखा कि यह कलयुग है, मलिन युग है, आयु छोटी है, प्राण अन्न पर टिका है तो उन्होंने कलयुग में साधना को अति सरल कर दिया और कहा ‘‘कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिरि-सुमिरि नर उतरहिं पारा।’’ जीवों के कल्याण हेतु महाराज जी ने प्रभु प्राप्ति का सरल मार्ग नामदान देकर सुमिरन, ध्यान, भजन की तीनों क्रियाओं को विधिवत् समझाया।

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