गणराज्य अधूरा इसलिए नहीं है कि वह असफल रहा है, बल्कि इसलिए कि लोकतंत्र सदैव निर्माणाधीन प्रक्रिया है – प्रो.परमजीत जसवाल

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एचएनएलयू रायपुर में 79वें स्वतंत्रता दिवस का आयोजन अत्यंत उत्साह, गरिमा एवं देशभक्ति के वातावरण में किया गया
रायपुर,: हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू), रायपुर में 79वें स्वतंत्रता दिवस का आयोजन अत्यंत उत्साह, गरिमा एवं देशभक्ति के वातावरण में किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ कुलपति प्रो. वी.सी. विवेकानन्दन द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के साथ हुआ, जिसमें विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, संकाय सदस्यों एवं कर्मचारियों ने सहभागिता की। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक समिति के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण का केन्द्र रहा, जिसने स्वतंत्रता, विविधता और राष्ट्रीय एकता की भावना को सजीव रूप से अभिव्यक्त किया।

स्वतंत्रता दिवस समारोह का प्रमुख आकर्षण पंचम महात्मा गांधी स्मृति व्याख्यान था, जिसका विषय था “स्वतंत्रता के बाद की स्वतंत्रता: गांधी, संविधान और अधूरा गणराज्य”। यह व्याख्यान एचएनएलयू के विशिष्ट न्यायशास्त्री प्रोफेसर एवं पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) परमजीत जसवाल द्वारा दिया गया। यह स्मृति व्याख्यान स्वतंत्रता दिवस समारोह का अभिन्न अंग रहा और इसमें गांधीवादी चिंतन तथा संवैधानिक मूल्यों की समकालीन प्रासंगिकता पर गहन विमर्श प्रस्तुत किया गया।

व्याख्यान के प्रारम्भ में अपने उद्बोधन में कुलपति प्रो. वी.सी. विवेकानन्दन ने नई पीढ़ी, विशेषकर जेनरेशन-ज़ेड, के लिए महात्मा गांधी की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा—“जेनरेशन-ज़ेड के लिए गांधी की प्रासंगिकता उनकी नकल करने में नहीं, बल्कि उनके विचारों की व्याख्या करने में निहित है। चुनौती गांधी के तरीकों को यांत्रिक रूप से दोहराने की नहीं, बल्कि उन मूल्यों को समझने की है जिन्होंने उन्हें आकार दिया—नैतिक साहस, करुणा, आत्म-अनुशासन, सत्यनिष्ठा, समावेशिता और मानव गरिमा के प्रति सम्मान। ये मूल्य आज भी उतने ही आवश्यक हैं, चाहे कोई कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास कर रहा हो, सार्वजनिक नीति का निर्माण कर रहा हो, विधि व्यवसाय में हो, व्यापार कर रहा हो अथवा लोकतांत्रिक जीवन में भागीदारी कर रहा हो।”

उन्होंने आगे कहा— “गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि उनकी स्मृति का मात्र स्मरण करने में नहीं, बल्कि उन प्रश्नों का सामना करने में है जिन्हें वे हमारे लिए छोड़ गए हैं। स्वतंत्रता का संघर्ष भले समाप्त हो गया हो, किन्तु न्यायपूर्ण, करुणामय, सतत् और समावेशी समाज के निर्माण का संघर्ष आज भी जारी है।”

अपने स्मृति व्याख्यान में प्रो. (डॉ.) परमजीत जसवाल ने स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की अवधारणा पर विचार रखते हुए कहा कि “प्रत्येक पीढ़ी दो प्रकार की स्वतंत्रताओं की उत्तराधिकारी होती है—एक वह स्वतंत्रता जो पहले ही अर्जित की जा चुकी है और दूसरी वह स्वतंत्रता जिसे अभी प्राप्त किया जाना शेष है।” दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के साथ हुए नस्लीय भेदभाव के अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने “E + R = O” (घटना + प्रतिक्रिया = परिणाम) का सूत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि घटनाएँ सदैव हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, किन्तु उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया ही परिणामों को निर्धारित करती है। गांधीजी ने व्यक्तिगत अपमान और भेदभाव के अनुभव को सत्य और अहिंसा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के अवसर में रूपांतरित कर दिया। प्रो. जसवाल ने कहा कि किसी राष्ट्र की प्रगति का मूल्यांकन केवल आर्थिक विकास, भौतिक अवसंरचना अथवा समृद्धि के आधार पर नहीं किया जा सकता। किसी राष्ट्र की वास्तविक उन्नति उसके विधि के शासन, नागरिकों की गरिमा तथा समाज के समग्र सुख और कल्याण से भी निर्धारित होती है।

उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता को भारत की यात्रा का अंतिम लक्ष्य न मानते हुए उसे एक न्यायपूर्ण और करुणामय गणराज्य के निर्माण की दिशा में पहला चरण बताया। उन्होंने महात्मा गांधी के स्वराज, नैतिक शासन, श्रम की गरिमा, साम्प्रदायिक सद्भाव, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व तथा ‘मस्तिष्क, हृदय और हाथ’ के समन्वित विकास पर आधारित शिक्षा के दृष्टिकोण को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान गणराज्य की संस्थागत संरचना प्रदान करता है, जबकि गांधीवादी चिंतन उसके नैतिक पथप्रदर्शक के रूप में कार्य करता है। इसी संदर्भ में उन्होंने न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के साथ-साथ संवैधानिक नैतिकता, असहमति के अधिकार, संस्थागत अखंडता और मानव गरिमा के महत्व को रेखांकित किया।

समकालीन चुनौतियों पर विचार व्यक्त करते हुए प्रो. जसवाल ने असमानता, जातीय एवं लैंगिक भेदभाव, पर्यावरणीय संकट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भ्रामक सूचना, साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता तथा बढ़ते सामाजिक ध्रुवीकरण का उल्लेख किया। उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीकी प्रगति ने मानवता को अधिक परस्पर जुड़ा हुआ अवश्य बनाया है, किन्तु इससे मानवता स्वतः अधिक विवेकशील और नैतिक नहीं बन जाती। इस संदर्भ में उन्होंने कहा—

“तकनीकी प्रगति ने मानवता को अधिक जुड़ा हुआ बनाया है; किन्तु उसने मानवता को स्वतः अधिक बुद्धिमान नहीं बनाया है।”

अपने व्याख्यान के समापन में प्रो. जसवाल ने कहा—“गणराज्य अधूरा इसलिए नहीं है कि वह असफल रहा है, बल्कि इसलिए कि लोकतंत्र सदैव निर्माणाधीन प्रक्रिया है।” उन्होंने शिक्षकों, विद्यार्थियों और भावी नेतृत्व का आह्वान किया कि वे केवल एक सफल और शक्तिशाली भारत के निर्माण तक स्वयं को सीमित न रखें, बल्कि ऐसे भारत के निर्माण में योगदान दें जो न्यायपूर्ण, करुणामय, नैतिक रूप से प्रबुद्ध तथा स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के संतुलन पर आधारित हो।

इस अवसर पर एचएनएलयू जर्नल ऑफ लॉ एंड सोशल साइंसेज़ (JLSS) के वॉल्यूम XI, अंक I तथा “Navigating the Future: AI, Metaverse & IP Conundrum” नामक संपादित पुस्तक का भी लोकार्पण किया गया। उक्त पुस्तक का संपादन प्रो. वी.सी. विवेकानन्दन एवं डॉ. अंकित सिंह द्वारा किया गया है। ये प्रकाशन विधि, प्रौद्योगिकी एवं सार्वजनिक नीति के उभरते क्षेत्रों में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करते हैं। समारोह की संवैधानिक भावना को आगे बढ़ाते हुए प्रथम वर्ष के बी.ए. एलएल.बी. (ऑनर्स) एवं एलएल.एम. कार्यक्रमों के विद्यार्थियों को भारतीय संविधान की प्रतियाँ वितरित की गईं। यह पहल विद्यार्थियों में संवैधानिक साक्षरता एवं उत्तरदायी नागरिकता के मूल्यों को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कार्यक्रम में नवगठित स्टूडेंट बार काउंसिल (एसबीए) का शपथ ग्रहण समारोह भी आयोजित किया गया, जिसने छात्र नेतृत्व, लोकतांत्रिक सहभागिता और संस्थागत स्व-शासन के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया। इस अवसर पर श्री वेदांत राठी एवं सुश्री विमला चौधरी ने क्रमशः अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पद की शपथ ग्रहण की। उनके साथ विभिन्न निर्वाचित संयोजकों एवं उप-संयोजकों ने भी पद एवं गोपनीयता की शपथ ली।

इससे पूर्व प्रो. जसवाल एवं प्रो. विवेकानन्दन ने संकाय सदस्यों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के साथ मिलकर नवपरिकल्पित एवं पुनर्विकसित लर्नर्स लाउंज-I का उद्घाटन किया। साथ ही द हाइव एवं द हब के समूह चर्चा कक्षों तथा लर्नर्स लाउंज-II में विकसित द कॉन्क्लेव एवं कोलोक्वियम का भी उद्घाटन किया गया। ये आधुनिक शिक्षण एवं संवाद स्थल विद्यार्थियों में सहयोगात्मक अधिगम, बौद्धिक विमर्श और अकादमिक सहभागिता को प्रोत्साहित करेंगे। स्मृति व्याख्यान कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन डॉ. दीपक कुमार श्रीवास्तव, कुलसचिव (प्रभारी), एचएनएलयू द्वारा दिया गया। डॉ. वाई. पापा राव, एसोसिएट प्रोफेसर ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। डॉ. अविनाश सामल, अधिष्ठाता (छात्र कल्याण) ने स्टूडेंट बार काउंसिल के शपथ ग्रहण समारोह का समन्वयन किया। सम्पूर्ण कार्यक्रम का प्रभावी एवं गरिमापूर्ण संचालन सुश्री अनुष्का भारद्वाज, तृतीय वर्ष की छात्रा, द्वारा किया गया।

वर्ष 2022 में स्थापित महात्मा गांधी स्मृति व्याख्यान श्रृंखला महात्मा गांधी के विचारों एवं दर्शन के प्रचार-प्रसार तथा उनके समकालीन महत्व पर विमर्श हेतु विश्वविद्यालय की एक महत्वपूर्ण वार्षिक पहल है। समय के साथ यह व्याख्यान श्रृंखला नैतिक नेतृत्व, प्रबुद्ध शासन, संवैधानिक मूल्यों तथा लोकतांत्रिक समाज में नागरिकों की जिम्मेदारियों पर चिंतन का एक प्रतिष्ठित मंच बन चुकी है। यह विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं भावी नेतृत्व को समकालीन चुनौतियों के संदर्भ में गांधीवादी आदर्शों से सार्थक संवाद स्थापित करने के लिए निरंतर प्रेरित करती है।

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