परिमल नथवाणी
नई दिल्ली।भारत में जहां क्रिकेट सुर्खियों और जनमानस पर राज करता है, वहीं फुटबॉल ने उत्साह, निरंतर प्रयास और वैश्विक आकर्षण के दम पर धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई है। इंडियन सुपर लीग (आई.एस.एल.) जैसी प्रतियोगिताओं और ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (ए.आई.एफ.एफ.) के प्रयासों ने देश में इस खेल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके बावजूद गुजरात जैसे राज्यों में फुटबॉल को अभी भी अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल पाया है।
गुजरात उद्यमशीलता और वैश्विक सोच वाले लोगों की भूमि है। यह अपने उद्योगप्रधान स्वभाव, मजबूत आधारभूत संरचना और सशक्त खेल संस्कृति के लिए जाना जाता है। गुजरात स्टेट फुटबॉल एसोसिएशन (जी.एस.एफ.ए.), स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ गुजरात (एस.ए.जी.), कुछ फुटबॉल क्लबों और अकादमियों तथा कुछ उद्योगपतियों के प्रयासों के बावजूद राज्य में फुटबॉल अभी भी पीछे है। क्रिकेट की तरह फुटबॉल भी वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर का उद्योग है। इसलिए राज्य में फुटबॉल इकोसिस्टम को मजबूत बनाने की तत्काल आवश्यकता है। इससे स्पोर्ट्स मैनेजमेंट, स्पोर्ट्स मेडिसिन और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
ग्रासरूट स्तर पर फुटबॉल को व्यवस्थित रूप से विकसित करने की जरूरत है। गुजरात के स्कूल और कॉलेज अक्सर क्रिकेट को प्राथमिकता देते हैं, जिसके कारण फुटबॉल के लिए आधारभूत सुविधाओं और कोचिंग का अभाव रहता है। सुव्यवस्थित अंतर-विद्यालय लीग, प्रमाणित कोचिंग कार्यक्रम और आसानी से उपलब्ध मैदान फुटबॉल में भागीदारी को काफी बढ़ा सकते हैं। जी.एस.एफ.ए. ने इस दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन इनके विस्तार और निरंतरता की आवश्यकता है।
अहमदाबाद, सूरत और वडोदरा जैसे शहरी केंद्रों में मनोरंजनात्मक फुटबॉल संस्कृति में वृद्धि देखने को मिली है—टर्फ ग्राउंड्स, शौकिया लीग्स और वीकेंड टूर्नामेंट्स इसका उदाहरण हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन ग्रासरूट से पेशेवर स्तर तक स्पष्ट मार्ग न होने के कारण कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी पहचान से वंचित रह जाते हैं। गुजरात की राष्ट्रीय फुटबॉल सर्किट में मजबूत उपस्थिति नहीं है, जिससे युवा खिलाड़ियों को प्रेरणा और पहचान दोनों सीमित रूप में मिलती हैं।
फुटबॉल क्षेत्र में निवेश भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। कॉर्पोरेट प्रायोजन और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप परिवर्तनकारी साबित हो सकते हैं। जिस प्रकार गुजरात के उद्योगों ने औद्योगिक विकास को गति दी है, उसी प्रकार वे जी.एस.एफ.ए. के माध्यम से विभिन्न आयु वर्गों के पुरुष और महिला टूर्नामेंटों को प्रायोजित कर खेल के विकास में योगदान दे सकते हैं। इससे राज्य की टीमों और क्लबों को राष्ट्रीय स्तर की नियमित प्रतियोगिताओं में भाग लेने का अवसर मिलेगा और खिलाड़ियों के साथ-साथ प्रशंसकों को भी लाभ होगा।
इसी प्रकार, प्रशंसक संस्कृति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। फुटबॉल प्रशंसकों की ऊर्जा पर जीवंत रहता है। स्थानीय क्लबों को प्रोत्साहित करना, शहर आधारित लीग मैचों का आयोजन करना और प्रदर्शनी मैच आयोजित करना—इन सभी से मजबूत प्रशंसक वर्ग तैयार किया जा सकता है। अंग्रेजी प्रीमियर लीग जैसी वैश्विक लीगों के प्रसारण से युवाओं में रुचि बढ़ रही है। चुनौती यह है कि इन दर्शकों को सक्रिय भागीदारी में बदला जाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार का सहयोग और समर्थन प्रेरक शक्ति का कार्य कर सकता है। फुटबॉल मैदानों के लिए भूमि आवंटन, शिक्षा में खेलों का समावेश और स्पोर्ट्स स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने वाली नीतियां विकास को गति दे सकती हैं। फुटबॉल केवल एक खेल नहीं है; यह फिटनेस, अनुशासन, टीमवर्क और सामाजिक एकता का माध्यम भी है।
गुजरात के पास युवा शक्ति, संसाधन और महत्वाकांक्षा—सब कुछ मौजूद है। अब आवश्यकता है सही दिशा और मजबूत प्रतिबद्धता की। संस्थाओं, उद्योगों और समाज के संयुक्त प्रयासों से गुजरात में फुटबॉल को एक गौण गतिविधि से मुख्यधारा के खेल में बदला जा सकता है। अवसर सामने है, अब उसे साकार करने की आवश्यकता है।
