मड़ौली के मेहता आर्ट गैलरी में कोरस-2026 में “काशी” पुस्तक पर परिचर्चा
वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के निवर्तमान चेयरमैन एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो. नागेंद्र पांडेय ने कहा कि काशी वह अद्वितीय नगरी है, जहां मृत्यु भी अमरत्व का मार्ग बन जाती है। काशी विश्वनाथ की इस पावन भूमि पर जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है और मरण को भी मंगल माना जाता है। काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक ऐसी आध्यात्मिक सत्ता है, जो भौतिक धरातल से ऊपर उठकर आत्मिक चेतना का अनुभव कराती है। प्रो. पांडेय मड़ौली स्थित मेहता आर्ट गैलरी में आयोजित ‘कोरस-2026’ के तहत “काशी” पुस्तक पर परिचर्चा के दौरान बोल रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन वरिष्ठ चित्रकार अमित कुमार के संयोजन में किया गया। परिचर्चा में उन्होंने कहा कि काशी में आने वाला व्यक्ति भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि मुक्ति की तलाश में आता है। गंगा घाटों पर बनी कोठियां और आश्रम भी इसी उद्देश्य से निर्मित हैं, जहां लोग अपने जीवन के अंतिम समय में रहकर गंगा स्नान, बाबा विश्वनाथ के दर्शन-पूजन और साधना के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाला व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यही कारण है कि देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग अपने जीवन के अंतिम समय में काशी का रुख करते हैं।

डॉ. लेनिन रघुवंशी, जय मिश्रा और श्रुति नागवंशी द्वारा लिखित पुस्तक “काशी” का उल्लेख करते हुए प्रो. पांडेय ने कहा कि यह पुस्तक गहन साधना और अध्ययन का परिणाम है। इसमें काशी को व्यापक और उदार दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है, जो पाठकों को इस नगरी की आध्यात्मिक गहराई से परिचित कराती है। उन्होंने कहा कि अज्ञात को जानना ही वास्तविक साधना है और काशी इस साधना का सर्वोत्तम केंद्र है। काशी वास्तव में भोग की नहीं, बल्कि मुक्ति की नगरी है, जहां हर क्षण आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि यह शहर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि विभिन्न धर्मों और परंपराओं का अद्वितीय संगम भी है। यह एक ऐसा शहर है, जहां विभिन्न विचारधाराएं और आस्थाएं बिना टकराव के सह-अस्तित्व में रहती हैं। वर्तमान समय में वाराणसी में करीब 26 धर्मों के अस्तित्व के संकेत मिलते हैं, जिनके अनुयायियों की संख्या विश्व स्तर पर एक करोड़ से अधिक है।
काशी में सनातन धर्म की विभिन्न शाखाएं और परंपराएं मौजूद हैं। इस शहर की मिट्टी और पानी में कुछ ऐसा विशेष तत्व है, जो यहां आने वाले व्यक्ति को प्रभावित करता है। काशी का स्वभाव स्वतंत्रता और खुलापन है। यहां हर व्यक्ति बंधनों को सहजता से स्वीकार नहीं करता और अपनी विशिष्ट जीवन शैली को बनाए रखता है।
राजनीतिक संदर्भों से दूरी बनाते हुए अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि काशी किसी एक व्यक्ति या विचारधारा की नहीं, बल्कि सभी की है और अपनी मौलिकता के साथ सदैव बनी रहेगी। गंगा नदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसकी धारा भी पारंपरिक दिशा से हटकर बहती है, जो आत्मनिर्भरता और अलग सोच का प्रतीक है। उन्होंने उम्मीद जताई कि “काशी” पुस्तक की तरह आने वाले वर्षों में इस विषय पर और गहन अध्ययन सामने आएंगे।

काशी की सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक जटिलताओं को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अजय राय ने कहा कि बनारस को केवल एक शहर के रूप में देखना उसकी आत्मा को सीमित करना है। काशी एक जीवंत ‘विचार’ है, जिसे समय, समाज और परंपराओं के संदर्भ में समझना आवश्यक है। काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष 1957 से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस और समानतापूर्ण रही है, इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा। उन्होंने स्कंद पुराण का हवाला देते हुए कहा कि काशी में मोक्ष की अवधारणा भी सरल नहीं है। उनके अनुसार केवल काशी में मृत्यु हो जाना मोक्ष की गारंटी नहीं है, बल्कि जीवन की साधना और आचरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आज काशी में ‘मोक्ष’ की अवधारणा को सतही रूप में देखा जा रहा है और श्मशानों के सौंदर्यीकरण पर जोर दिया जा रहा है, जो काशी की मूल आध्यात्मिक भावना के अनुरूप नहीं है। काशी का वातावरण समय के साथ बदलता रहा है और इसे समझने के लिए गहराई से अध्ययन और निरंतर लेखन की आवश्यकता है। “काशी” पुस्तक के लेखकों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि बनारस की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने के लिए और अधिक शोध व विमर्श होना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार कुमार विजय ने कहा कि बनारस को केवल एक शहर के रूप में देखना उसकी आत्मा को सीमित करना है। काशी एक जीवंत ‘विचार’ है, जिसे समय, समाज और परंपराओं के संदर्भ में समझना आवश्यक है। काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने भी ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष 1957 से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश पर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस रही है, इतिहास की जटिलताओं की अनदेखी होगी। उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के संदर्भ में स्कंद पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि काशी में मोक्ष की अवधारणा सरल नहीं है। केवल यहां मृत्यु हो जाना पर्याप्त नहीं, बल्कि जीवन का आचरण और साधना भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान समय में मोक्ष की अवधारणा को सतही रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि इसके गहन अर्थ को समझने की आवश्यकता है।

इतिहासकार डॉ. मोहम्मद आरिफ ने काशी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बहुलता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह शहर हमेशा से विभिन्न धार्मिक धाराओं का केंद्र रहा है, जो इसे अन्य शहरों से अलग बनाता है। ग़ालिब ने भी काशी की सांस्कृतिक समृद्धि और बौद्धिक वातावरण की सराहना की थी। कबीर और तुलसीदास की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि काशी ने सदैव मानवीय मूल्यों और प्रेम की भावना को केंद्र में रखा। “काशी” पुस्तक भी इसी बहुलतावादी परंपरा की ओर संकेत करती है और शोधार्थियों को नए दृष्टिकोण से इस शहर को समझने का अवसर प्रदान करती है।
कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी ने किया, जबकि वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत ने आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर चित्रकार अमित कुमार की सार्थक पहल की सराहना की गई और उन्हें सम्मानित किया गया। परिचर्चा में ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष सी.बी. तिवारी ‘राजकुमार’, राहुल यादव, एक्टिविस्ट इदरीस अंसारी, पंकजपति पाठक, मंगला प्रसाद राजभर, डॉ. शम्मी कुमार सिंह, विकास दुबे, चंद्र मिश्र सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
