काव्य-संग्रह ‘विदा होती बेटियाँ’ रिश्तों और समाज का मार्मिक दस्तावेज – जिलाधिकारी

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जिलाधिकारी सोनभद्र ने की काव्य-संग्रह के रचनाकार डॉ. ओम प्रकाश के संवेदनशीलता की सराहना

सोनभद्र, । “विदा होती बेटियाँ” काव्य-संग्रह के रचनाकार डॉ. ओम प्रकाश द्वारा जिलाधिकारी, सोनभद्र  बद्री नाथ सिंह को उनके कार्यालय में यह कृति सादर भेंट की गई। इस अवसर पर जिलाधिकारी ने काव्य-संग्रह की विषयवस्तु, उसकी व्यापकता तथा उसमें निहित संवेदनशील अभिव्यक्तियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और इसे समकालीन समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक कृति बताया।

“विदा होती बेटियाँ” एक ऐसा काव्य-संग्रह है, जिसमें बेटियों के जीवन की मार्मिकता के साथ-साथ मानवीय रिश्तों की गहराई, परिवार की आत्मीयता और समाज की जटिलताओं का अत्यंत संवेदनशील चित्रण मिलता है। इस कृति में बेटियों की विदाई को केवल एक सामाजिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि घर-आँगन की धूप के विदा होने, सन्नाटे के उतर आने और भावनाओं के गहरे स्पंदन के रूप में देखा गया है। वहीं, बेटियों के पुनः आगमन को घर में खुशियों, प्रेम और जीवन की नई ऊर्जा के संचार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

काव्य-संग्रह की रचनाएँ यह भी बताती हैं कि जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी प्रेम, विश्वास और आशा को बनाए रखना ही मनुष्यता की सबसे बड़ी पहचान है। संवेदनाओं, स्मृतियों और आत्मबल के सहारे जीवन को अर्थपूर्ण बनाने का यह संदेश इस कृति को विशेष रूप से सार्थक बनाता है। इससे पूर्व इस चर्चित काव्य-संग्रह के तृतीय संस्करण का लोकार्पण डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र, अपर निजी सचिव, भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जा चुका है। साथ ही हरियाणा के एक विश्वविद्यालय में इस काव्य-संग्रह पर शोध कार्य प्रारंभ होना इसकी साहित्यिक और अकादमिक महत्ता को प्रमाणित करता है।

उल्लेखनीय है कि इस काव्य-संग्रह के प्रथम संस्करण का लोकार्पण अगस्त 2025 में अनिल कुमार जाडली, निदेशक (मानव संसाधन), एनटीपीसी लिमिटेड द्वारा किया गया था। इसके पश्चात् अल्प समय में ही तृतीय संस्करण का प्रकाशित होना इस कृति की लोकप्रियता और व्यापक स्वीकार्यता का प्रमाण है। देश के अनेक शिक्षाविदों, लोक प्रशासकों, साहित्यकारों, चिंतकों एवं विद्वानों द्वारा इस काव्य-संग्रह की सराहना की जा चुकी है। “विदा होती बेटियाँ” अपने संवेदनशील कथ्य, सहज भाषा और गहन भावबोध के माध्यम से पाठकों के हृदय में एक विशेष स्थान बना रही है तथा समकालीन हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण कृति के रूप में प्रतिष्ठित हो रही है।

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