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  • उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने मुख्यमंत्री का प्रतिनिधित्व करते हुए किया क्रोएशिया प्रधानमंत्री का स्वागत

    उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने मुख्यमंत्री का प्रतिनिधित्व करते हुए किया क्रोएशिया प्रधानमंत्री का स्वागत

    उच्च शिक्षा मंत्री ताजमहल व आगरा किला भ्रमण में क्रोएशिया प्रधानमंत्री के साथ रहें 

    मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने क्रोएशिया प्रधानमंत्री को  प्रदेश की विरासत और पर्यटन क्षमता से कराया परिचय

    आगरा/लखनऊ, / प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने क्रोएशिया गणराज्य के प्रधानमंत्री एंड्रेज प्लेनकोविक के आगरा आगमन पर उनका स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कर उत्तर प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया।

    प्रधानमंत्री क्रोएशिया के आगमन पर  उच्च शिक्षा मंत्री ने मुख्य सचिव एस.पी. गोयल के साथ पुष्पगुच्छ भेंट कर औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ विश्व प्रसिद्ध स्मारक ताजमहल का भ्रमण किया और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, स्थापत्य कला तथा वैश्विक महत्व पर विस्तार से जानकारी दी।

    निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उच्च शिक्षा मंत्री,  प्रधानमंत्री क्रोएशिया के साथ आगरा किला भी पहुंचे। यहां उन्होंने उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहर, पर्यटन संभावनाओं और सांस्कृतिक विविधता पर चर्चा करते हुए प्रदेश में बढ़ते वैश्विक आकर्षण को रेखांकित किया। मंत्री उपाध्याय ने आगरा और उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान, विरासत संरक्षण और पर्यटन विकास की योजनाओं की भी जानकारी दी। भ्रमण कार्यक्रम के उपरांत उच्च शिक्षा मंत्री ने प्रदेश सरकार की ओर से प्रधानमंत्री क्रोएशिया को औपचारिक विदाई दी गई।

  • ब्रज क्षेत्र को वैश्विक पहचान दिलाएगा आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम – मंत्री जयवीर सिंह

    ब्रज क्षेत्र को वैश्विक पहचान दिलाएगा आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम – मंत्री जयवीर सिंह

    उत्तर भारत का आधुनिक आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम 80 फीसदी तैयार, इमर्सिव लर्निंग और इंटरैक्टिव डिस्प्ले होंगे मुख्य आकर्षण, ब्रज क्षेत्र को मिलेगी विशिष्ट पहचान, आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम ‘वेदों की ओर लौटो’ का देगा संदेश*

    *ईश्वर, वेद और सच का संदेश देगा आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम, सेवा और समानता की राह दिखाएंगे पाँच पिलर*

    लखनऊ,आगरा/ उत्तर भारत का आधुनिक आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम अब लगभग तैयार है। नई तकनीक से सुसज्जित यह संग्रहालय अतीत की गौरवगाथा को नए और आकर्षक अंदाज़ में पेश करेगा, जहां इतिहास केवल पढ़ा नहीं जाएगा, बल्कि महसूस किया जाएगा। ब्रज क्षेत्र की यह महत्वाकांक्षी परियोजना न सिर्फ पर्यटन को नई राष्ट्रीय पहचान देगी, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का एक मजबूत माध्यम भी बनेगी। फिरोजाबाद जिले के सिरसागंज में 24.45 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा उत्तर प्रदेश का पहला आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम तेजी से तैयार हो रहा है, जिसका लगभग 80 फीसदी से अधिक कार्य पूरा किया जा चुका है। इसको लेकर पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने समीक्षा बैठक के दौरान जल्द से जल्द कार्य संपन्न करने के निर्देश दिए।

    *विज़ुअल स्टोरीटेलिंग में सजेगा आर्य इतिहास*

    इसकी विशेषता पर जानकारी देते हुए मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि, इस म्यूजियम में इतिहास को इमर्सिव लर्निंग, विज़ुअल स्टोरीटेलिंग और इंटरैक्टिव डिस्प्ले के जरिए दिखाया जाएगा, ताकि हर उम्र का व्यक्ति इसे आसानी से समझ सके। यहां स्थापना और शुरुआती दौर, संस्थापक और स्थानीय नेताओं का योगदान, आजादी की लड़ाई में भूमिका, सिद्धांत और विचारधारा, योग की अहमियत और आज के समय में इसकी जरूरत जैसे जोन बनाए गए हैं। कुल मिलाकर, आर्य गुरुकुल म्यूजियम सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और उनसे प्रेरणा लेने का एक बेहतरीन माध्यम है। म्यूजियम में ऑडिटोरियम, मल्टीपर्पज हॉल, एम्फीथिएटर, हेलीपैड, फायर फाइटिंग सिस्टम और कई ब्लॉकों का ढांचा तैयार हो गया है और अधिकतर जगहों पर फिनिशिंग का काम चल रहा है। बाहरी इलेक्ट्रिफिकेशन, ट्यूबवेल, अंडरग्राउंड सम्प और कुछ अन्य कार्य प्रगति पर हैं, जबकि सीसी रोड, हॉर्टिकल्चर, तालाब विकास, फ्लोटिंग मल्टीमीडिया और CCTV जैसे कुछ काम अभी शुरू होने बाकी हैं। कुल मिलाकर परियोजना तेजी से आगे बढ़ रही है और तय समय में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

    *सत्य, धर्म और सेवा का संदेश देता संग्रहालय*

    इसके अलावा इस म्यूजियम में पाँच पिलरों की सीख भी होगी। जिसमें पहला, ईश्वर ही सच्चे ज्ञान का असली स्रोत है-वह निराकार, अनंत और पूरी सृष्टि का रचयिता है। दूसरा, वेद हमें सही सोच और सही जीवन जीने का मार्ग दिखाते हैं, इसलिए उन्हें समझना और उनके अनुसार चलना हमारी जिम्मेदारी है। तीसरा, हमें हर हाल में सच का साथ देना चाहिए और गलत बातों से दूर रहना चाहिए, ताकि हमारा हर कदम धर्म और ईमानदारी पर टिका हो। चौथा, हमारा उद्देश्य केवल अपनी तरक्की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक उन्नति करना है। और पाँचवां, हमें सभी लोगों के साथ प्रेम, सम्मान और न्याय से व्यवहार करना चाहिए एवं दूसरों की प्रगति में ही अपनी सफलता देखनी चाहिए। 

    पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने हाल ही में हुई एक बैठक में इसे जल्द पूरा करने का निर्देश दिए। उन्होंने बताया कि आर्य गुरुकुल म्यूजियम हमारे अतीत की विरासत और भविष्य की संभावनाओं के बीच एक सशक्त माध्यम है। अब सिर्फ आगरा का ताजमहल ही नहीं बल्कि आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम भी वैश्विक स्तर पर नई पहचान कायम करेगा। ब्रज क्षेत्र का यह म्यूज़ियम केवल इतिहास को संजोने का प्रयास नहीं, बल्कि उस चेतना को फिर से जागृत करने का संकल्प है जिसने समाज को ज्ञान, समानता और राष्ट्रभाव की दिशा दी। आधुनिक तकनीक और नवाचार के माध्यम से हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को नई पीढ़ी के दिल और दिमाग से जोड़ रहे हैं, ताकि वे केवल इतिहास को जानें ही नहीं, बल्कि उसे महसूस करें, समझें और उससे प्रेरणा लेकर एक सशक्त भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं।

    हाल ही में पर्यटन मंत्री ने प्रमुख और महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को लेकर अहम समीक्षा बैठक की थी, जिसमें फिरोजाबाद में बन रहे ग्लास म्यूजियम फिरोजाबाद, मैनपुरी के कल्चरल सेंटर, आर्य गुरुकुल म्यूजियम तथा सामौर बाबा मंदिर कॉम्प्लेक्स की प्रगति और विकास योजनाओं का विस्तार से अवलोकन किया गया था। आर्य गुरुकुल म्यूज़ियम सिर्फ एक भवन नहीं है, बल्कि एक ऐसे आंदोलन की कहानी बताएगा, जिसने भारत में सोच, समाज और देशभक्ति को नई दिशा दी। आर्य समाज ने “वेदों की ओर लौटो” का संदेश देकर लोगों को जागरूक किया और सामाजिक बराबरी, शिक्षा और तर्क की सोच को मजबूत बनाया। यह म्यूज़ियम आज की पीढ़ी के लिए एक एजुकेशनल हब की तरह काम करेगा, जहां लोग अपने इतिहास और संस्कारों को आसान और दिलचस्प तरीके से समझ सकते हैं।

  • राष्ट्रीय मतदाता दिवस : लोकतंत्र की शक्ति और मताधिकार का महत्व

    राष्ट्रीय मतदाता दिवस : लोकतंत्र की शक्ति और मताधिकार का महत्व

    (‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’, 25 जनवरी 2026 पर विशेष आलेख)

    भारत में राष्ट्रीय मतदाता दिवस प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को मनाया जाता है। यह दिवस देश के हर नागरिक के लिए अत्यंत अहम है। यह दिन देशवासियों के लिये केवल एक औपचारिक दिन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को स्मरण करने का अवसर है। इस दिन देश के प्रत्येक नागरिक को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह राष्ट्र के प्रत्येक चुनाव में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करेगा, क्योंकि हर एक वोट देश के भविष्य की नींव रखता है। कहा जाये तो वास्तव में, प्रत्येक मतदाता का मत ही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में उसकी सक्रिय सहभागिता का प्रतीक है। भारत में होने वाले सभी चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और व्यवस्थित रूप से संपन्न कराने की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग की होती है। इस संवैधानिक संस्था का गठन 25 जनवरी 1950 को किया गया था, जो कि भारतीय संविधान लागू होने से एक दिन पूर्व था। चूँकि 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र के रूप में स्थापित होने जा रहा था, इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने और चुनावी प्रक्रियाओं को सुचारु रूप से संचालित करने हेतु निर्वाचन आयोग का गठन अनिवार्य था। राष्ट्रीय मतदाता दिवस हमें हमारे मताधिकार के महत्व, लोकतांत्रिक मूल्यों की गरिमा और राष्ट्र के प्रति हमारे दायित्वों का स्मरण कराता है।

    ‘भारत सरकार’ ने वर्ष 2011 से हर चुनाव में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए निर्वाचन आयोग के स्थापना दिवस ‘25 जनवरी’ को ही ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की थी। और 2011 से ही हर साल 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। इस दिन देश में सरकारों और अनेक सामजिक संथाओं द्वारा लोगों को मतदान के प्रति जागरूक करने के लिए अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। जिससे कि देश की राजनैतिक प्रक्रियाओं में लोगों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित की जा सके।    

    राष्ट्रीय मतदाता दिवस का हर वर्ष आयोजन सभी भारत के नागरिकों को अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्य की याद दिलाता है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस का आयोजन लोगों को यह भी बताता है कि हर व्यक्ति के लिए मतदान करना जरूरी है। भारत के प्रत्येक नागरिक का मतदान प्रक्रिया में भागीदारी जरूरी है। क्योंकि आम आदमी का एक वोट ही सरकारें बदल देता है। हम सबका एक वोट ही पल भर में एक अच्छा प्रतिनिधि भी चुन सकता है और एक निकम्मा प्रतिनिधि भी चुन सकता है।  इसलिए भारत के प्रत्येक नागरिक को अपने मत का प्रयोग सोच समझकर करना चाहिए और ऐसी सरकारें या प्रतिनिधि चुनने के लिए करना चाहिए जो कि देश को विकास और तरक्की के पथ पर आगे ले जा सके। भारत देश की 65 प्रतिशत आबादी युवाओं की है, इसलिए देश के प्रत्येक चुनाव में युवाओं को ज्यादा से ज्यादा भागीदारी करनी चाहिए और ऐसी सरकारें चुननी चाहिए जो कि साप्रदायिकता और जातिवाद से ऊपर उठकर देश के विकास के बारे में सोचें। जिस दिन देश का युवा जाग जाएगा उस दिन देश से जातिवाद, ऊँच-नीच, साम्प्रदायिक भेदभाव खत्म हो जाएगा। यह सिर्फ और सिर्फ हो सकता है हम सबके मतदान करने से। 25 जनवरी को भारत के प्रत्येक नागरिक को लोकतंत्र में विशवास रखते हुए शपथ लेनी चाहिए कि वे देश की स्वतंत्रत, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने की लोकतांत्रिक परम्परा को बरकरार रखेंगे। और प्रत्येक चुनाव में धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय, भाषा आधार पर प्रभावित हुए बिना निर्भीक होकर मतदान करेंगे। ऐसी शपथें हर वर्ष 25 जनवरी को लाखों लोग लेते हैं, लेकिन फिर भी इस शपथ पर अमल बहुत कम होता है। क्योंकि आज भी लोग साम्प्रदायिक, जातिवाद, और  भाषायी आधार पर वोट देते हैं। इससे अनेक अपराधी प्रवृत्ति के लोग देश की संसद और विधानसभाओं में प्रतिनिधि चुनकर चले जाते हैं। इसलिए भारत के प्रत्येक नागरिक को साम्प्रदायिक और जातीय आधार से ऊपर उठकर एक साफ-सुथरी छवि के व्यक्ति के लिए अपने मत का प्रयोग करना चाहिए। 

    राष्ट्रीय मतदाता दिवस का उद्देश्य लोगों की मतदान में अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ मतदाताओं को एक अच्छा साफ-सुथरी छवि का प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान के लिए जागरूक करना है। हमारे लोकतंत्र को विश्व में इतना मजबूत बनाने के लिए मतदाताओं के साथ-साथ भारत देश के निर्वाचन आयोग का भी अहम् योगदान है। हमारे निर्वाचन आयोग की वजह से ही देश में निष्पक्ष चुनाव हो पाते हैं। आज राष्ट्रीय मतदाता दिवस के दिन देश के प्रत्येक मतदाता को अपनी सक्रिय भागीदारी के माध्यम से लोकतंत्र को मजबूत करने का संकल्प लेना चाहिए। 

     लेखक- डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत (Brahmanand Rajput)

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  • कल्याण सिंह: हिमालय-सा विराट व्यक्तित्व, रामभक्त नेता

    कल्याण सिंह: हिमालय-सा विराट व्यक्तित्व, रामभक्त नेता

    (कल्याण सिंह जी की 94वीं जन्म-जयंती 05 जनवरी 2026 पर विशेष आलेख)

    भारतीय राजनीति के युगपुरुष, श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, कोमलहृदय संवेदनशील मनुष्य, वज्रबाहु राष्ट्रप्रहरी, भारतमाता के सच्चे सपूत तथा भारतीय राजनीति में भगवान श्रीरामचन्द्र जी के हनुमान कहे जाने वाले हिन्दू हृदय सम्राट कल्याण सिंह उन विरल नेताओं में थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति में अनेक ऐतिहासिक मिसालें प्रस्तुत कीं। उनका राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन सदैव निष्कलंक, सिद्धांतनिष्ठ और प्रेरणास्पद रहा। कुशल प्रशासन, दृढ़ निर्णय क्षमता और जनहित के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता की मिसालें तब तक दी जाती रहेंगी, जब तक यह संसार रहेगा। कल्याण सिंह ने राजनीति को सत्ता नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना और जमीन से जुड़कर ‘जनता के नेता’ के रूप में जन-जन के हृदय में अपनी अमिट छवि स्थापित की। वे बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों—सभी वर्गों में समान रूप से लोकप्रिय थे। देश का प्रत्येक हिन्दू युवा और बालक उन्हें अपना आदर्श मानता था। उनका व्यक्तित्व हिमालय के समान विराट, अडिग और तेजस्वी था। भारतीय राजनीति में वे स्नेह और सम्मान के साथ ‘बाबूजी’ के नाम से विख्यात रहे। उनका संपूर्ण जीवन सादगी, राष्ट्रभक्ति और मूल्यों की राजनीति का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और हर परिस्थिति में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। भारतीय राजनीति और समाज के लिए उनका योगदान युगों-युगों तक प्रेरणास्रोत बना रहेगा। हिन्दू हृदय सम्राट कल्याण सिंह का नाम इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में सदैव अमर रहेगा।

    उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी सन् 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ जनपद की अतरौली तहसील के मढ़ौली ग्राम के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ। कल्याण सिंह के पिता का नाम तेजपाल सिंह लोधी और माता का नाम सीता देवी था। कल्याण सिंह में बचपन से ही नेतृत्व करने की क्षमता थी। कल्याण सिंह बचपन में ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ गए थे और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की शाखाओं में भाग लेने लगे थे। कल्याण सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में कड़ी मेहनत कर अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद कल्याण सिंह ने अध्यापक की नौकरी की। और साथ-साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ कर राजनीति के गुण भी सीखते रहे। कल्याण सिंह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में रहकर गांव-गांव जाकर लोगों में जागरुकता पैदा करते रहे। कल्याण सिंह का विवाह रामवती देवी से हुआ। कल्याण सिंह के दो सन्तान है। एक पुत्र और एक पुत्री, पुत्र का नाम राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया है और पुत्री का नाम प्रभा वर्मा है। कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया वर्तमान में उत्तर प्रदेश की एटा लोकसभा सीट से संसद सदस्य हैं। कल्याण सिंह ने अपना पहला विधानसभा चुनाव अतरौली से जीतकर 1967 में उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे। कल्याण सिंह 1967 से लगातार 1980 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। इस बीच देश में आपातकाल के समय कल्याण सिंह 1975-76 में 21 महीने जेल में रहे। इस बीच कल्याण सिंह को अलीगढ और बनारस की जेलों में रखा गया। आपातकाल समाप्त होने के बाद 1977 में रामनरेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। जिसमें कल्याण सिंह को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। सन् 1980 के उत्तर प्रदेश के चुनावों में कल्याण सिंह विधानसभा का चुनाव हार गये। भाजपा के गठन के बाद कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश का संगठन महामंत्री बनाया गया। इस बीच कल्याण सिंह ने गाँव-गाँव, घर-घर जाकर भाजपा को उत्तर प्रदेश में पहचान दिलाने में अहम् भूमिका निभाई। कल्याण सिंह 1985 से लेकर 2004 तक लगातार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। इस बीच कल्याण सिंह दो बार भाजपा के उत्तर पदेश से प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस बीच  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में उत्तर पदेश में राम मंदिर आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन में कल्याण सिंह ने भी अहम् भूमिका निभाई। राम मंदिर आंदोलन की वजह से उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में भाजपा का उभार हुआ। और जून 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सरकार बनायी। जिसमे कल्याण सिंह की अहम भूमिका रही। और कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते कारसेवकों द्वारा अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद वहाँ श्री राम का एक अस्थायी मन्दिर निर्मित कर दिया गया। कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुये 6 दिसम्बर 1992 को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। यहीं से भाजपा को कल्याण सिंह के रूप में हिंदुत्ववादी चेहरा मिल गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में अनेक आयाम छुए। 1993 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में कल्याण सिंह अलीगढ के अतरौली और एटा के कासगंज से विधायक निर्वाचित हुये। इन चुनावों में भाजपा कल्याण सिंह के नेतृत्व में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। लेकिन सपा-बसपा ने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार बनायी। और उत्तर प्रदेश विधान सभा में कल्याण सिंह विपक्ष के नेता बने। इसके बाद कल्याण सिंह 1997 से 1999 तक पुनः दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री काल में कानून व्यवस्था एक दम मजबूत थी। इसलिए आज तक उत्तर प्रदेश में लोग कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री काल की मिसाल देते हैं। 1998 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में 58 सीटें जीती।  1999 में भाजपा से मतभेद के कारण कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़ दी। कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का गठन किया। 2002 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अपने दम पर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से लड़ा और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के चार विधायक चुने गए और कल्याण सिंह ने बड़े स्तर पर पूरे प्रदेश में भाजपा को नुकसान पहुँचाया। इसके बाद उत्तर प्रदेश की जमीन पर भाजपा कई वर्षो तक कल्याण सिंह की उथल पुथल का और भाजपा के नकारा नेताओं की साजिश का शिकार बनी रही। लेकिन इसका फायदा न कल्याण सिंह को मिल पाया न भगवा पार्टी को।  भाजपा और कल्याण सिंह दोनों उत्तर प्रदेश  की राजनीति में हांशिये पर चले गए। 2004 में कल्याण सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के आमंत्रण पर भाजपा में वापसी तो कर ली लेकिन, उनको वो पॉवर नहीं मिली जो मंदिर आन्दोलन के समय उनके पास थी। 2004 के आम चुनावों में उन्होंने बुलन्दशहर से भाजपा के उम्मीदवार के रूप में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा। और कल्याण सिंह पहली बार बुलंदशहर लोकसभा सीट से संसद पहुंचे। 2007 का उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में लड़ा। कहने को भाजपा ने 2007 में कल्याण सिंह को भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तो बना दिया लेकिन नाम का, जिसके पास ना तो उमीदवार तय करने की पॉवर थी और ना ही उनके अंडर में उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रबंधन था। इसलिए वो चुनाव में कुछ अच्छा नहीं कर सके। इसके बाद 2009 में पुनः अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए मतभेदों के कारण भाजपा का दामन छोड कर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से नजदीकियां बढा लीं। 2009 के लोकसभा चुनावों में एटा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय सांसद चुने गये। फिर 2009 लोकसभा चुनाव खत्म होते ही मुलायम ने कल्याण से नाता तोड लिया। क्योंकि कल्याण सिंह की बजह से मुस्लिम समुदाय के लोग उनसे नाता तोड चुके थे। इसके बाद कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय जनक्रान्ति पार्टी का गठन किया जो कि 2012 के विधानसभा चुनाव में कुछ विशेष नहीं कर सकी। लेकिन मुलायम के परम्परागत वोट उनके पास वापस आ गए। इसके बाद 2013 में कल्याण सिंह की भाजपा में पुनः वापसी हुई और कल्याण सिंह का परंपरागत लोधी-राजपूत वोट भी भाजपा से जुड़ गया। और 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के कहने पर कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा का खूब प्रचार किया। भाजपा ने अकेले अपने दम पर 80 लोकसभा सीटों से 71 लोकसभा सीटें जीतीं। और नरेंद्र मोदी देश के यशस्वी प्रधानमंत्री बनें। इसके बाद किसी समय देश के भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले कल्याण सिंह को राष्ट्रपति ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर सितंबर 2014 में राजस्थान का राज्यपाल बनाया। इसके बाद कल्याण सिंह को जनवरी 2015 से अगस्त 2015 तक हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया। लेकिन राजस्थान का राज्यपाल रहते हुए भी कल्याण सिंह का दखल उत्तर प्रदेश की राजनीति में रहा। कल्याण सिंह ने राजस्थान के राज्यपाल के रूप में अपना 05 साल का कार्यकाल पूरा किया और 08 सितम्बर 2019 तक कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल रहे। इसके बाद कल्याण सिंह ने 09 सितम्बर 2019 को लखनऊ में भाजपा की पुनः सदस्यता ली और फिर से भाजपाई हो गए। 

    उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में भी कल्याण सिंह का अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावी दखल रहा। 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के अधिकतर प्रत्याशी कल्याण सिंह का जयपुर राजभवन में आशीर्वाद लेने जाते रहे। इसी से पता चलता है कि कल्याण सिंह जनमानस में कितने लोकप्रिय रहे है। लोग कल्याण सिंह सरकार की आज भी मिसालें देते हैं। क्योंकि कल्याण सिंह जब उत्तर प्रदेश के सीएम थे तब राज्य में काफी सुधार और विकास की चीजें हुई थीं। जिससे उनकी लोकप्रियता पिछड़ों सहित सर्वणों में भी है। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अपने भाषणों में कल्याण सरकार के कुशल प्रशासन की मिसाल देते हैं। कल्याण सिंह अपने समय पर उत्तर प्रदेश के हिंदुत्ववादी सर्वमान्य नेता थे। उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीति, कुशल प्रशासन और हिंदुत्ववादी छवि के लिए जाने वाले श्रीराम के भक्त कल्याण सिंह ने (21 अगस्त 2021) को 89 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। 

    श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के अग्रणी योद्धा, धर्म और राष्ट्र के लिए सत्ता का त्याग करने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल, श्रद्धेय श्री कल्याण सिंह जी की आज 94वीं जन्म-जयंती है। उनका जीवन भारतीय राजनीति में त्याग, साहस और सिद्धांतनिष्ठा का अनुपम उदाहरण है। जब-जब धर्म, आस्था और कर्तव्य के लिए किए गए त्याग की चर्चा होगी, तब-तब श्री कल्याण सिंह जी का नाम विशेष सम्मान और गौरव के साथ स्मरण किया जाएगा। अयोध्या में आज भव्य और दिव्य रामलला के मंदिर की जो ऐतिहासिक परिकल्पना साकार हुई है, उसमें स्वर्गीय श्री कल्याण सिंह जी का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने अपने पद, सत्ता और राजनीतिक भविष्य की परवाह किए बिना धर्म और जनभावनाओं की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनका दृढ़ संकल्प, अडिग नेतृत्व और राष्ट्रहित के प्रति निष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। श्रद्धेय बाबूजी का जीवन और कृतित्व भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव अंकित रहेगा।

    लेखक- डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत

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  • नया वर्षः आत्ममंथन, संकल्प और मोदी सरकार की अग्नि-परीक्षा

    नया वर्षः आत्ममंथन, संकल्प और मोदी सरकार की अग्नि-परीक्षा

    (नववर्ष 2026 पर विशेष आलेख)

    नया साल एक नए सवेरे की तरह  है, जो हर वर्ष एक बार आता है और अपने साथ नई शुरुआत की संभावनाएँ लेकर आता है। समय के साथ वह अपने चरम पर पहुँचता है और फिर धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। यही क्रम एक निरंतर अनुभव है, जिसे इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है। यह निरंतरता ही प्रकृति और जीवन का परम सत्य है। नए वर्ष की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति को पिछले साल के निरंतर प्रवाह और अनुभवों से सीख लेकर अच्छे कार्यों से करनी चाहिए। यह समय आत्मचिंतन का होता है, जब हमें अपने अच्छे-बुरे कार्यों का मूल्यांकन कर आगे बढ़ने का संकल्प लेना चाहिए। नए साल की शुरुआत सद्कर्मों, सकारात्मक सोच और स्पष्ट दिशा के साथ करना ही जीवन को सार्थक बनाता है। नया वर्ष हर व्यक्ति के लिये बीते हुए वर्ष की सफलताओं और उपलब्धियों के साथ.साथ कमियों और गलतियों का मूल्यांकन करने का समय है। यह हमें अपने आप को भावी वर्ष के लिये योजना बनाने, कार्य करने तथा आगामी वर्ष के लिये नये लक्ष्य तय करने का अवसर प्रदान करता है। नये साल की शुरुआत में हर व्यक्ति को भावी वर्ष के लिये नये लक्ष्य बनाने चाहिए और उन्हें पूरा करने की रणनीति बनानी चाहिए। जिससे कि अवसरों को सफलता में बदला जा सके। यदि व्यक्ति अपने जीवन के आरंभ में ही अपने लक्ष्य निर्धारित कर लेता है, तो सफलता की दिशा स्वतः स्पष्ट हो जाती है। लक्ष्य हमें अनुशासन, परिश्रम और निरंतर प्रयास की प्रेरणा देते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को नए वर्ष की शुरुआत में वर्ष भर के लिए कुछ स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए, ताकि आने वाले समय में वह अपने लक्ष्य के लिए किए गए सत्कर्मों और प्रयासों के माध्यम से निरंतर विकास करता हुआ अपने जीवन के चरम और शिखर तक पहुँच सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बीते वर्षों में अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, साथ-साथ अनेक सफलताएँ भी पायी हैं। इन सफलताओं और उपलब्धियों में मोदी सरकार को अपनी गलतियों और कमियों पर पर्दा नहीं डालना चाहिए। बल्कि अपनी गलतियों और कमियों का मूल्यांकन करके भावी वर्ष के लिये रणनीति बनानी चाहिए। जिससे कि गलतियों और कमियों को सुधारकर अवसरों में बदला जा सके।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते वर्षों में जिस प्रकार से अनेक चुनौतियों का सामना किया, उसी प्रकार भावी वर्ष में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। कहा जाए तो साल 2026 में नरेंद्र मोदी को अनेक अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पड़ेगा और आने वाला वर्ष राजनीतिक दृष्टि से भी भाजपा व पीएम मोदी के लिये बेहद अहम है। 2026 में देश के 4 राज्यों- असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल तथा 1 केंद्र शासित प्रदेश- पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में भाजपा के सामने केवल प्रचार का ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदारी की भी चुनौती होगी। इसी क्रम में (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया चुनावी तैयारियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नए वर्ष में मतदाता सूचियों को त्रुटिरहित, पारदर्शी और अद्यतन बनाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है। विशेष गहन पुनरीक्षण के माध्यम से फर्जी, दोहरे या मृत मतदाताओं के नाम हटाकर वास्तविक और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद को मजबूत करता है। इन पाँच चुनावी क्षेत्रों में भाजपा की स्थिति अलग-अलग है। असम में पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार है, जबकि पुडुचेरी में गठबंधन सरकार सत्तारूढ़ है। इन दोनों स्थानों पर सत्ता को बनाए रखना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। वहीं केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं जहाँ भाजपा अपने संगठन का विस्तार कर राजनीतिक बढ़त बनाने की कोशिश कर रही है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल भाजपा की रणनीति का प्रमुख केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। यहाँ राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निष्पक्ष मतदान और जागरूक मतदाता पर जोर देना पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।

    असम और पश्चिम बंगाल में लंबे समय से यह चिंता व्यक्त की जाती रही है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए कथित रूप से मतदाता सूची में शामिल होकर वर्षों से मतदान करते आ रहे हैं। यदि ऐसा है, तो यह न केवल भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुचिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि स्थानीय नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के लिए भी गंभीर चुनौती उत्पन्न करता है। इन्हीं आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया आरंभ की गई है, जिसके तहत मतदाता सूचियों की गहराई से जांच की जा रही है। सरकार का तर्क है कि यह प्रक्रिया विशेष रूप से असम और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों में आवश्यक है, जहाँ अवैध घुसपैठ की समस्या को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। यह भी आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कुछ घुसपैठियों ने आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज बनवा लिए हैं, जिसके कारण वे चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन गए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ऐसे मतदाताओं का लाभ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को मिलता है, जबकि असम में इसका प्रभाव विपक्षी दलों की स्थिति को मजबूत करने के रूप में देखा जाता है। सरकार का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य किसी समुदाय या राज्य को निशाना बनाना नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है, ताकि केवल पात्र और वैध नागरिक ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग ले सकें। निष्पक्ष, पारदर्शी और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही लोकतंत्र की विश्वसनीयता को बनाए रखा जा सकता है। जहाँ तक दो दक्षिणी राज्यों-केरल और तमिलनाडु का प्रश्न है, तो भारतीय जनता पार्टी के लिए यहाँ खोने के लिए कुछ भी नहीं, बल्कि केवल पाने के अवसर ही हैं। यदि भाजपा इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करती है, भले ही वह सरकार बनाने की स्थिति में न पहुँचे, तब भी यह पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से लाभकारी सिद्ध होगा। ऐसा प्रदर्शन न केवल संगठनात्मक मजबूती को दर्शाएगा, बल्कि भविष्य में अपनी राजनीतिक संभावनाओं को विस्तार देने की ठोस आधारशिला भी तैयार करेगा। स्पष्ट है कि यदि मोदी सरकार अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन और प्रभावी संप्रेषण पर ध्यान केंद्रित करती है, तो आगामी चुनावों में भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है। इन सभी राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की सफलता और असफलता सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख को प्रभावित करेगी।

    मोदी सरकार ने बीते वर्षों में अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी रूप से संचालित किया है, जिनका सीधा लाभ आम जनमानस तक पहुँचा है। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन, मुफ्त राशन योजना, स्वच्छ भारत अभियान और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं ने समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकार की पहुँच को मजबूत किया है। वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा अनेक नई पहलें की गई हैं तथा कई महत्वपूर्ण योजनाओं को आरंभ और विस्तार दिया गया है। इन पहलों का उद्देश्य देश के समग्र विकास को गति देना और अंतिम पंक्ति में खड़े नागरिक तक विकास की पहुँच सुनिश्चित करना है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार इन योजनाओं को केवल घोषणा तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से उनकी तार्किक परिणति तक पहुँचाए और ठोस, सकारात्मक परिणाम सामने लाए। वर्ष 2025 में मोदी सरकार ने 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को केंद्र में रखते हुए बीते वर्षों में लागू हुयी योजनाओं-प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना, जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, पीएम विश्वकर्मा योजना तथा हरित ऊर्जा एवं नवीकरणीय ऊर्जा मिशन जैसी योजनाओं को गति देने का कार्य किया है। इन योजनाओं का उद्देश्य बुनियादी ढाँचे का सुदृढ़ीकरण, रोजगार सृजन, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करना है। 

    साथ ही, मोदी सरकार के समक्ष यह भी चुनौती है कि शासन व्यवस्था को सभी स्तरों पर अधिक कुशल, पारदर्शी, भ्रष्टाचारमुक्त, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल बनाया जाए। इस दिशा में डिजिटल गवर्नेंस, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और ई-गवर्नेंस जैसी व्यवस्थाएँ शासन में विश्वास को मजबूत कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इन सुधारों को लेकर निरंतर प्रयासरत रहे हैं और उनका स्पष्ट दृष्टिकोण रहा है कि विकास का लाभ केवल आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के रूप में दिखाई दे। योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और परिणामोन्मुख शासन ही विकसित भारत की नींव को मजबूत कर सकता है। इसके अतिरिक्त, देश में मोदी सरकार को ठेकेदारी प्रथा और आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। वर्तमान परिदृश्य में ठेकेदारी प्रथा और आउटसोर्सिंग गरीब एवं मध्यम वर्ग के श्रमिकों के शोषण का माध्यम बनती जा रही हैं। इन व्यवस्थाओं के अंतर्गत कार्यरत कर्मचारियों से कथित रूप से निरंतर वसूली की जाती है, जिसमें कई बार सरकारी तंत्र से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी भी संलिप्त बताए जाते हैं। यह स्थिति न केवल सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि श्रम की गरिमा और रोजगार की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। ऐसे में सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र में ठेकेदारी प्रथा पर पूर्णतः रोक लगाने अथवा उसे कठोर नियमों और पारदर्शी निगरानी व्यवस्था के तहत लाने की ठोस पहल करनी चाहिए, ताकि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके। यदि श्रम नीतियों में सुधार कर स्थायी, सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार को प्राथमिकता दी जाती है, तो इसका व्यापक सकारात्मक प्रभाव समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।

    स्पष्ट है कि नया वर्ष केवल उत्सव या कैलेंडर परिवर्तन का प्रतीक नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र-तीनों के लिए आत्ममंथन, मूल्यांकन और नए संकल्प लेने का महत्वपूर्ण अवसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उपलब्धियों के साथ-साथ अनेक राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ भी सामने हैं। ऐसे में सरकार के लिए आवश्यक है कि वह बीते अनुभवों से सीख लेते हुए भविष्य की दिशा को स्पष्ट और सुदृढ़ बनाए। यदि मोदी सरकार जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन, निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया, मतदाता जागरूकता, राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूती तथा सुशासन की भावना के साथ आगे बढ़ती है, तो आने वाला वर्ष लोकतंत्र को और अधिक सशक्त करने वाला सिद्ध हो सकता है। साथ ही, स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि, जवाबदेह प्रशासन और नागरिक-केंद्रित नीतियों के माध्यम से सरकार न केवल चुनौतियों का समाधान कर सकती है, बल्कि उन्हें अवसरों में भी बदल सकती है। इस प्रकार नया वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के लिए स्वयं को परखने, नीतियों को धरातल पर उतारने और राष्ट्र को विकास, स्थिरता तथा विश्वास के नए पथ पर आगे ले जाने का अवसर है। यदि यह संतुलन साधा जाता है, तो आने वाला वर्ष न केवल भाजपा के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए प्रगति और सशक्त लोकतंत्र का नया अध्याय साबित हो सकता है। वर्ष 2026 में मोदी सरकार को महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ बेहतर लैंगिक संवेदनशीलता भी सुनिश्चित करनी होगी। कहा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्र को उपलब्धियों की नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिये तहेदिल से और एकाग्रचित होकर प्रयास करना होगा, जो कि उनके हर प्रयास में दिखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये वर्ष 2026 में अनेक उपलब्धियाँ गढ़ने का अवसर है। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सम्पूर्ण देश का नागरिक एक सशक्त, एकजुट एवं समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में मिलकर काम करने का संकल्प लें तो देश को आगे बढ़ने से कोई ताकत नहीं रोक सकती।

    लेखक – डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत

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  • सांसद खेल महोत्सव में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन का संदेश : खेल को बनाएं जीवनशैली, अनुशासन को शक्ति

    सांसद खेल महोत्सव में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन का संदेश : खेल को बनाएं जीवनशैली, अनुशासन को शक्ति

    योगी सरकार के नेतृत्व में खेल संस्कृति को नई गति, आगरा में तृतीय सांसद खेल महोत्सव–2025 का भव्य आयोजन

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रतिनिधि के रूप में कैबिनेट मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने उपराष्ट्रपति की अगवानी व विदाई कर निभाई राज्य अतिथि परंपरा

    34 खेलों में 62 हजार से अधिक खिलाड़ियों की भागीदारी, आगरा में सांसद खेल महोत्सव बना जनआंदोलन

    आगरा/ लखनऊ। योगी सरकार के नेतृत्व में प्रदेश में खेल संस्कृति को सुदृढ़ और व्यापक स्वरूप देने की दिशा में आयोजित तृतीय सांसद खेल महोत्सव–2025 का भव्य आयोजन जनपद आगरा स्थित एकलव्य स्पोर्ट्स स्टेडियम में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारत के उपराष्ट्रपति  सी.पी. राधाकृष्णन रहे। प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री  मंत्री  योगेंद्र उपाध्याय ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रतिनिधि के रूप में उपराष्ट्रपति के आगरा आगमन पर राज्य अतिथि की गरिमा के अनुरूप आत्मीय स्वागत किया। इसके उपरांत उपराष्ट्रपति एकलव्य स्पोर्ट्स स्टेडियम पहुंचे, जहां उन्होंने ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के अंतर्गत पौधारोपण किया। कार्यक्रम का शुभारंभ एकलव्य की प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ। खिलाड़ियों द्वारा मलखंभ, तलवारबाजी और सांस्कृतिक नृत्य की आकर्षक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उपराष्ट्रपति ने विभिन्न खेलों के विजयी खिलाड़ियों को ट्रॉफी प्रदान कर सम्मानित किया।

    अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि खेल केवल प्रतिस्पर्धा का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, अनुशासन, धैर्य और टीम भावना का सशक्त आधार हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि खेल को जीवनशैली के रूप में अपनाएं और अनुशासन को अपनी शक्ति बनाएं। उन्होंने कहा कि नशा मुक्त युवा ही मजबूत और विकसित राष्ट्र की नींव होते हैं तथा नशे के विरुद्ध खेल सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फिट इंडिया मूवमेंट और खेलो इंडिया अभियान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन पहलों से देश में खेलों के प्रति दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन आया है। महानगरों के साथ-साथ ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में भी खेल संस्कृति विकसित हो रही है। पैरा ओलंपिक सहित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ियों का उत्कृष्ट प्रदर्शन सरकार की दूरदर्शी खेल नीतियों, विज्ञान आधारित प्रशिक्षण और युवाओं की मेहनत का परिणाम है।

    केंद्रीय मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल ने बताया कि सांसद खेल महोत्सव में 34 खेलों को शामिल किया गया, जिनमें 62 हजार से अधिक खिलाड़ियों ने पंजीकरण कराया। महिला एवं पुरुष दोनों वर्गों में प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं, जिससे खेलों में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हुई। आगरा टेक्निकल एयरपोर्ट पर उपराष्ट्रपति के आगमन पर  मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका अभिनंदन किया। कार्यक्रम में सहभागिता के उपरांत मंत्री योगेंद्र उपाध्याय स्वयं एयरपोर्ट पहुंचकर उपराष्ट्रपति को विदाई देने भी पहुंचे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति का आगरा आगमन और उनका स्वागत हमारे लिए सौभाग्य का विषय है। ‘अतिथि देवो भव’ हमारी संस्कृति, सभ्यता और संस्कार की जीवंत परंपरा है। उपराष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार आगरा आगमन पर उनका स्वागत एवं विदाई करना उत्तर प्रदेश सरकार के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि योगी सरकार युवाओं को खेल, शिक्षा और संस्कार तीनों के माध्यम से सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। सांसद खेल महोत्सव जैसे आयोजन युवाओं की प्रतिभा को मंच देने के साथ-साथ उन्हें अनुशासित और स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित करते हैं। उन्होंने उपराष्ट्रपति का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन से खिलाड़ियों का उत्साह और आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा है।

  • भारत माँ का सपूत अटल…….

    भारत माँ का सपूत अटल…….

    (युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी जी की 101वीं जयंती 25 दिसम्बर 2025 पर विशेष कविता)

    भारत माँ का सपूत अटल, हिमालय-सा ऊँचा भाल,

    जनता के मन का प्रधानमंत्री, जन-जन का रखवाला लाल।

    सत्ता नहीं, सेवा थी जीवन, राजनीति बनी साधना,

    सरल, संवेदनशील व्यक्तित्व, जिसमें बसती थी करुणा।

    अविवाहित तन, पर भारत था उनका विस्तृत परिवार,

    करोड़ों युवा-बालक बने उनके स्नेह के अधिकार।

    संघ-शाखा से संसद तक, निष्ठा का उजला पथ,

    विचारों की लौ जलाए रखी हर संघर्ष, हर यथार्थ-सथ।

    कवि की वाणी, ओज के शब्द, संसद में गूँज उठे,

    तर्क और मर्यादा के आगे विपक्ष भी झुक उठे।

    पोखरण में शक्ति दिखाई, विश्व को दिया संदेश,

    भारत अब निर्बल नहीं, चलता है अपने स्वदेश।

    लाहौर बस से शांति बढ़ाई, कारगिल में वीरता आई,

    विजयश्री का सेहरा बाँधा, भारत की आन बढ़ाई।

    स्वर्णिम पथ से राष्ट्र जोड़ा, विकास को दी पहचान,

    अटल बिहारी वाजपेयी, युगों तक अमर महान।

    ग्वालियर की धरती से निकले, ब्रज-माटी का मान,

    संघ-प्रचारक से प्रधानमंत्री तक, अद्भुत थी पहचान।

    नेहरू की भविष्यवाणी सच हुई, भारत को मिला महान,

    विदेशों में हिंदी की गूँज से बढ़ा देश का सम्मान।

    भारत रत्न से विभूषित अटल, मुस्कान बनी पहचान,

    भीष्म-पितामह कहलाए, राजनीति के युगपुरुष महान।

    16 अगस्त को युग थम गया, पर विचार हुए अमर,

    अटल नाम की यह ज्योति रहे, भारत का पथ-प्रहर।

    रचियता/लेखक- – ब्रह्मानंद राजपूत

    (Brahmanand Rajput)

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  • “अटल बिहारी वाजपेयी: विचार, व्यक्तित्व और राष्ट्र निर्माण की अमर गाथा”

    “अटल बिहारी वाजपेयी: विचार, व्यक्तित्व और राष्ट्र निर्माण की अमर गाथा”

    (युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी जी की 101वीं जयंती 25 दिसम्बर 2025 पर विशेष आलेख)

    भारत माँ के सच्चे सपूत, राष्ट्रपुरुष, राष्ट्रमार्गदर्शक और निष्ठावान देशभक्त-भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी को न जाने कितनी उपाधियों से अलंकृत किया गया, और वे इन सभी उपाधियों के वास्तविक अर्थ भी थे। किंतु इन सबसे बढ़कर वे एक अत्यंत संवेदनशील, सरल और श्रेष्ठ इंसान थे। उन्होंने जमीन से जुड़े रहकर राजनीति की और ‘जनता के प्रधानमंत्री’ के रूप में जन-जन के हृदय में अपनी विशेष जगह बनाई। अटल बिहारी वाजपेयी जी का व्यक्तित्व ऐसा था जो बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों-सभी के बीच समान रूप से लोकप्रिय था। देश का हर युवा और बच्चा उन्हें अपना आदर्श मानता था। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया और जीवन के अंतिम क्षण तक उसका निष्ठापूर्वक पालन किया। भले ही वे व्यक्तिगत रूप से अविवाहित रहे, लेकिन देश के करोड़ों बच्चे और युवा उनकी संतान के समान थे। बच्चों और युवाओं के प्रति उनका विशेष स्नेह ही उन्हें उनके हृदयों के अत्यंत निकट ले आया। भारतीय राजनीति में मूल्यों और आदर्शों की प्रतिष्ठा करने वाले एक अद्वितीय राजनेता और प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी जी का योगदान अतुलनीय रहा। उनके दूरदर्शी कार्यों के कारण ही उन्हें भारत के ढांचागत विकास का शिल्पकार कहा जाता है। वे ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे जिन्होंने न केवल अपने समर्थकों, बल्कि विरोधियों का भी दिल जीत लिया। उनका सार्वजनिक जीवन पूर्णतः बेदाग, स्वच्छ और पारदर्शी रहा, जिसके कारण हर वर्ग उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता था- यहाँ तक कि उनके विरोधी भी उनके प्रशंसक थे। अटल बिहारी वाजपेयी जी के लिए राष्ट्रहित सदैव सर्वोपरि रहा, इसी कारण वे ‘राष्ट्रपुरुष’ कहलाए। उनके विचार और वक्तव्य सदैव तर्कपूर्ण, संतुलित और दूरदर्शी होते थे, जिनमें युवा सोच की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। यही विशेषता उन्हें युवाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाती थी। जब भी वे संसद में बोलते थे, उनकी तर्कशक्ति और ओजस्वी वाणी के सामने विपक्ष भी निरुत्तर हो जाता था। एक संवेदनशील कवि के रूप में अटल जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किया। उनकी कविताएँ न केवल विचारों को झकझोरती थीं, बल्कि उनके प्रशंसकों को सदैव सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेंगी।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर तय करने वाले युग पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म ग्वालियर में बड़े दिन के अवसर पर 25 दिसम्बर 1924 को हुआ। अटल जी के पिता का नाम पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता का नाम कृष्णा वाजपेयी था। पिता पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में अध्यापक थे। कृष्ण बिहारी वाजपेयी साथ ही साथ हिन्दी व ब्रजभाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे। अटल बिहारी वाजपेयी मूल रूप से उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा जिले के प्राचीन स्थान बटेश्वर के रहने वाले थे। इसलिए अटल बिहारी वाजपेयी का पूरे ब्रज सहित आगरा से खास लगाव था। अटल बिहारी वाजपेयी जी की बी०ए० की शिक्षा ग्वालियर के वर्तमान में लक्ष्मीबाई कॉलेज के नाम से जाने वाले विक्टोरिया कॉलेज में हुई। ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक करने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने कानपुर के डी. ए. वी. महाविद्यालय से कला में स्नातकोत्तर उपाधि भी प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। अटल बिहारी वाजपेयी एक प्रखर वक्ता और कवि थे। ये गुण उन्हें उनके पिता से वंशानुगत मिले। अटल बिहारी वाजपेयी जी को स्कूली समय से ही भाषण देने का शौक था और स्कूल में होने वाली वाद-विवाद, काव्य पाठ और भाषण जैसी प्रतियोगिताएं में हमेशा हिस्सा लेते थे। अटल बिहारी वाजपेयी छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बनें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में हिस्सा लेते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने जीवन में पत्रकार के रूप में भी काम किया और लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। अटल बिहारी वाजपेयी जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे और उन्होंने लंबे समय तक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे प्रखर राष्ट्रवादी नेताओं के साथ काम किया।

    पंडित अटल बिहारी वाजपेयी सन् 1968 से 1973 तक भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। अटल बिहारी वाजपेयी सन् 1957 के लोकसभा चुनावों में पहली बार उत्तर प्रदेश की बलरामपुर लोकसभा सीट से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँचे। अटल जी 1957 से 1977 तक लगातार जनसंघ की और से संसदीय दल के नेता रहे। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने ओजस्वी भाषणों से देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तक को प्रभावित किया। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी के संसद में दिए ओजस्वी भाषण को सुनकर पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनको भविष्य का प्रधानमंत्री तक बता दिया था। और आगे चलकर पंडित जवाहर लाल नेहरू की भविष्यवाणी सच भी साबित हुई। अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व बहुत ही मिलनसार था। उनके विपक्ष के साथ भी हमेशा सम्बन्ध मधुर रहे। 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में विजय श्री के साथ बांग्लादेश को आजाद कराकर पाक के 93 हजार सैनिकों को घुटनों के बल भारत की सेना के सामने आत्मसमर्पण करवाने वाली देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी जी को अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में दुर्गा की उपमा से सम्मानित किया था। और 1975 में इंदिरा गाँधी द्वारा आपातकाल लगाने का अटल बिहारी वाजपेयी ने खुलकर विरोध किया था। आपातकाल की वजह से इंदिरा गाँधी को 1977 के लोकसभा चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी। और देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार जनता पार्टी के नेतृत्व में बनी जिसके मुखिया स्वर्गीय मोरारजी देसाई थे। और अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्री जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया गया। अटल बिहारी वाजपेयी ने विदेश मंत्री रहते हुये पूरे विश्व में भारत की छवि बनायीं। और विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देने वाले देश के पहले वक्ता बने। अटल जी 1977 से 1979 तक देश के विदेश मंत्री रहे। 1980 में जनता पार्टी के टूट जाने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने सहयोगी नेताओं के साथ भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। 1996 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। भाजपा द्वारा सर्वसम्मति से संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद अटलजी देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन अटल जी 13 दिन तक देश के प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने अपनी अल्पमत सरकार का त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंप दिया। 1998 में भाजपा फिर दूसरी बार सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन 13 महीने बाद तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय जयललिता के समर्थन वापस लेने से उनकी सरकार गिर गयी। लेकिन इस बीच अटल बिहारी वाजपेयी ने  प्रधानमंत्री रहते हुए दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट कर सम्पूर्ण विश्व को भारत की शक्ति का एहसास कराया। अमेरिका और यूरोपीय संघ समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए लेकिन उसके बाद भी भारत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में हर तरह की चुनौतियों से सफलतापूर्वक निबटने में सफल रहा। अटल बिहारी वाजपेयी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री रहते हुए पाकिस्तान से संबंधों में सुधार की पहल की और पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू कराई। इस सेवा का उद्घाटन करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की यात्रा करके नवाज शरीफ से मुलाकात की और आपसी संबंधों में एक नयी शुरुआत की। लेकिन कुछ ही समय पश्चात् पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया।  भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान द्वारा कब्जा की गयी जगहों पर हमला किया और पाकिस्तान को सीमा पार वापिस जाने को मजबूर किया। एक बार फिर पाकिस्तान को मुँह की खानी पड़ी और भारत को विजयश्री मिली। कारगिल युध्द की विजयश्री का पूरा श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को दिया गया। कारगिल युध्द में विजयश्री के बाद हुए 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 13 दलों से गठबंधन करके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के रूप में सरकार बनायी। और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूर्ण किया।  इन पाँच वर्षों में अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम छुए। और राजग सरकार ने गरीबों, किसानों और युवाओं के लिए अनेक योजनाएं लागू की। अटल सरकार ने भारत के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरुआत की और  दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई व मुम्बई को राजमार्ग से जोड़ा गया। 2004 में कार्यकाल पूरा होने के बाद देश में लोकसभा चुनाव हुआ और भाजपा के नेतृत्व वाले राजग ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में शाइनिंग इंडिया का नारा देकर चुनाव लड़ा। लेकिन इन चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। लेकिन वामपंथी दलों के समर्थन से काँग्रेस ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र की सरकार बनायी और भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा। इसके बाद लगातार अस्वस्थ्य रहने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति से सन्यास ले लिया। अटल जी को देश-विदेश में अब तक अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2015 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके घर जाकर सम्मानित किया।

    भारतीय राजनीति के युगपुरुष, श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, कोमलहृदय एवं संवेदनशील मनुष्य, वज्रबाहु राष्ट्रप्रहरी, भारतमाता के सच्चे सपूत और अजातशत्रु पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका व्यक्तित्व हिमालय के समान विराट, अडिग और प्रेरणास्पद था। अटल जी अपने महान कार्यों और विचारों के माध्यम से भारतवासियों के जीवन में ऐसा उजास छोड़ गए हैं, जो देश के नौजवानों को सदैव सही मार्ग दिखाता रहेगा। वे सदा चेहरे पर मुस्कान का परिधान धारण किए रहते थे; उनकी यह मुस्कान उनके निर्मल, पवित्र और उच्च कोटि के आत्मिक गुणों की साक्षी थी। उनकी आत्मा में मानवीय करुणा के साथ दैवीय शक्ति का भी वास था। अटल जी की ईमानदारी, शालीनता, सादगी और सौम्यता हर किसी का हृदय जीत लेती थी। उनके जीवन-दर्शन और कविताओं ने भारत के युवाओं को नई सोच, नई दिशा और नई प्रेरणा प्रदान की। वे करोड़ों लोगों के आदर्श और रोल मॉडल थे। भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री के रूप में देश के आर्थिक विकास तथा गरीब एवं वंचित वर्ग के सामाजिक कल्याण के लिए उनके अमूल्य योगदान को राष्ट्र सदैव स्मरण रखेगा। भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी जी को देश हमेशा श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करेगा। उनकी अटल आवाज और उनके द्वारा किए गए महान कार्य युगों-युगों तक राष्ट्र के हृदय में अमर रहेंगे।

    लेखक ब्रह्मानंद राजपूत

    E-Mail – brhama_rajput@rediffmail.com

  • भारत-रूस संबंधः विश्वास, सम्मान और दशकों पुराने भावनात्मक जुड़ाव की नींव”

    भारत-रूस संबंधः विश्वास, सम्मान और दशकों पुराने भावनात्मक जुड़ाव की नींव”

    (विशेष आलेख)

    भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंध दशकों से अत्यंत गहरे, विश्वसनीय और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच की यह मित्रता केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे के समर्थन और सहयोग के रूप में हमेशा मजबूती से प्रकट हुई है। रूस ने हमेशा भारत को अपना अत्यंत निकटतम और विश्वासपात्र मित्र माना है, वहीं भारत ने भी वैश्विक मंचों पर रूस के साथ अपनी पुरानी और मजबूत साझेदारी को निरंतर बनाए रखा है। विश्व राजनीति के विभिन्न दौरों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भी दोनों मित्र देशों ने कभी एक-दूसरे के विरुद्ध बोलने से परहेज किया है। इसके विपरीत, वे हमेशा एक-दूसरे के पक्ष में खड़े हुए हैं और परस्पर सहयोग को प्राथमिकता दी है। इसी स्थायी और भरोसेमंद संबंध ने भारत और रूस की मित्रता को वैश्विक मानचित्र पर एक विशेष पहचान दी है। दोनों देशों की यह साझेदारी न केवल ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से मजबूत है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।

    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछली भारत यात्रा चार वर्ष चार वर्ष पहले की थी। इस अवधि में विश्व राजनीति में बड़े बदलाव आए। पुतिन की उस यात्रा के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध आरंभ हुआ, जिसने वैश्विक शक्ति-संतुलन को नया मोड़ दिया। इस युद्ध के चलते अमेरिका तथा अनेक पश्चिमी देशों ने रूस पर विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाए, जिससे रूस अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पड़ने लगा। लेकिन ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को कमजोर नहीं होने दिया। भारत ने प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ अपना व्यापार, विशेषकर ऊर्जा क्षेत्र में, जारी रखा और परस्पर सहयोग को प्राथमिकता दी। भारत ने हमेशा वैश्विक शांति, स्थिरता और संवाद की वकालत की है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत ने कई बार संयम, कूटनीति और बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की अपील की।

    भारत ने इस युद्ध को समाप्त कराने के लिए समय-समय पर मध्यस्थता की पेशकश भी की, ताकि तनाव कम हो सके और क्षेत्र में शांति स्थापित हो सके। भारत और रूस के बीच की यह निरंतर प्रगाढ़ होती साझेदारी न केवल ऐतिहासिक मित्रता का प्रमाण है, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में दोनों देशों की दूरदर्शिता और परिपक्व कूटनीति का भी परिचायक है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंधों ने उल्लेखनीय मजबूती और व्यापकता हासिल की है। यदि इन संबंधों को आँकड़ों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग कितनी तेजी से आगे बढ़ा है। जहाँ पाँच वर्ष पहले द्विपक्षीय व्यापार का कुल मूल्य लगभग 8 अरब डॉलर था, वहीं यह अब बढ़कर 68 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। यह वृद्धि न केवल आपसी आर्थिक भरोसे को दर्शाती है, बल्कि भविष्य में सहयोग के और अधिक विस्तार की संभावनाओं को भी मजबूत करती है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता को महत्वपूर्ण सहारा मिला है। इसी प्रकार रक्षा क्षेत्र में भी भारत का रूस पर भरोसा कायम है। भारतीय सेना के साजो-सामान और रणनीतिक हथियारों का बड़ा हिस्सा अब भी रूसी तकनीक पर आधारित है, जो दशकों पुराने रक्षा सहयोग की गहराई को रेखांकित करता है।

    काफी वर्षों के अंतराल के बाद जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने दो दिवसीय भारत दौरे पर पहुँचे, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं एयरपोर्ट जाकर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। रेड कार्पेट अभिवादन के साथ उच्चतम स्तर का सम्मान प्रदर्शित करते हुए राष्ट्रपति पुतिन को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ भी प्रदान किया गया। यह दृश्य भारत की ओर से दिखाए गए विशेष सम्मान और द्विपक्षीय संबंधों की गहनता का स्पष्ट प्रतीक था। अगली सुबह राष्ट्रपति भवन में उनका औपचारिक और भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया गया। सैन्य बैंड, परंपरागत प्रोटोकॉल और पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ आयोजित इस कार्यक्रम ने भारत-रूस संबंधों की गहराई को एक बार फिर उजागर किया। इन सभी राजकीय औपचारिकताओं और गर्मजोशी भरे स्वागत ने यह संदेश दुनिया तक स्पष्ट रूप से पहुँचा दिया कि भारत और रूस की मित्रता सामान्य कूटनीतिक संबंधों से कहीं अधिक विशेष और रणनीतिक महत्व रखती है। दोनों देशों की यह साझेदारी बदलते वैश्विक परिदृश्य में भी दृढ़ और स्थिर बनी हुई है।

    रूसी राष्ट्रपति की इस भारत यात्रा पर पूरे विश्व की निगाहें टिकी हुई थीं। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियोंकृविशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘टैरिफ राजनीति’कृने अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को दो स्पष्ट धड़ों में विभाजित कर दिया है। ऐसी जटिल स्थिति में भारत की विदेश नीति और उसकी सामरिक संतुलन क्षमता की परीक्षा भी लगातार होती रही है। भारत लंबे समय से रूस और अमेरिका दोनों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध आरंभ होने के बाद भी भारत ने स्वयं को तटस्थ रखते हुए संवाद और शांति-सुलह की वकालत की। किन्तु जब से अमेरिका ने वैश्विक स्तर पर अपनी टैरिफ नीतियों को आक्रामक रूप दिया है, तब से भारत-अमेरिका संबंधों की सहजता पर प्रभाव पड़ा है। इसी पृष्ठभूमि में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा और अधिक महत्वपूर्ण हो गई।

    दो दिवसीय दौरे के दौरान संपन्न हुए शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के बीच कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, व्यापार और तकनीकी सहयोग से जुड़े इन संधियों ने भारत-रूस साझेदारी को नई मजबूती और दिशा प्रदान की। इस यात्रा ने वैश्विक स्तर पर यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारत और रूस की मित्रता केवल आर्थिक या सामरिक हितों पर आधारित नहीं है, बल्कि यह संबंध विश्वास, परस्पर सम्मान और दशकों पुराने भावनात्मक जुड़ाव पर टिका है। भारत और रूस ने विश्व मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए यह प्रदर्शित किया कि बदलते भू-राजनीतिक माहौल के बावजूद उनकी मित्रता स्थिर, गहरी और पारस्परिक हितों से कहीं आगे की है-ऐसी मित्रता जो समय, परिस्थिति और वैश्विक दबावों की परवाह किए बिना निरंतर मजबूत होती चली आ रही है।

    भारत और रूस के बीच दशकों से चली आ रही गहरी मित्रता ने बदलते वैश्विक समीकरणों और राजनीतिक तनावों के बीच भी अपनी मजबूती बनाए रखी है। पुतिन की हालिया भारत यात्रा ने न केवल दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को पुनः पुष्ट किया, बल्कि यह भी प्रदर्शित किया कि यह साझेदारी समय और परिस्थितियों से परे है। शिखर सम्मेलन में हुए समझौतों ने द्विपक्षीय सहयोग के नए द्वार खोले और यह संदेश स्पष्ट किया कि भारत और रूस की दोस्ती केवल रणनीतिक हितों पर आधारित नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और विश्वास की नींव पर खड़ी है। वैश्विक ध्रुवीकरण के इस दौर में दोनों देशों ने मिलकर अपनी विशेष साझेदारी को और अधिक सुदृढ़ करने का संकल्प दिखाया है, जो भविष्य की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    – डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत, आगरा

  • योगी सरकार ग्रामीण विद्यार्थियों को गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा से जोड़ने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध – मंत्री, योगेंद्र उपाध्याय

    योगी सरकार ग्रामीण विद्यार्थियों को गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा से जोड़ने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध – मंत्री, योगेंद्र उपाध्याय

    सिधावली-बटेश्वर में राजकीय महाविद्यालय की नींव, आगरा के बाह विधानसभा क्षेत्र को मिली उच्च शिक्षा की बड़ी सौगात

    1435.42 लाख रुपये की लागत से बनेगा बहुमंजिला शिक्षण परिसर

    आगरा, लखनऊ,/ योगी  सरकार द्वारा उच्च शिक्षा के प्रसार एवं सुदृढ़ीकरण की दिशा में आगरा के बाह विधानसभा क्षेत्र को महत्वपूर्ण उपलब्धि प्रदान करते हुए सिधावली-बटेश्वर में राजकीय महाविद्यालय की स्थापना का शुभारंभ किया गया। प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय एवं स्थानीय विधायक रानी पक्षालिका सिंह ने वैदिक परंपरा के अनुरूप भूमि पूजन कर महाविद्यालय की नींव रखी।

    इस अवसर पर उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा प्रणाली नए आयाम स्थापित कर रही है। राज्य में शिक्षा का स्तर तेजी से सुधर रहा है और प्रत्येक युवा को नकलमुक्त, रोजगारपरक, सुलभ एवं गुणवत्तायुक्त शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि योगी सरकार ने उच्च शिक्षा को गाँव-गाँव तक पहुंचाने का संकल्प लिया है। पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जन्मभूमि के निकट यह महाविद्यालय युवाओं के सपनों को साकार करने का माध्यम बनेगा। ग्रामीण प्रतिभाओं को अब उत्कृष्ट शिक्षा उनके ही क्षेत्र में उपलब्ध होगी। इस बहुमंजिला राजकीय महाविद्यालय के निर्माण पर 1435.42 लाख रुपये व्यय किए जाएंगे। इसके स्थापित होने से बाह एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों विद्यार्थियों को अब उच्च शिक्षा हेतु दूर आगरा या अन्य जनपदों का रुख नहीं करना पड़ेगा।