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  • भारत-रूस संबंधः विश्वास, सम्मान और दशकों पुराने भावनात्मक जुड़ाव की नींव”

    भारत-रूस संबंधः विश्वास, सम्मान और दशकों पुराने भावनात्मक जुड़ाव की नींव”

    (विशेष आलेख)

    भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंध दशकों से अत्यंत गहरे, विश्वसनीय और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच की यह मित्रता केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे के समर्थन और सहयोग के रूप में हमेशा मजबूती से प्रकट हुई है। रूस ने हमेशा भारत को अपना अत्यंत निकटतम और विश्वासपात्र मित्र माना है, वहीं भारत ने भी वैश्विक मंचों पर रूस के साथ अपनी पुरानी और मजबूत साझेदारी को निरंतर बनाए रखा है। विश्व राजनीति के विभिन्न दौरों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भी दोनों मित्र देशों ने कभी एक-दूसरे के विरुद्ध बोलने से परहेज किया है। इसके विपरीत, वे हमेशा एक-दूसरे के पक्ष में खड़े हुए हैं और परस्पर सहयोग को प्राथमिकता दी है। इसी स्थायी और भरोसेमंद संबंध ने भारत और रूस की मित्रता को वैश्विक मानचित्र पर एक विशेष पहचान दी है। दोनों देशों की यह साझेदारी न केवल ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से मजबूत है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।

    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछली भारत यात्रा चार वर्ष चार वर्ष पहले की थी। इस अवधि में विश्व राजनीति में बड़े बदलाव आए। पुतिन की उस यात्रा के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध आरंभ हुआ, जिसने वैश्विक शक्ति-संतुलन को नया मोड़ दिया। इस युद्ध के चलते अमेरिका तथा अनेक पश्चिमी देशों ने रूस पर विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाए, जिससे रूस अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पड़ने लगा। लेकिन ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को कमजोर नहीं होने दिया। भारत ने प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ अपना व्यापार, विशेषकर ऊर्जा क्षेत्र में, जारी रखा और परस्पर सहयोग को प्राथमिकता दी। भारत ने हमेशा वैश्विक शांति, स्थिरता और संवाद की वकालत की है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत ने कई बार संयम, कूटनीति और बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की अपील की।

    भारत ने इस युद्ध को समाप्त कराने के लिए समय-समय पर मध्यस्थता की पेशकश भी की, ताकि तनाव कम हो सके और क्षेत्र में शांति स्थापित हो सके। भारत और रूस के बीच की यह निरंतर प्रगाढ़ होती साझेदारी न केवल ऐतिहासिक मित्रता का प्रमाण है, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में दोनों देशों की दूरदर्शिता और परिपक्व कूटनीति का भी परिचायक है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंधों ने उल्लेखनीय मजबूती और व्यापकता हासिल की है। यदि इन संबंधों को आँकड़ों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग कितनी तेजी से आगे बढ़ा है। जहाँ पाँच वर्ष पहले द्विपक्षीय व्यापार का कुल मूल्य लगभग 8 अरब डॉलर था, वहीं यह अब बढ़कर 68 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। यह वृद्धि न केवल आपसी आर्थिक भरोसे को दर्शाती है, बल्कि भविष्य में सहयोग के और अधिक विस्तार की संभावनाओं को भी मजबूत करती है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता को महत्वपूर्ण सहारा मिला है। इसी प्रकार रक्षा क्षेत्र में भी भारत का रूस पर भरोसा कायम है। भारतीय सेना के साजो-सामान और रणनीतिक हथियारों का बड़ा हिस्सा अब भी रूसी तकनीक पर आधारित है, जो दशकों पुराने रक्षा सहयोग की गहराई को रेखांकित करता है।

    काफी वर्षों के अंतराल के बाद जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने दो दिवसीय भारत दौरे पर पहुँचे, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं एयरपोर्ट जाकर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। रेड कार्पेट अभिवादन के साथ उच्चतम स्तर का सम्मान प्रदर्शित करते हुए राष्ट्रपति पुतिन को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ भी प्रदान किया गया। यह दृश्य भारत की ओर से दिखाए गए विशेष सम्मान और द्विपक्षीय संबंधों की गहनता का स्पष्ट प्रतीक था। अगली सुबह राष्ट्रपति भवन में उनका औपचारिक और भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया गया। सैन्य बैंड, परंपरागत प्रोटोकॉल और पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ आयोजित इस कार्यक्रम ने भारत-रूस संबंधों की गहराई को एक बार फिर उजागर किया। इन सभी राजकीय औपचारिकताओं और गर्मजोशी भरे स्वागत ने यह संदेश दुनिया तक स्पष्ट रूप से पहुँचा दिया कि भारत और रूस की मित्रता सामान्य कूटनीतिक संबंधों से कहीं अधिक विशेष और रणनीतिक महत्व रखती है। दोनों देशों की यह साझेदारी बदलते वैश्विक परिदृश्य में भी दृढ़ और स्थिर बनी हुई है।

    रूसी राष्ट्रपति की इस भारत यात्रा पर पूरे विश्व की निगाहें टिकी हुई थीं। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियोंकृविशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘टैरिफ राजनीति’कृने अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को दो स्पष्ट धड़ों में विभाजित कर दिया है। ऐसी जटिल स्थिति में भारत की विदेश नीति और उसकी सामरिक संतुलन क्षमता की परीक्षा भी लगातार होती रही है। भारत लंबे समय से रूस और अमेरिका दोनों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध आरंभ होने के बाद भी भारत ने स्वयं को तटस्थ रखते हुए संवाद और शांति-सुलह की वकालत की। किन्तु जब से अमेरिका ने वैश्विक स्तर पर अपनी टैरिफ नीतियों को आक्रामक रूप दिया है, तब से भारत-अमेरिका संबंधों की सहजता पर प्रभाव पड़ा है। इसी पृष्ठभूमि में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा और अधिक महत्वपूर्ण हो गई।

    दो दिवसीय दौरे के दौरान संपन्न हुए शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के बीच कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, व्यापार और तकनीकी सहयोग से जुड़े इन संधियों ने भारत-रूस साझेदारी को नई मजबूती और दिशा प्रदान की। इस यात्रा ने वैश्विक स्तर पर यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारत और रूस की मित्रता केवल आर्थिक या सामरिक हितों पर आधारित नहीं है, बल्कि यह संबंध विश्वास, परस्पर सम्मान और दशकों पुराने भावनात्मक जुड़ाव पर टिका है। भारत और रूस ने विश्व मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए यह प्रदर्शित किया कि बदलते भू-राजनीतिक माहौल के बावजूद उनकी मित्रता स्थिर, गहरी और पारस्परिक हितों से कहीं आगे की है-ऐसी मित्रता जो समय, परिस्थिति और वैश्विक दबावों की परवाह किए बिना निरंतर मजबूत होती चली आ रही है।

    भारत और रूस के बीच दशकों से चली आ रही गहरी मित्रता ने बदलते वैश्विक समीकरणों और राजनीतिक तनावों के बीच भी अपनी मजबूती बनाए रखी है। पुतिन की हालिया भारत यात्रा ने न केवल दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को पुनः पुष्ट किया, बल्कि यह भी प्रदर्शित किया कि यह साझेदारी समय और परिस्थितियों से परे है। शिखर सम्मेलन में हुए समझौतों ने द्विपक्षीय सहयोग के नए द्वार खोले और यह संदेश स्पष्ट किया कि भारत और रूस की दोस्ती केवल रणनीतिक हितों पर आधारित नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और विश्वास की नींव पर खड़ी है। वैश्विक ध्रुवीकरण के इस दौर में दोनों देशों ने मिलकर अपनी विशेष साझेदारी को और अधिक सुदृढ़ करने का संकल्प दिखाया है, जो भविष्य की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    – डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत, आगरा

  • भारत और रूस के बीच आर्थिक और व्यापार सहयोग को बढ़ाने के लिए सही समय -फियो अध्यक्ष, एस सी रल्हन

    भारत और रूस के बीच आर्थिक और व्यापार सहयोग को बढ़ाने के लिए सही समय -फियो अध्यक्ष, एस सी रल्हन

    फियो ने राष्ट्रपति पुतिन के दौरे के दौरान इंडिया-रूस बिज़नेस फ़ोरम से पहले विकास और अवसर पर बल दिया

    नई दिल्ली : फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइज़ेशन्स (फियो) रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के 4-5 दिसंबर 2025 को होने वाले भारत के सरकारी दौरे और साथ में होने वाले इंडिया-रूस बिज़नेस फ़ोरम का स्वागत करता है, जो भारत और रूस के बीच आर्थिक और व्यापार सहयोग को बढ़ाने और गहरा करने के लिए सही समय पर प्लेटफ़ॉर्म है।

    हाल के ट्रेड डेटा से पता चलता है कि अप्रैल-अगस्त 2025-26 के समय में रूस को भारत का निर्यात 1.84 बिलियन डॉलर था, जबकि इम्पोर्ट 26.45 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। इससे पहले रूस के साथ वस्तु व्यापार 2024-25 में रिकॉर्ड  68.7 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया था, जिसमें लगभग 4.88 बिलियन डॉलर का निर्यात और  63.84 बिलियन डॉलर का आयात शामिल था। पिछले चार सालों में, 2021 से शुरू होकर, दोनों देशों के बीच वस्तु व्यापार पाँच गुना से ज़्यादा बढ़ा है। यह लगभग  13 बिलियन डॉलर था और 2024-25 में यह 68 बिलियन डॉलर हो जाएगा।

    यह ज़बरदस्त बढ़ोतरी मज़बूत ऊर्जा और वस्तु आधारित रिश्तों को दिखाती है, लेकिन रूस के पक्ष में व्यापार  असंतुलन काफ़ी बढ़ गया है। फियो  के अध्यक्ष एस सी रल्हन का मानना ​​है कि फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स, एग्रो-प्रोडक्ट्स, ऑटो और ऑटो-कंपोनेंट्स और आईटी सर्विसेज़ जैसे सेक्टर में रूस को निर्यात की बहुत संभावना है, जिनकी बदलते मार्केट डायनामिक्स के कारण बहुत ज़्यादा मांग है। श्री रल्हन ने आगे कहा कि इसके अलावा, रूस से कई पश्चिमी कंपनियों के निकलने से भारतीय निर्यातकों के लिए अलग-अलग सेक्टर में खाली जगह भरने का एक बड़ा मौका बना है। साथ ही, दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को  100 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने का एक बड़ा दीर्घकालिक लक्ष्य भी बताया है।

    फियो  अध्यक्ष ने यह भी कहा कि द्विपक्षीय निवेश अभी भी काफी हैं और पिछले कुछ सालों में बढ़े हैं, 2025 तक 50 बिलियन डॉलर का लक्ष्य है। भारत में रूस का निवेश ऑयल और गैस, पेट्रोकेमिकल्स, बैंकिंग, रेलवे और स्टील जैसे सेक्टर में है, जबकि रूस में भारत का निवेश मुख्य रूप से ऑयल और गैस और फार्मास्यूटिकल्स में है।

    श्री रल्हन ने कहा कि इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) जैसे लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर के फिर से शुरू होने और बढ़ने से भी देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार ज़्यादा किफायती हुआ है। उन्होंने दोहराया कि राष्ट्रपति श्री पुतिन के दौरे के दौरान होने वाला इंडिया-रूस बिज़नेस फोरम, भारतीय निर्यातकों, निवेशकों और रूसी निवेशकों के लिए ऊर्जा पर आधारित व्यापार से ज़्यादा डायवर्सिफाइड, स्थायी व्यापार और इन्वेस्टमेंट रिलेशनशिप की ओर बढ़ने का एक अहम मौका है।

    फियो  अध्यक्ष श्री एस सी रल्हन ने कहा “यह बिज़नेस फ़ोरम भारत-रूस व्यापार के लिए एक अहम समय पर हो रहा है। जहाँ व्यापार की मात्रा में बढ़ोतरी हमारे आर्थिक संबंधों की मज़बूती दिखाती है, वहीं अब हमें इस रफ़्तार का फ़ायदा उठाकर नॉन-ऑयल सेक्टर — इंजीनियरिंग सामान, केमिकल, फ़ार्मास्यूटिकल्स, खेती, कपड़ा, चमड़ा, जेम्स और ज्वेलरी और वैल्यू-एडेड मैन्युफ़ैक्चर्ड सामान में डायवर्सिफ़ाई करना चाहिए। फ़ोरम को बैलेंस्ड, लंबे समय के व्यापार और आपसी निवेश का रास्ता बनाना चाहिए।”

    फियो को उच्च मूल्य वाली वस्तुओं फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, इंजीनियरिंग सामान, साथ ही सेवाओं (आईटी/आईटीईएस, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा) के भारतीय निर्यात के विस्तार में विशेष रूप से मजबूत संभावनाएं दिखती हैं, साथ ही भारत के बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, हरित ऊर्जा, रेलवे, खनन और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में रूसी निवेश को प्रोत्साहित करता है। इसके अलावा, संस्थागत सुविधा और द्विपक्षीय व्यापार मिशनों के साथ रूस को एक बाजार के रूप में तलाशने के लिए एमएसएमई , निर्यातकों और एसएमई  का समर्थन करने से भारत के निर्यात सेक्टर को और बढ़ावा मिलेगा।

    फियो ने मरीन प्रोडक्ट्स, डेयरी और फार्मास्यूटिकल्स जैसे खास सेक्टर में भारतीय निर्यातकों के सामने आने वाली बाजार पहुंच की चुनौतियों को दूर करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया है। फेडरेशन इस बात पर ज़ोर देता है कि इन श्रेणियों की रूसी बाजार में मज़बूत और लगातार मांग बनी हुई है, और रूस की तरफ से रेगुलेटरी और प्रक्रियागत रुकावटों को दूर करने को प्राथमिकता देने का आग्रह करता है जो अभी उनके प्रवेश को सीमित करती हैं। इन उच्च संभावना वाली उत्पाद श्रेणियों के लिए आसान एक्सेस को सुगम बनाते हुए, फियो  अध्यक्ष ने भरोसा जताया कि इससे न सिर्फ़ द्विपक्षीय व्यापार को विविधीकृत और पुनर्संतुलित करने में मदद मिलेगी, बल्कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग को मज़बूत करने में भी मदद मिलेगी।

  • अक्षम सरकारों के विरुद्ध जेन जी का बढ़ता आक्रोश

    अक्षम सरकारों के विरुद्ध जेन जी का बढ़ता आक्रोश

    – सुरेश सिंह बैस

    विभिन्न देशों में बढ़ता जेन जी (Gen Z) का आक्रोश सरकारों की असफलता के लक्षण भी हैं और युवा पीढ़ी की जागरूक, व्यथित प्रतिक्रिया का परिचायक भी है। यह सिर्फ उच्च्श्रंखिल आक्रोश नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असंतोष का परिणाम है। नेपाल में करीब 70 दिन पहले जेन जी के नेतृत्व में हुए उग्र प्रदर्शन ने पिछले प्रधानमंत्री ओली की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था, लेकिन ताजातरीन हालात बता रहे हैं कि नई अंतरिम सरकार के साथ भी जन असंतोष, गहरी निराशा और आंदोलन की भावना कम नहीं हुई है। जेन जी प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें भ्रस्ताचार खत्म करना, पारदर्शिता, जल्दी चुनाव, और संसद का पुनर्गठन – पूरी होती नहीं दिख रही हैं, जिससे नया सिलसिला दोहराए जाने के संकेत मिल रहे हैं। 

    नई अंतरिम सरकार के गठन में अभी भी भारी अनिश्चितता है, सेना को शांति व्यवस्था के लिए मोर्चा संभालना पड़ा। प्रदर्शनकारी संविधान में सुधार, पूरी तरह पारदर्शी व्यवस्था, और सीधे चुने गए युवा नेतृत्व की मांग कर रहे हैं।.भ्रष्टाचार,भाई-भतीजावाद, और बेरोजगारी बनी हुई हैं, जिससे आंदोलन का ताप खत्म नहीं हुआ।  कई रिपोर्टों में सामने आया है कि युवा आंदोलनकारी अब भी सरकारी वादों और सुधारों के इंतजार में हैं, और परिवर्तन की दृष्टि से दबाव बनाए रखे हैं नेपाल में फिलहाल जेन जी की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं और उनका आक्रोश भी तेज हुआ है। हाल ही के घटनाक्रम में देखा गया है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद जब बुनियादी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो जेन जी युवाओं का असंतोष और आक्रोश, दोनों ही नए स्तर पर पहुंच गए हैं। 

    जेन जी युवाओं की अपेक्षाएं हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता, मेरिट के आधार पर स्थान, तकनीकी विकास, भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन और भविष्य की आश्वस्ति मिले। पिछली सरकार गिरने के बाद युवाओं को उम्मीद थी कि नई सरकार उनकी मांगें पूरी करेगी और बदलाव देखने को मिलेगा । सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, व्याप्त भ्रष्टाचार और रोज़गार/शिक्षा के अवसर कमजोर होने जैसी समस्याएं युवाओं को सशक्त औरू जागरूक मांगकर्ता बना रही हैं। 

    पिछले दो दिनों में फिर से सड़कें उग्र विरोध और झड़पों की गवाह बनी हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि जेन जी की नाराजगी शांत नहीं हुई बल्कि और तेज हो गई है।स्थानीय प्रशासन को कर्फ्यू लगाना पड़ा, पुलिस को लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले दागने पड़े, जिससे पता चलता है कि आक्रोश गहरा और व्यापक हो गया है। युवाओं के विश्वास में आई कमी और सरकारों की बार-बार नाकामी भी उनके गुस्से को लगातार भड़का रही है। 

    नेपाल का जेन जी आंदोलन फिलहाल शांत नहीं पड़ा है सत्ता बदलने के बावजूद बुनियादी मांगें और गुस्सा बरकरार हैं ।यह देश की राजनीति को लगातार बदलने वाला, युवा नेतृ की मांग प्रमख रखने वाला आंदोलन है. जो अगर नजरअंदाज किया गया तो फिर से तीव्रता पकड़ सकता है। इसका संकेत है: नई सरकार के लिए चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई हैं, और अगर नेपाल में युवा वर्ग की आकांक्षाओं का समाधान नहीं हुआ, तो अस्थिरता और असंतोष आगे भी जारी रह सकता है। 

    कई देशों जैसे नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, और केन्या में सरकारी नीतियों में पारदर्शिता की कमी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, और सामाजिक असमानता के कारण युवाओं में घोर निराशा व असंतोष पनप रहा है।लोकतंत्र अगर युवाओं की आकांक्षाओं को नहीं पूरा करता या भ्रष्ट परिवेश बनाता है, तो युवा वर्ग व्यापक आंदोलन और आक्रोश के रूप में प्रतिक्रिया देता है, जिससे कई बार सरकारें गिर गईं, जैसे नेपाल व श्रीलंका में हुआ । सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, बढ़ती महंगाई, और रोजगार की घटती संभावनाएँ भी सरकारी नीतियों की विफलता को दर्शाती हैं, जिससे Gen Z का आक्रोश और बढ़ता है। 

    Gen Z डिजिटल युग में पली-बढ़ी पीढ़ी है, जो सूचना के नए साधनों से लैस है और अपनी बात मुखरता से रखने का साहस रखती है। सोशल मीडिया, टोलिंग, और तुलना ने मानसिक दबा । असंतोष और सामाजिक असमानता के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ा दी है। वे सिर्फ विद्रोही नहीं, बल्कि समाजपरिवर्तन के लिए सक्रिय, जागरूक और तकनीकी रूप से सक्षम हैं। उच्च शिक्षा, स्किल्स और सपनों के बावजूद जब भविष्य अनिश्चित दिखे, तो जेन जी का असंतोष स्वतः आक्रोश में बदल जाता है। सामाजिक अन्याय, लैंगिक असमानता, पर्यावरणीय संकट, और उम्रदराज हित समूहों की नीतियों के खिलाफ यह युवावर्ग सामूहिक बदलाव की मांग करता है आक्रोश के नए रूप। पिछले दो दिनों में फिर से सड़कें उग्र विरोध और झड़पों की गवाह बनी हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि जेन जी की नाराजगी शांत नहीं हुई बल्कि और तेज हो गई है। स्थानीय प्रशासन को कर्फ्यू लगाना पड़ा, पुलिस को लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले दागने पड़े, जिससे पता चलता है कि आक्रोश गहरा और व्यापक हो गया है। 

    युवाओं के विश्वास में आई कमी और सरकारों की बार-बार नाकामी भी उनके गुस्से को लगातार भड़का रही है। नेपाल में जेन जी की अपेक्षाएं भी अपने उच्चतम स्तर पर हैं और उनका आक्रोश भी उतना ही प्रबल है, क्योंकि वे सिर्फ बदलाव की उम्मीद ही नहीं कर रहे, उसके लिए खुलकर विरोध भी कर रहे हैं। यह परिवर्तन दोनों ही दिशाओं में दिख रहा है-आशाएं भी उभर रही हैं, और नतीजे न आने पर गुस्सा भी।जेन जी में बढ़ता आक्रोश केवल युवाओं की उच्छृंखलता नहीं, बल्कि आधुनिक, जागरूक और अपने अधिकारों की माँग करता समाजिक चेतना है। यह सरकारों के प्रति एक चेतावनी भी है कि समाज की अपेक्षाएँ अगर पूरी नहीं होतीं, तो लोकतंत्र और व्यवस्था सभी प्रभावित हो सकते हैं ।

    साभार – एवीके न्यूज सर्विस 

  • बलिया से अफ्रीका तक: संजय कुमार राय की तकनीकी यात्रा

    बलिया से अफ्रीका तक: संजय कुमार राय की तकनीकी यात्रा

    भारतीय युवा का वैश्विक आईटी नेतृत्व: अफ्रीका में संजय राय

    उमेश कुमार सिंह

    भारत की आईटी प्रतिभा आज पूरी दुनिया में छाप छोड़ रही है। सॉफ़्टवेयर डेवलपमेंट, क्लाउड सेवाएँ, डेटा सुरक्षा और डिजिटल ढाँचा बनाने में भारतीय विशेषज्ञों की क्षमता विश्व स्तर पर स्वीकार की जा चुकी है। इन्हीं में से एक नाम है उत्तर प्रदेश के बलिया से आने वाले संजय कुमार राय, जिन्होंने अफ्रीका के देशों में आधुनिक डिजिटल समाधान और नवाचार को नई दिशा दी है। संजय कुमार राय वर्तमान में ओरिसन सॉल्यूशन्स लिमिटेड के संस्थापक और प्रबंध निदेशक हैं। उनकी कंपनी युगांडा, रवांडा, तंज़ानिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में आधुनिक आईटी समाधान, सिस्टम इंटीग्रेशन और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर सेवाएँ प्रदान करती है। इसके साथ ही वे एमएफआई डॉक्यूमेंट सॉल्यूशन्स लिमिटेड में उप-सहारा अफ्रीका क्षेत्र के ग्रुप डायरेक्टर – आईटी के रूप में भी कार्यरत हैं, जहाँ वे विभिन्न संस्थानों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं।

    सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव संजय राय को एक विशेषज्ञ के रूप में अलग पहचान देता है। उनके नेतृत्व में अनेक उच्च-स्तरीय तकनीकी परियोजनाएँ पूरी की गईं, जिनका प्रभाव सरकारी कार्यालयों, वित्तीय संस्थानों, शिक्षा संस्थानों और उद्योग क्षेत्रों तक पहुँचा। उनके कार्य ने अफ्रीका के कई देशों में डिजिटल क्षमताओं को बढ़ाया और डेटा एवं साइबर सुरक्षा को मजबूत किया। समाधान-केन्द्रित दृष्टिकोण और समय पर परिणाम देने की क्षमता ने उन्हें अफ्रीका में डिजिटल बदलाव के प्रमुख भारतीय चेहरों में शामिल कर दिया है।

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    संजय कुमार राय

    ओरिसन सॉल्यूशन्स लिमिटेड के माध्यम से वे नेटवर्किंग सिस्टम, साइबर सुरक्षा, एंटरप्राइज़ सॉफ्टवेयर, क्लाउड प्लेटफॉर्म और डिजिटल इनोवेशन जैसे क्षेत्रों में सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। गुणवत्तापूर्ण काम, समय की पाबंदी और दीर्घकालिक ग्राहक विश्वास उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

    बलिया जैसे छोटे शहर से निकलकर प्रयागराज और फिर वैश्विक आईटी नेतृत्व तक पहुँचना संजय राय के समर्पण और मेहनत की मिसाल है। प्रयागराज में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके व्यक्तित्व और मूल्यों को परिवार से मिली संस्कृति ने आकार दिया। उनके पिता प्रो. चंद्र मोहन राय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डिफेंस स्टडी विभाग में कार्यरत रहे। साथ ही उनके दोनों भाइयों ने रक्षा और शिक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देकर परिवार की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाया।

    संजय राय की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी अत्यंत मजबूत है। उनके पास एमबीए (बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी)फेलोशिप प्रोग्राम इन मैनेजमेंट (जयपुरिया इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट) के साथ पीएमपीसीआईएसएआईएसओ 9001 तथा आईएसओ 27001 लीड ऑडिटर सहित एसएपीओरेकलडेलमाइक्रोसॉफ्ट और वीएमवेयर जैसी कंपनियों के अंतरराष्ट्रीय प्रमाणपत्र हैं। वे ईआरपी इंप्लीमेंटेशनकोर बैंकिंग सॉल्यूशन्ससासडेटा बैकअप सिस्टम्सवर्चुअलाइजेशन और आईसीटी इंफ्रास्ट्रक्चर में विशेषज्ञता रखते हैं।

    तकनीकी नेतृत्व के अलावा वे एक लेखक और शोधकर्ता भी हैं। साइबर सुरक्षा, डिजिटल मार्केटिंग, सॉफ़्टवेयर टेस्टिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर उनकी लिखी पुस्तकें कई देशों में शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए उपयोग की जा रही हैं। उनके नाम पर कई तकनीकी पेटेंट भी दर्ज हैं, जिनमें AI-आधारित सुरक्षा प्रणाली, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा समाधान और क्वांटम टेक्नोलॉजी से जुड़े नवाचार शामिल हैं। उनके योगदान को वैश्विक स्तर पर कई सम्मान मिले हैं, जिनमें इंटरनेशनल अचीवर्स अवॉर्ड 2021, ग्लोबल चॉइस अवॉर्ड 2022, बेस्ट CEO अवॉर्ड 2022 और मोस्ट इंस्पायरिंग बिजनेस लीडर 2023 शामिल हैं। सीआईओ  व्यूस मैगज़ीन ने भी उन्हें अपने कवर पृष्ठ पर स्थान दिया, जो उनके प्रभाव और योगदान का सम्मान है।

    भारत की ओर से वैश्विक आईटी नेतृत्व का यह उदाहरण सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी क्षमता और नवाचारिक शक्ति का प्रमाण है। संजय कुमार राय यह दिखाते हैं कि ज्ञान, दृष्टि और अथक परिश्रम के साथ भारत का कोई भी युवा दुनिया के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    साभार – एवीके न्यूज सर्विस 

  • भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की मेज़बानी…. 

    भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की मेज़बानी…. 

     मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इसे बताया भारत के खेल जगत से जुड़ा एक और स्वर्णिम अध्याय

    रायपुर । मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की मेज़बानी मिलने पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि यह निर्णय भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव, खेल के क्षेत्र में नई ऊर्जा और हमारे खिलाड़ियों की लगातार बढ़ती उत्कृष्टता का सम्मान है। मुख्यमंत्री ने इस उपलब्धि को “भारत के खेल इतिहास में जुड़ा स्वर्णिम अध्याय” बताया और कहा कि यह हर भारतीय के सपनों को नया पंख देने वाला क्षण है।

    मुख्यमंत्री ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा कि कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की मेज़बानी मिलना  करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों, जज़्बे और जुनून का सम्मान है। उन्होंने कहा कि यह घोषणा उत्साह की नई लहर लेकर आई है। यह अवसर देश के हर बच्चे, हर युवा और हर खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने की प्रेरणा देगा। 

    मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत खेल महाशक्ति के रूप में उभर रहा है और यह मेज़बानी उसी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है।

  • छत्तीसगढ़ की संस्कृति ने विदेश में बिखेरा रंग…

    छत्तीसगढ़ की संस्कृति ने विदेश में बिखेरा रंग…

    अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस समारोह में NACHA बे एरिया चैप्टर बना सहभागी

    प्रवासी छत्तीसगढ़वासी राज्य के सांस्कृतिक राजदूत, छत्तीसगढ़ की संस्कृति को विश्व में दे रहे पहचान – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

    रायपुर । अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस का उत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और लोक-कला ने विदेश की भूमि पर अपनी विशेष छाप छोड़ी। इस कार्यक्रम में NACHA (North America Chhattisgarh Association) के बे एरिया चैप्टर ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उन्होंने विशेष रूप से छत्तीसगढ़ राज्य को समर्पित एक आकर्षक स्टॉल लगाया, जिसमें राज्य के विशिष्ट उत्पादों, हस्तशिल्प, लोककला और पारंपरिक आभूषणों का सुंदर प्रदर्शन किया गया। इस स्टॉल के माध्यम से छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति और हस्तशिल्प की विविधता को प्रदर्शित किया गया, जिसे उपस्थित अतिथियों ने अत्यंत सराहा।

    कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य का मनमोहक प्रदर्शन, जिसने वहां मौजूद भारतीय प्रवासी समुदाय और अन्य देशों के प्रतिनिधियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पारंपरिक छत्तीसगढ़ी वेशभूषा में प्रस्तुत यह लोकनृत्य न केवल मनोरंजन का माध्यम बना, बल्कि उसने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की आत्मा को भी सजीव कर दिया।

    NACHA के सदस्यों ने बताया कि उनका उद्देश्य छत्तीसगढ़ की संस्कृति, भाषा और लोक परंपरा को विश्व के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाना है। उन्होंने कहा कि प्रवासी छत्तीसगढ़वासी अपने मूल राज्य की पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। इस आयोजन ने उन्हें अपनी जड़ों से भावनात्मक रूप से जोड़ने का एक सशक्त अवसर प्रदान किया।

    मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने NACHA बे एरिया चैप्टर के सभी सदस्यों को बधाई देते हुए कहा कि उनका यह प्रयास छत्तीसगढ़ की गौरवशाली परंपराओं को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रवासी छत्तीसगढ़वासी राज्य के “सांस्कृतिक राजदूत” हैं, जो अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए छत्तीसगढ़ की अस्मिता, संस्कृति और मूल्यों को पूरी दुनिया में  स्थापित कर रहे हैं।

  • उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा से इस्राइल के आर्थिक प्रतिनिधि यैर ओशेरॉफ की सौजन्य भेंट

    उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा से इस्राइल के आर्थिक प्रतिनिधि यैर ओशेरॉफ की सौजन्य भेंट

    रायपुर, / उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा में अपने रायपुर स्थित निवास कार्यालय में इस्राइल के अर्थ मंत्रालय के दक्षिण भारत हेतु आर्थिक एवं व्यापारिक प्रतिनिधि यैर ओशेरॉफ ने सौजन्य मुलाकात की। बैठक के दौरान भारत और इस्राइल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार प्रगाढ़ हो रहे मित्रतापूर्ण संबंधों पर विस्तृत चर्चा की गई। उपमुख्यमंत्री श्री शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, कृषि नवाचार, सिंचाई तकनीक और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में इस्राइल के अनुभव एवं विशेषज्ञता से राज्य को लाभ मिल सकता है।

    इस अवसर पर ओशेरॉफ ने छत्तीसगढ़ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह एवं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में नक्सलवाद को समाप्त करने हेतु किए जा रहे प्रभावी प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रदेश में स्थापित हो रही स्थायी शांति का वातावरण राज्य के विकास को गति देगा। बैठक में उन्नत तकनीक के आदान-प्रदान, औद्योगिक सहयोग बढ़ाने, अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहित करने तथा नई तकनीक के माध्यम से रोजगार एवं विकास के अवसर सृजित करने पर भी चर्चा की गई। इस मुलाकात से छत्तीसगढ़ के इस्राइल के साथ आर्थिक, वैज्ञानिक और औद्योगिक सहयोग की दिशा में सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है।

  • भारतीय महिला क्रिकेट टीम की विश्वविजेता बनने की उपलब्धि पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दी बधाई

    भारतीय महिला क्रिकेट टीम की विश्वविजेता बनने की उपलब्धि पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दी बधाई

    रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम को विश्वविजेता बनने की ऐतिहासिक उपलब्धि पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि यह विजय न केवल पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि छत्तीसगढ़ के लिए भी अत्यंत विशेष महत्व रखती है।

    मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि इस गौरवपूर्ण उपलब्धि में छत्तीसगढ़ की प्रतिभाशाली बेटी आकांक्षा सत्यवंशी का योगदान राज्य के लिए गर्व की बात है। कवर्धा जिले की आकांक्षा सत्यवंशी ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम में बतौर फिजियोथैरेपिस्ट और स्पोर्ट्स साइंस एक्सपर्ट खिलाड़ियों की फिटनेस, रिकवरी और प्रदर्शन को सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।

    उन्होंने कहा कि आकांक्षा सत्यवंशी इससे पहले छत्तीसगढ़ महिला क्रिकेट टीम और अंडर-19 भारतीय महिला क्रिकेट टीम से भी जुड़ी रही हैं। खिलाड़ियों की फिटनेस के प्रति उनका समर्पण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उत्कृष्ट पेशेवर दक्षता इस ऐतिहासिक जीत में उनके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करती है।

    मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आकांक्षा सत्यवंशी जैसी प्रतिभाशाली बेटियाँ आज छत्तीसगढ़ का नाम पूरे देश और दुनिया में रोशन कर रही हैं। उन्होंने आकांक्षा को राज्य की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी यह उपलब्धि प्रदेश की युवतियों को अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रेरित करेगी।

    मुख्यमंत्री ने कहा“यह जीत नारी शक्ति, परिश्रम और आत्मविश्वास की जीत है। हमें गर्व है कि इस गौरवमयी पल में छत्तीसगढ़ की बेटी ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।”

    मुख्यमंत्री साय ने आकांक्षा सत्यवंशी को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं और कहा कि उनकी सफलता नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

  • केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी के नेतृत्व में ज्ञान विनिमय मिशन का फिलीपींस दौरा

    केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी के नेतृत्व में ज्ञान विनिमय मिशन का फिलीपींस दौरा

    नई दिल्ली। केंद्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी 20-22 अक्टूबर, 2025 तक फिलीपींस में एक उच्च स्तरीय ज्ञान आदान-प्रदान मिशन का नेतृत्व कर रहे हैं। यह कार्यक्रम विश्व बैंक के सहयोग से आयोजित किया गया है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी तथा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हैं।

    इस दौरान प्रवासी श्रमिक विभाग (डीएमडब्ल्यू), तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास प्राधिकरण (टीईएसडीए), फिलीपीन सांख्यिकी प्राधिकरण (पीएसए) और प्रवासी श्रमिक कल्याण प्रशासन (ओडब्ल्यूडब्ल्यूए) जैसे फिलीपींस के प्रमुख संस्थानों के साथ कई बैठकें होंगी। इस यात्रा का उद्देश्य ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना तथा कौशल विकास, श्रम गतिशीलता और डेटा-संचालित नीति ढांचे से संबंधित क्षेत्रों में सर्वोत्तम नियमों को साझा करना है। यह मिशन मानव पूंजी विकास पर सहयोग करने, पारस्परिक शिक्षा को बढ़ावा देने तथा कौशल एवं उद्यमिता के माध्यम से न्यायसंगत और सतत विकास के लिए ग्लोबल साउथ की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

  • लाखों भारतीय ट्रंप के एच1बी वीजा बम से सीधे प्रभावित होंगे….

    लाखों भारतीय ट्रंप के एच1बी वीजा बम से सीधे प्रभावित होंगे….

    ब्रह्मानंद राजपूत

    टैरिफ को लेकर मची खलबली के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। उन्होंने एच-1बी वीजा पर वार्षिक 1,00,000 डॉलर की नई फीस लगाने की घोषणा की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में जिस एग्जिक्यूटिव ऑर्डर पर साइन किया है, उससे एच-1बी वीजा व्यवस्था में बड़े बदलाव आए हैं। अब से कोई भी व्यक्ति अमेरिका जाने के लिए एच-1बी वीजा के लिए आवेदन करेगा, तो उसके नियोक्ता को प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में 1 लाख डॉलर (करीब ₹83 लाख) का भुगतान करना होगा। व्हाइट हाउस का कहना है कि यह कदम अमेरिकी नौकरियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है और केवल अत्यंत कुशल विदेशी कामगार ही अमेरिका आ पाएंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले का सबसे बड़ा असर भारतीयों पर पड़ेगा, क्योंकि एच-1बी वीजा धारकों में भारत की हिस्सेदारी 70 प्रतिषत से अधिक है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एच-1बी वीजा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव की मुहर लगा दी है। अब 21 सितंबर 2025 से, कोई भी विदेशी कार्यकर्ता अमेरिका की भूमि पर कदम रख सकेगा तभी, जब उसके स्पॉन्सरिंग नियोक्ता ने भारी शुल्क एक लाख डॉलर अदा किया हो। यह नियम मुख्यतः नए आवेदकों पर लागू होगा, परंतु जो पहले से वीजा धारक हैं और विदेश जाकर पुनः स्टैंपिंग करवाएंगे, उन्हें भी इसका सामना करना पड़ेगा।

    अब तक यह शुल्क मामूली-लगभग 1,500 डॉलर-रहता था, किंतु अब इसकी वृद्धि अभूतपूर्व है। यदि हर पुनः प्रवेश पर यह शुल्क लागू हुआ, तो तीन वर्षों में इसकी लागत अनेक लाखों डॉलर तक पहुँच सकती है। इस निर्णय की गूँज भारतीय प्रतिभाओं के लिए सबसे अधिक सुनाई देगी, क्योंकि एच-1बी वीजा धारकों में भारत की हिस्सेदारी सर्वाधिक है। हाल के वर्षों में एच-1बी वीजा का लाभ सबसे अधिक भारतीयों को मिला-करीब 71-73 प्रतिषत वीजा भारत को मिले, जबकि चीन का हिस्सा मात्र 11-12 प्रतिषत तक सीमित रहा। केवल 2024 में ही भारतवासियों को 2 लाख से अधिक एच-1बी वीजा प्रदान किए गए। अब विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि केवल 60,000 भारतीयों पर इसका तत्काल असर पड़े, तो सालाना वित्तीय बोझ 6 बिलियन डॉलर यानी लगभग ₹53,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा।

    मध्यम स्तर के इंजीनियर, जो अमेरिका में सालाना 1.2 लाख डॉलर अर्जित करते हैं, उनके लिए यह भारी शुल्क उनकी आय का लगभग 80 प्रतिषत निगल जाएगा। छात्र, शोधकर्ता और युवा प्रतिभाएँ-जो अपने सपनों और ज्ञान के साथ अमेरिका की ओर बढ़ रहे थे-उनके लिए यह रास्ता लगभग बंद सा हो जाएगा। इस फैसले की छाया केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिभा और भविष्य के करियर पर भी गहरी और स्थायी छाप छोड़ती है। ट्रंप का कहना है कि यह कदम वीजा प्रणाली के दुरुपयोग को रोकने और अमेरिकी कंपनियों को अपने ही स्नातकों को प्रशिक्षित करने के लिए प्रेरित करने की दिशा में उठाया गया है। व्हाइट हाउस के अधिकारी इसे घरेलू नौकरियों की सुरक्षा की ओर एक साहसिक और निर्णायक प्रयास के रूप में देख रहे हैं। अब बड़ी कंपनियाँ विदेशी कर्मचारियों को सस्ते दामों पर काम पर नहीं रख पाएंगी, क्योंकि उन्हें पहले सरकार को भारी शुल्क एक लाख डॉलर अदा करना होगा, और फिर कर्मचारी को उसका वेतन देना होगा। इस नए आर्थिक बोझ ने विदेशी कर्मचारियों के रास्ते को कठिन और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

    नियमों के अनुसार, एच-1बी वीजा अब अधिकतम छह वर्षों के लिए ही मान्य रहेगा, चाहे वह नया आवेदन हो या नवीनीकरण। आदेश में साफ कहा गया है कि इस वीजा का पहले दुरुपयोग हो रहा था, जिससे अमेरिकी कामगारों और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता था। अब यह व्यवस्था कड़े और न्यायसंगत रूप में लागू होगी, ताकि केवल योग्य, सक्षम और वास्तविक प्रतिभा ही अमेरिका की भूमि पर कदम रख सके।

    टैरिफ को लेकर पहले से ही बना तनाव भारत-अमेरिका के राजनीतिक रिश्तों पर भी अपनी गहरी छाया डाल सकता है। भारत सरकार इस मसले को कूटनीतिक मंच पर उठाएगी, क्योंकि लाखों भारतीय इस फैसले से सीधे प्रभावित होंगे। ट्रंप अपने मतदाताओं को यह संदेश देना चाहते हैं कि वह अमेरिकी नौकरियों की रक्षा के लिए कटिबद्ध हैं, किंतु इसके पीछे छिपा असर भारत के साथ साझेदारी और तकनीकी सहयोग पर नकारात्मक पड़ सकता है। इस निर्णय की गूँज केवल आर्थिक मोर्चे तक सीमित नहीं है, यह द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक तकनीकी संगठनों के भविष्य पर भी अपनी छाप छोड़ती प्रतीत होती है।

    अब 85,000 वार्षिक एच-1बी कोटे-65,000 सामान्य आवेदकों और 20,000 उच्च डिग्री धारकों के लिए-पर यह भारी शुल्क लागू होगा। छोटी कंपनियाँ और नए स्नातक पीछे हट सकते हैं, और नियोक्ता केवल उच्च वेतन वाले विशेषज्ञों को ही स्पॉन्सर करेंगे, जिससे अवसर और भी संकरे, और दुर्लभ हो जाएंगे। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अमेरिका की नवाचार शक्ति पर कर लगाने जैसा है, इससे वैश्विक प्रतिभाएँ अमेरिका आने से कतराएँगी। परिणामस्वरूप, कंपनियाँ नौकरियों को विदेश ले जा सकती हैं, जिससे न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था बल्कि भारतीय पेशेवर भी गहराई से प्रभावित होंगे। कहा जाता है कि भारत अमेरिका को केवल सामान नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभाशाली मानव संसाधन-इंजीनियर, कोडर और छात्र भी “निर्यात” करता है। अब जब यह शुल्क भारी और असहनीय हो गया है, तो भारतीय प्रतिभाएँ अपना रुख यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और मिडिल ईस्ट की ओर कर सकती हैं, जहाँ उनके सपनों और कौशल को खुले आसमान के नीचे उड़ान भरने का अवसर मिलेगा। 

    लेखक- – ब्रह्मानंद राजपूत, आगरा

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